सारांश
- मानव इतिहास यह स्पष्ट दिखाता है कि जब आस्था सत्ता और निरपेक्ष (अबसोल्यूट) विचारधाराओं से जुड़ जाती है, तो वह बार-बार युद्धों और व्यापक हिंसा का कारण बनती है।
- आज यह खतरा अभूतपूर्व स्तर पर पहुँच चुका है। दुनिया लगभग परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी है—एक ओर चल रहे भू-राजनीतिक टकराव, दूसरी ओर आस्था–आधारित विचारधाराएँ, उग्रवाद और आतंकवाद, जो आग में घी का काम कर रहे हैं।
- यदि इन खतरों को वैश्विक सहयोग और निर्णायक कार्रवाई के माध्यम से तत्काल नहीं रोका गया, तो पृथ्वी से मानवीय और शांतिपूर्ण सभ्यता का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है।
- सनातन दर्शन, विश्व की सबसे प्राचीन और बहुलतावादी सभ्यतागत परंपराओं में से एक, एक यथार्थवादी विकल्प प्रस्तुत करता है—परस्पर विश्वास, साझा कल्याण और आत्म–अनुशासन पर आधारित सभी आस्थाओं का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व।
- साथ ही, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को राजनीतिक शिष्टाचार से आगे बढ़ते हुए—भारत और इज़राइल की तरह—आस्था-आधारित उग्रवाद और आतंक के विरुद्ध दृढ़ व सिद्धांतगत कदम उठाने होंगे, ताकि दुनिया को सुखी, स्थिर और शांतिपूर्ण बनाया जा सके
1) कगार पर खड़ी दुनिया: आस्था, भू–राजनीति और परमाणु जोखिम
आज की वैश्विक स्थिति अत्यंत खतरनाक है:
- कई परमाणु–सशस्त्र देश टकराव की स्थिति में हैं
- क्षेत्रीय संघर्ष तेज़ी से व्यापक युद्ध में बदल सकते हैं
- प्रॉक्सी युद्ध और वैचारिक विभाजन निवारण (deterrence) की सीमाएँ धुंधली करते हैं
पिछले युगों के विपरीत, आज एक गलत आकलन सभ्यताओं का विनाश कर सकता है। भू-राजनीति में आस्था-आधारित निरपेक्षता मिलते ही संघर्ष अस्तित्वगत और गैर–समझौतावादी बन जाता है।
2) आस्था–आधारित विचारधाराएँ और उग्रवाद: जलती आग में ईंधन
आस्था-आधारित विचारधाराएँ तब घातक बनती हैं जब वे:
- एकमात्र दैवी सत्य का दावा करती हैं
- हिंसा को पवित्र कर्तव्य बताती हैं
- दूसरों का अमानवीकरण करती हैं
- सहअस्तित्व को कमजोरी मानती हैं
उग्रवाद और आतंकवाद इन धारणाओं का उपयोग करके:
- सीमाओं के पार युवाओं को कट्टर बनाते हैं
- राज्यों को भीतर से अस्थिर करते हैं
- अतिरंजित प्रतिशोध को उकसाते हैं
- वैश्विक शांति और विश्वास को कमजोर करते हैं
परमाणु युग में वैचारिक उन्माद स्थानीय समस्या नहीं—ग्रहीय खतरा है।
3) आतंकवाद: आस्था–निरपेक्षता का असममित हथियार
आस्था-आधारित उग्रवाद से प्रेरित आतंकवाद:
- जानबूझकर नागरिकों को निशाना बनाता है
- अराजकता और ध्रुवीकरण पर पलता है
- प्रतिशोध के चक्र पैदा करता है
- मानवीय मानदंडों को कमजोर करता है
जहाँ शहादत की कामना जीवन के मूल्य को नकार दे, वहाँ पारंपरिक निवारण विफल हो जाता है—इसलिए निवारक और निर्णायक कार्रवाई आवश्यक है।
4) राजनीतिक शिष्टाचार बनाम सभ्यतागत अस्तित्व
दशकों तक कई समाजों ने:
- आहत होने के भय से उग्रवादी विचारधाराओं से टकराव टाला
- सहिष्णुता को तुष्टिकरण से गड्ड-मड्ड किया
- आतंक को सिद्धांत की जगह केवल शिकायत माना
राजनीतिक शिष्टाचार ने कार्रवाई में देरी कराई, जिससे उग्रवादी पारिस्थितिकी तंत्र पनपे। परमाणु युग में यह देरी विनाशकारी हो सकती है।
5) भारत और इज़राइल: खतरे को गंभीरता से लेना
