सारांश
- ए.आर. रहमान की संगीत प्रतिभा निर्विवाद है, लेकिन सार्वजनिक सम्मान केवल प्रतिभा से नहीं मिलता—वह समाज, संस्कृति और सभ्यता के प्रति संवेदनशीलता, कृतज्ञता और व्यवहार से बनता है।
- पिछले कुछ वर्षों में सनातन धर्म, हिंदू संस्कृति और भारतीय पहचान को लेकर रहमान के कुछ वक्तव्यों, मौन और दोहरे मानदंडों ने सनातनियों को गहरी पीड़ा पहुँचाई है।
- यह प्रकरण अब केवल एक कलाकार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस व्यापक समस्या का प्रतीक बन गया है जिसमें हिंदू समाज से कमाई कर सांस्कृतिक दूरी बनाई जाती है।
- आज जो उभर रहा है, वह घृणा नहीं बल्कि सचेत सांस्कृतिक चयन और आत्मसम्मान है।
रहमान प्रकरण क्यों महत्वपूर्ण है
- ए.आर. रहमान केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रभावशाली सांस्कृतिक व्यक्तित्व हैं। ऐसे में जब कोई सार्वजनिक हस्ती बार-बार सनातन धर्म या हिंदू सांस्कृतिक पहचान के प्रति उदासीन या नकारात्मक दिखती है, तो प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से व्यापक होती है।
- यह मुद्दा असहिष्णुता या “कैंसल कल्चर” का नहीं है, बल्कि परस्पर सम्मान, कृतज्ञता और जवाबदेही का है। रहमान प्रकरण ने हिंदू समाज को यह सोचने पर मजबूर किया है कि दशकों की सहिष्णुता के बदले उसे बार-बार उपेक्षा क्यों मिली।
1️⃣ हिंदू समाज से आजीविका, हिंदू संस्कृति से दूरी
रहमान की:
- प्रसिद्धि
- संपत्ति
- और वैश्विक पहचान
का बड़ा हिस्सा भारतीय सिनेमा, विशेषकर सनातन मूल्यों में रचे-बसे दर्शकों से आया है।
फिर भी समय के साथ:
- हिंदू सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से भावनात्मक दूरी
- सनातन धर्म पर होने वाले उपहास पर चुप्पी
- और कुछ धर्मों के प्रति संवेदनशीलता, लेकिन सनातन के प्रति नहीं
- जैसी प्रवृत्तियाँ दिखीं।
फ़िल्म जगत में तिलक जैसे हिंदू प्रतीकों पर आपत्ति से जुड़े किस्से भले ही अलग-अलग बहस योग्य हों, लेकिन उनकी निरंतरता इसलिए मायने रखती है क्योंकि वे सार्वजनिक व्यवहार के पैटर्न से मेल खाते हैं।
- बहुलतावादी समाज में चयनात्मक सहिष्णुता, असहिष्णुता ही लगती है।
2️⃣ “अच्छाई बनाम बुराई”: एक वाक्य, गहरा घाव
- “अच्छाई और बुराई” के बीच चयन वाले रहमान के कथन को व्यापक रूप से सनातन धर्म को ‘बुराई’ बताने के रूप में लिया गया।
यह पीड़ा क्यों पहुँची? क्योंकि सनातन धर्म:
- कोई कट्टर या बहिष्करणवादी विचारधारा नहींअन्य धर्मों को दानवीकरण नहीं करता
- हज़ारों वर्षों से विविधता को समेटता आया है
ऐसी सभ्यता को सरल नैतिक द्वंद्व में बाँधना—वह भी उससे लाभ उठाते हुए—कई लोगों को कृतघ्नता और अपमान जैसा लगा।
- सार्वजनिक व्यक्तियों को समझना चाहिए कि सभ्यतागत शब्द, सभ्यतागत परिणाम लाते हैं।
3️⃣ हिंदी: अवसर स्वीकार, पहचान से दूरी
रहमान के प्रति एक और नाराज़गी उनकी हिंदी को लेकर सार्वजनिक उदासीनता है, जबकि:
- करियर का बड़ा हिस्सा हिंदी सिनेमा से बना
- वैश्विक पहचान हिंदी गीतों से मिली
- आज भी हिंदी दर्शकों से कमाई होती है
यह भाषा-विवाद नहीं है। यह नैतिक संगति का प्रश्न है।
- जिस भाषा से रोज़गार मिले
- उसी से सार्वजनिक दूरी बनाई जाए
तो यह सांस्कृतिक अवसरवाद लगता है, सिद्धांत नहीं।
4️⃣ “सांप्रदायिक इंडस्ट्री” का नैरेटिव
हाल के वर्षों में काम कम मिलने पर फ़िल्म इंडस्ट्री को “सांप्रदायिक” बताना कई सवाल खड़े करता है:
- क्या हर करियर ढलान वैचारिक उत्पीड़न है?
