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सभ्यतागत जागरण

सभ्यतागत जागरण और सामाजिक निष्क्रियता

सारांश

  • एक समय था जब लोग डर में जी रहे थे। हमारी पहचान पर सवाल उठते थे, हमारी आस्था का मज़ाक उड़ाया जाता था, हमारी परंपराओं पर रोक लगाई जाती थी और हमारी आवाज़ दबाई जाती थी।
  • फिर ऐसा नेतृत्व आया जिसने डर हटाया, आत्मसम्मान लौटाया और सांस्कृतिक जागरण की शुरुआत की।
  • लेकिन आज, जब खतरे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, सबसे बड़ा खतरा हमारी अपनी निष्क्रियता बन गया है।
  • जो समाज जागकर फिर लापरवाह और बंटा हुआ हो जाता है, वह अपना भविष्य खुद ही बर्बाद कर देता है। इतिहास यह बात साफ़-साफ़ बताता है।

जागने के बाद भी निष्क्रिय रहना खतरनाक है

1️⃣ जब हम सच में खतरे में थे

यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है, यह सच्चाई थी:

  • हमारी पहचान पर बार-बार सवाल उठाए जाते थे
  • हमारी आस्था को पिछड़ा कहा जाता था
  • जो भी बोलता था, उसे कट्टर बता दिया जाता था
  • हमारे त्योहारों और परंपराओं को रोका जाता था

जब लोग सवाल पूछते थे,

  • तो उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें ही दोषी ठहरा दिया जाता था

2️⃣ डर, हिंसा और मजबूर पलायन

उस समय की ज़मीनी हकीकत बहुत दर्दनाक थी:

  • कहीं लोगों पर हमले हो रहे थे
  • कहीं डर के कारण लोग चुप थे
  • कई जगह परिवारों को अपना घर-ज़मीन छोड़नी पड़ी

सबसे खतरनाक बात हिंसा नहीं थी,

  • सबसे खतरनाक बात यह थी कि
    👉 हमने इसे सामान्य मानना शुरू कर दिया था

3️⃣ फिर नेतृत्व ने जिम्मेदारी ली

कोई जादू नहीं हुआ। हिम्मत और जिम्मेदारी सामने आई।

  • देरी की जगह फैसले हुए
  • डर की जगह आत्मविश्वास आया
  • बहानों की जगह काम हुआ

लोगों को याद दिलाया गया कि:

  • डर हमेशा नहीं रहता
  • आत्मसम्मान गलत नहीं होता
  • चुप रहना समाधान नहीं है

धीरे-धीरे समाज फिर से खड़ा हुआ।

4️⃣ आत्मसम्मान और संस्कृति की वापसी

बदलाव साफ़ दिखाई देने लगा:

  • त्योहार फिर गर्व से मनाए जाने लगे
  • तीर्थ और धार्मिक स्थल सुधरे
  • जिन परंपराओं को नजरअंदाज़ किया गया था, उन्हें सम्मान मिला

यह सिर्फ़ विकास नहीं था। यह सोच में बदलाव था।

  • लोगों का खुद पर भरोसा लौट रहा था।

5️⃣ जब समाज मजबूत होता है

जब लोग डर से बाहर आते हैं:

  • डर पर चलने वाली राजनीति कमजोर पड़ जाती है
  • पुराने हथकंडे काम करना बंद कर देते हैं

लोगों ने:

  • सवाल पूछना शुरू किया
  • सोच-समझकर बोलना शुरू किया
  • अन्याय को चुपचाप सहने से मना किया

इसी वजह से
👉 जो ढाल समाज की रक्षा कर रही थी, वही निशाने पर आ गई

6️⃣ ढाल पर ही हमला क्यों होता है

यह बात सीधी है:

  • जब रास्ते में दीवार खड़ी होती है, तो वार दीवार पर ही होता है

इसलिए हम देखते हैं:

  • चरित्र हनन
  • झूठी कहानियाँ
  • नेतृत्व को कमजोर करने की लगातार कोशिशें

क्योंकि अगर ढाल टूटी,
👉 तो समाज फिर खुला शिकार बन जाएगा

7️⃣ आज की सबसे बड़ी समस्या: हमारी निष्क्रियता

  • यह सबसे कड़वी सच्चाई है।

जागने के बाद भी बहुत से लोग:

  • सिर्फ़ नौकरी और पैसे में लगे हैं
  • परिवार की सुविधाओं तक सीमित हैं
  • मनोरंजन में डूबे हुए हैं

लेकिन:

  • समाज की चिंता नहीं
  • संस्कृति की चिंता नहीं
  • देश को हल्के में लिया जा रहा है

8️⃣ अहंकार, आपसी बंटवारा और गलत दोषारोपण

एक और बड़ी समस्या है:

  • आपसी अहंकार की लड़ाइयाँ
  • जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर बंटवारा
  • देश से पहले निजी स्वार्थ

जैसे ही किसी की निजी सुविधा पर असर पड़ता है:

  • एकता टूट जाती है
  • पुराने झगड़े लौट आते हैं
  • गुस्सा अपनों पर ही निकलता है

कई लोग उसी नेतृत्व को दोष देने लगते हैं जो पिछले 11 वर्षों से:

  • देश की सुरक्षा
  • हमारी पहचान
  • हमारी संस्कृति और सभ्यता
    की रक्षा के लिए काम कर रहा है।

अक्सर यह भटकाव उन लोगों के बहकावे में hota है जिन्होंने पहले:

  • सत्ता का दुरुपयोग किया
  • संस्थाओं को कमजोर किया
  • समाज के दुख-दर्द को नज़रअंदाज़ किया

लेकिन हम इतिहास जल्दी भूल जाते हैं।

9️⃣ प्राथमिकताओं का सही क्रम

यह बात साफ़ समझनी होगी:

  • देश सुरक्षित है तो समाज सुरक्षित है
  • समाज सुरक्षित है तो धर्म और संस्कृति सुरक्षित हैं

अगर देश कमजोर हुआ:

  • संस्थाएँ टूटेंगी
  • गलत ताकतें हावी होंगी
  • तो सबसे पहले
    👉 धर्म, संस्कृति और समाज ही मिटेंगे

🔟 इतिहास की चेतावनी

इतिहास यह पहले ही दिखा चुका है:

  • 1947 में एक रात में पाकिस्तान में सब कुछ बदल गया
  • नरसंहार, जबरन धर्म परिवर्तन, पलायन
  • न कोई चेतावनी मिली न दूसरा मौका।

इतिहास चेतावनी देता है, लेकिन माफ़ नहीं करता

1️⃣1️⃣ जागरण को ज़िंदा रखना ज़रूरी है

जागरण एक बार की घटना नहीं है। यह रोज़ की जिम्मेदारी है।

  • नेतृत्व दिशा दे सकता है
  • क़ानून सुरक्षा दे सकते हैं
  • लेकिन समाज को खुद सतर्क रहना होगा

ज़रूरत है:

  • अहंकार छोड़कर एकता की
  • निजी सुविधा से ऊपर देश की
  • दूरदर्शिता की
  • उदासीनता नहीं, जागरूकता की

एक सरल फैसला

समाज सिर्फ़ दुश्मनों से नहीं गिरते। वे लापरवाही से गिरते हैं।

  • देश पहले।
  • फिर समाज।
  • फिर धर्म।
  • फिर निजी स्वार्थ।

यह राजनीति नहीं है। यह जीवित रहने का नियम है।

  • इसे भूलने से सभ्यताएँ खत्म हुई हैं।
  • इसे याद रखने से भविष्य सुरक्षित हो सकता है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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