सारांश
- 2014 से पहले के दशकों में भारत एक ऐसे तंत्र से जूझता रहा जहाँ राजनीतिक सत्ता का उपयोग भ्रष्टाचार, नीति-गत ठहराव और सामाजिक विभाजन के लिए किया गया।
- अनेक राजनेताओं ने ज्ञात आय से असंगत संपत्ति अर्जित की, जबकि तुष्टिकरण की राजनीति ने संस्थानों को कमजोर किया और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को क्षति पहुँचाई।
- 2014 के बाद सुधारों के माध्यम से संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत जवाबदेही लागू होने लगी
- जिससे जाँच के दायरे में आए लोगों का तीव्र विरोध स्वाभाविक है। यह प्रतिशोध नहीं, बल्कि कानून के शासन, राष्ट्रीय संप्रभुता और सभ्यतागत आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना का प्रयास है।
संस्थागत विचलन और नीतिगत जड़ता की कीमत
1) 2014 से पहले की राजनीतिक अर्थव्यवस्था: संस्थागत भ्रष्टाचार और नीति-गत ठहराव
समस्याएँ क्या थीं
- राज्य पर अभिजन कब्ज़ा: सत्ता को निजी विशेषाधिकार समझा गया।
- असंगत संपत्ति: घोषित आय से कहीं अधिक संपत्तियों के बार-बार खुलासे।
- नीति-गत ठहराव: गठबंधन दबाव, भय और रेंट-सीकिंग के कारण निर्णय अटके।
- आर्थिक रिसाव: अपारदर्शी अनुबंधों और देरी से विकास की गति धीमी हुई।
इसका असर
- अवसंरचना और विनिर्माण में खोए हुए वर्ष।
- शासन और बाज़ारों में भरोसे का क्षरण।
- महँगाई, रोजगार की कमी और कमजोर सार्वजनिक सेवाओं का बोझ आम नागरिक पर।
यह जवाबदेही का ठहराव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सहयोगी दलों के शासनकाल में अधिक स्पष्ट रहा।
2) सामाजिक-सांस्कृतिक क्षति: तुष्टिकरण और चयनात्मक प्रवर्तन
दिखे हुए पैटर्न
- चयनात्मक सेकुलरिज़्म: हिंदू परंपराओं, मंदिरों और त्योहारों पर असमान कठोरता।
- वोट-बैंक शासन: समान नागरिकता के बजाय समूह-तुष्टिकरण।
- नैतिक उलटफेर: राष्ट्रवाद को अतिवाद और सांस्कृतिक गर्व को असहिष्णुता बताया गया।
परिणाम
- सामाजिक ध्रुवीकरण और अविश्वास।
- असामाजिक गतिविधियों के विरुद्ध कमजोर निवारण।
- सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर ठंडा प्रभाव।
3) 2014 के बाद: सुधार, संस्थान और कानून के शासन की वापसी
क्या बदला
- सुधारों के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति: स्पष्ट जनादेश के साथ निर्णायक शासन—नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में।
- संस्थागत सक्रियता: वर्षों से अटकी फाइलें—बेनामी संपत्ति, मनी लॉन्ड्रिंग, विदेशी फंडिंग—जाँच के दायरे में आईं।
- पारदर्शिता उपाय: डिजिटलीकरण, DBT, GST, IBC और खरीद सुधारों से रिसाव घटा।
- रणनीतिक स्वायत्तता: सशक्त विदेश नीति से वैश्विक वार्ताओं में भारत की स्थिति मजबूत।
विरोध क्यों बढ़ा
- दंडहीनता का अंत: जवाबदेही को “उत्पीड़न” बताकर शोर।
- कथानक युद्ध: कानूनी जाँच तेज होने पर संस्थानों और नेतृत्व पर हमले।
4) शोर बनाम तथ्य: जवाबदेही ≠ उत्पीड़न
आम दावे—और वास्तविकता
- दावा: “लोकतंत्र खतरे में है।”
तथ्य: विधि-सम्मत प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत करती है। - दावा: “संस्थान पक्षपाती हैं।”
तथ्य: राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना काम करना विश्वसनीयता लौटाता है। - दावा: “यह प्रतिशोध है।”
तथ्य: निर्णय साक्ष्य और न्यायालय तय करते हैं।
निष्कर्ष:
कानून का शासन अपारदर्शिता पर पलने वालों को ही कठोर लगता है।
5) राष्ट्र-विरोधी इकोसिस्टम: आंतरिक अव्यवस्था, बाहरी प्रोत्साहन
अस्थिरता से किसे लाभ
- घरेलू तत्व जिन पर भ्रष्टाचार/अवैध फंडिंग की जाँच।
- वैचारिक सहयोगी जो सभ्यतागत पुनर्जागरण का विरोध करते हैं।
- बाहरी हित जिन्हें आत्मनिर्भर और सशक्त भारत असहज करता है।
प्रचलित रणनीतियाँ
- निवेशकों का भरोसा डगमगाना।
- अवसंरचना और सुधार योजनाओं को बाधित करना।
- घरेलू मुद्दों का अंतरराष्ट्रीयकरण।
6) कठोर कार्रवाई क्यों अनिवार्य है
सभ्यतागत सीख
- जब भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण संस्थानों को भीतर से खोखला करते हैं, राष्ट्र गिरते हैं।
- स्थिरता और समृद्धि के लिए समान कानून, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और संस्थागत मजबूती आवश्यक है।
नीतिगत प्राथमिकताएँ
- जाँचों को तार्किक कानूनी अंत तक पहुँचाना—न डर, न पक्षपात।
- अवैध फंडिंग का पर्दाफाश और पारदर्शिता का कड़ाई से पालन।
- संस्थानों की रक्षा—धमकी और दुष्प्रचार से।
- संतुलन की पुनर्स्थापना—सभी नागरिकों की समान सुरक्षा के साथ सभ्यतागत मूल्यों का सम्मान।
7) आगे की राह: विश्वास, स्वच्छता, निरंतरता
- स्वच्छ शासन सतत विकास की नींव है।
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास सामाजिक सौहार्द का आधार।
- संस्थागत विश्वसनीयता निवेश और वैश्विक सम्मान लाती है।
राष्ट्रीय एकता सुधारों को स्थायित्व देती है।
अंतिम विचार:
- शक्तिशालियों को जवाबदेह ठहराना तानाशाही नहीं—संवैधानिक कर्तव्य है। भारत का भविष्य निष्पक्षता, दृढ़ता और संस्थानों पर विश्वास के साथ सुधारों को पूर्ण करने में निहित है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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