भारत और इज़राइल कुछ महत्वपूर्ण सबक देते हैं:
- आस्था-आधारित उग्रवाद को अस्तित्वगत खतरे के रूप में पहचान
- सशक्त खुफिया, निवारण और प्रतिउग्रवाद ढाँचे
- प्रतीकात्मक नहीं, निर्णायक कार्रवाई की तत्परता
- लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ सुरक्षा का संतुलन
अनुभव बताता है: शांति तभी टिकती है, जब शांति को नष्ट करने वाले खतरों को निष्प्रभावी किया जाए।
6) निष्क्रियता की कीमत: मानवीय सभ्यता पर संकट
यदि आस्था-आधारित उग्रवाद और आतंकवाद को तुरंत नहीं रोका गया तो:
- मानवीय मानदंड क्षीण होंगे
- नागरिक पीड़ा सामान्य बन जाएगी
- परमाणु escalation का जोखिम बढ़ेगा
- वैश्विक विश्वास और सहयोग टूटेगा
शांतिपूर्ण और मानवीय समाज की अवधारणा ही मिट सकती है।
7) साझा सत्य: सभी धर्मों के मानवीय मूल्य समान
सिद्धांतों में भिन्नता के बावजूद, सभी धर्म सिखाते हैं:
- करुणा और दया
- सत्य और ईमानदारी
- अहिंसा और क्षमा
- सेवा और परोपकार
- न्याय और मानवीय गरिमा
हिंसा तब जन्म लेती है, जब इन मूल्यों को श्रेष्ठतावाद और प्रभुत्व के नीचे रख दिया जाता है।
8) सनातन दर्शन: भोलेपन के बिना शांतिपूर्ण सहअस्तित्व
सनातन दर्शन दोहरी सीख देता है:
- नैतिक दृष्टि: वसुधैव कुटुम्बकम्—सम्पूर्ण विश्व एक परिवार
- व्यावहारिक यथार्थवाद: धर्म का अर्थ है समाज की रक्षा उन शक्तियों से जो सामंजस्य नष्ट करती हैं
यह समर्पण के बिना सहअस्तित्व , अंधत्व के बिना सहिष्णुता , और तुष्टिकरण के बिना शांति सिखाता है।
9) वैश्विक सहयोग अब कैसा होना चाहिए
तत्काल वैश्विक कदम:
- आस्था-आधारित उग्रवादी नेटवर्कों के विरुद्ध संयुक्त कार्रवाई
- आतंक वित्तपोषण और वैचारिक निर्यात पर शून्य सहिष्णुता
- खुफिया साझा-करण और समन्वित निवारण
- बहुलतावाद को बढ़ावा देने वाली शिक्षा
- मुक्त समाजों को वैचारिक उपद्रव से सुरक्षा
खंडित प्रतिक्रियाएँ पर्याप्त नहीं हैं।
10) एकमात्र टिकाऊ भविष्य: शक्ति के साथ सहअस्तित्व
भविष्य के लिए दो समानांतर प्रतिबद्धताएँ आवश्यक हैं:
- सनातन–प्रेरित सहअस्तित्व: परस्पर विश्वास, साझा कल्याण, बहुलता
- निर्णायक सुरक्षा कार्रवाई: हिंसा का महिमामंडन करने वाली विचारधाराओं और नेटवर्कों का उन्मूलन
शांति इच्छाधारी सोच से नहीं, नैतिक स्पष्टता और रणनीतिक दृढ़ता से टिकती है
अभी कार्य करें—या सब कुछ जोखिम में डाल दें
l आज दुनिया एक निर्णायक मोड़ पर है। आस्था–आधारित विचारधाराएँ, उग्रवाद और आतंकवाद—परमाणु भू–राजनीति के साथ मिलकर—मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुके हैं।
l राजनीतिक शिष्टाचार के नाम पर इन खतरों की अनदेखी करना मानवीय सभ्यता को समाप्त कर सकता है।
- सनातन दर्शन मानवता को एक कालातीत नैतिक दिशा–सूचक देता है, जबकि भारत और इज़राइल का अनुभव निर्णायक कार्रवाई की अनिवार्यता दिखाता है।
- यदि राष्ट्र एकजुट होकर—उग्रवाद के विरुद्ध कठोर, साझा मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध, और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए संकल्पबद्ध—कार्य करें, तो दुनिया को सुखी, सुरक्षित और सामंजस्यपूर्ण बनाया जा सकता है।
कार्य करने का समय अभी है कल नहीं।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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