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कॉंग्रेस और ठगबंधन

2024 के बाद कॉंग्रेस और ठगबंधन

सारांश

  • 2024 के लोकसभा चुनाव में 99 सीटों के भ्रमित करने वाले जश्न के बाद कॉंग्रेस और तथाकथित ठगबंधन की वास्तविकता तेज़ी से सामने आई।
  • लगातार राज्य और स्थानीय चुनावों में पराजय, सहयोगियों का किनारा करना, नेतृत्व संकट, और सोशल मीडिया पर फेक नैरेटिव व प्रोपेगैंडा—इन सबने मिलकर जनता का भरोसा तोड़ा और कॉंग्रेस को राजनीतिक अप्रासंगिकता की ओर धकेला।
  • इसके उलट, यह नकारात्मकता भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष रूप से लाभकारी साबित हुई, जबकि एंटी-नेशनल और एंटी-हिंदू इकोसिस्टम बौखलाहट में और अधिक उग्र होता चला गया।

भ्रम का जश्न, ज़मीनी हकीकत और राजनीतिक पतन

01. 99 सीटों का भ्रम: जश्न बनाम सच्चाई

    • 2024 के लोकसभा चुनाव में 99 सीटें मिलते ही कॉंग्रेस ने इसे “वापसी” का संकेत बताया।
    • टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया और पार्टी मंचों पर आत्ममुग्ध उत्सव—मानो सत्ता बस लौटने ही वाली हो।
    • लेकिन यह जश्न ज़मीनी समर्थन नहीं, बल्कि आत्म-भ्रम पर टिका था।

    जैसे ही चुनावी मौसम खत्म हुआ, वास्तविक राजनीति ने इस भ्रम का पर्दाफ़ाश कर दिया।

    2. लोकसभा के बाद: हार की सिलसिला-दर-सिलसिला

    • हरियाणा: जनता ने खोखले वादों को सिरे से नकारा।
    • दिल्ली: कॉंग्रेस राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक।
    • महाराष्ट्र: नेतृत्व और संगठन की कमजोरी उजागर।
    • बिहार: भरोसे का संकट; केवल नाम की साझेदारी।
    • मुंबई (BMC): करारी हार—लगभग सफ़ाया।

    निष्कर्ष: यह हारें संयोग नहीं, बल्कि विश्वसनीयता के पतन का परिणाम हैं।

    3. ठगबंधन में भरोसे का संकट

    • जम्मू-कश्मीर: उमर अब्दुल्ला ने कॉंग्रेस को बाहर का रास्ता दिखाया।
    • बिहार: तेजस्वी यादव ने हाशिये पर धकेला।
    • झारखंड: हेमंत सोरेन दूरी बनाते दिखे।
    • तमिलनाडु: स्टालिन की दो-टूक—“औकात में रहो।”

    क्षेत्रीय दलों के लिए कॉंग्रेस अब बोझ बनती जा रही है।

    4. फेक नैरेटिव और सोशल मीडिया युद्ध: आत्मघाती रणनीति

    सोशल मीडिया पर:

    • झूठे आरोप,
    • आधे-अधूरे तथ्य,
    • सेल्फ-स्टाइल्ड प्रोपेगैंडा गैंग।

    कॉंग्रेस/ठगबंधन यह स्वीकारने में विफल है कि:

    • बार-बार पकड़े जाने वाले फेक नैरेटिव जनता का भरोसा तोड़ते हैं।
    • नकारात्मकता की अति विश्वसनीयता को शून्य कर देती है।

    विरोधाभास: यही रणनीति भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ देती रही—क्योंकि जनता अब झूठ पहचानने लगी है।

    5. अच्छे नेताओं का पलायन: डूबते जहाज़ से छलांग

    पार्टी के कुछ गिने-चुने जमीनी और सक्षम नेता भविष्य बचाने के लिए किनारा कर रहे हैं।

    कारण:

    • नेतृत्व पर भरोसे का अभाव,
    • संगठनात्मक अराजकता,
    • स्पष्ट वैचारिक दिशा का न होना।

    संकेत साफ़: भीतर से ही पार्टी को अपने भविष्य पर भरोसा नहीं

    6. जहाँ सत्ता है, वहाँ भी अराजकता

    हिमाचल प्रदेश:

    • सरकार बैसाखियों पर।

    कर्नाटक:

    • गुटबाज़ी,
    • खुले टकराव,
    • नेतृत्व संकट।

    यह दर्शाता है कि समस्या विपक्ष में होने की नहीं, बल्कि नेतृत्व और विचारधारा की विफलता की है।

    7. एंटी-नेशनल, एंटी-हिंदू इकोसिस्टम की बौखलाहट

    लगातार चुनावी असफलताएँ → बढ़ती हताशा।

    नतीजा:

    • और तेज़ शोर,
    • सरकार, हिंदू समाज और सनातन धर्म पर हमले।

    कारण:

    • मोदी सरकार की स्थिरता,
    • प्रगतिशील नीतियाँ,
    • राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक चेतना का विस्तार।

    बौखलाहट में भौंकना तेज़, और विश्वसनीयता कम

    8. राहुल मॉडल: गैर-जिम्मेदार नेतृत्व

    संकट के समय:

    • चुनाव के आसपास भारत आगमन,
    • टिकट वितरण,
    • औपचारिक प्रचार,
    • और फिर विदेश प्रस्थान।

    समर्थक आज भी भ्रम में हैं

    • “एक दिन बैल दूध ज़रूर देगा।”

    पर ज़मीनी कार्यकर्ता निराश और दिशाहीन

    9. मुंबई (BMC) की जीत: बड़ा संकेत

    यह सिर्फ़ एक चुनावी जीत नहीं:

    • फेक नैरेटिव पर जागरूकता की जीत,
    • प्रोपेगैंडा पर सच की जीत,
    • और सनातन चेतना की जीत।

    संदेश स्पष्ट:

    • जनता भावनात्मक भ्रम से बाहर,
    • विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक आत्मसम्मान के साथ।

    10. आगे की राह

    कॉंग्रेस/ठगबंधन का संकट स्थायी है जब तक:

    • नेतृत्व में सुधार नहीं,
    • जनता से वास्तविक जुड़ाव नहीं,
    • और झूठे नैरेटिव से दूरी नहीं।

    अन्यथा, हर चुनाव उन्हें और तेज़ी से राजनीतिक हाशिये की ओर ले जाएगा।

    🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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