- क्या दर्शकों की पसंद बदलना अपने आप में अपराध है?
- क्या हिंदू सांस्कृतिक आत्मविश्वास ही समस्या है?
हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण को “सांप्रदायिक” कहना धर्मनिरपेक्षता नहीं, अवैध है।
5️⃣ वैश्विक जीवन, भारतीय कमाई और नैतिक दृष्टि
वैश्विक जीवनशैली गलत नहीं है। लेकिन समस्या नैतिक दृष्टि (moral optics) की है:
- हिंदू समाज से भावनात्मक दूरी
- भारतीय संस्कृति की आलोचना
- लेकिन आर्थिक निर्भरता भारतीय दर्शकों पर
- यह भावना पैदा करता है कि लिया जा रहा है, लेकिन अपनाया नहीं जा रहा।
समाज केवल बाज़ार नहीं होता—वह भावनात्मक और सांस्कृतिक ताना-बाना भी होता है।
6️⃣ अंधी प्रशंसा से सचेत सांस्कृतिक चयन तक
- कोई:
- सरकारी प्रतिबंध
- सेंसरशिप
- या कानूनी कार्रवाई की माँग नहीं कर रहा।
जो उभर रहा है, वह है सचेत उपभोक्ता निर्णय:
- यदि कोई कलाकार आपके धर्म को नीचा दिखाए
- आपकी सभ्यता को नकारात्मक रूप में पेश करे
- और फिर भी आपसे समर्थन अपेक्षित रखे
तो उसका समर्थन न करना:
- न घृणा है
- न असहिष्णुता
- बल्कि आत्मसम्मान और सांस्कृतिक चेतना है
समर्थन स्वैच्छिक है—और समर्थन वापस लेना भी।
7️⃣ रहमान प्रकरण एक बड़े पैटर्न का प्रतीक है
यह प्रकरण इसलिए गूंजता है क्योंकि यह एक व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाता है:
- हिंदू समाज अवसर देता है
- सनातन धर्म सहिष्णुता देता है
- और बदले में उसे उपदेश, उपेक्षा या मौन मिलता है
दशकों तक हिंदुओं ने इसे “सेक्युलरिज़्म” के नाम पर सहा। अब वह चुप्पी टूट रही है।
सम्मान एकतरफ़ा नहीं होता
- सनातन धर्म सहिष्णुता सिखाता है—आत्म-विलोपन नहीं। समावेशिता का अर्थ यह नहीं कि अपने अपमान को वित्तपोषित किया जाए।
- रहमान प्रकरण बदले या बहिष्कार का नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण सभ्यतागत सीमा खींचने का विषय है।
- हिंदू कला का विरोध नहीं कर रहे। वे कृतघ्नता, दोहरे मानदंड और सांस्कृतिक तिरस्कार का विरोध कर रहे हैं।
सनातनी विकल्पों का समर्थन, अंधे समर्थन का त्याग और पारस्परिक सम्मान की माँग:
- शांतिपूर्ण है
- लोकतांत्रिक है
- और समय से बहुत देर से आई है
यह उग्रवाद नहीं— यह सभ्यतागत आत्मसम्मान का जागरण है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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