सारांश
- दशकों तक हिंदू समाज को छद्म–धर्मनिरपेक्षता और एकतरफ़ा “भाईचारे” के नाम पर आश्वस्त किया गया—जहाँ नियम, त्याग और संयम केवल हिंदुओं से अपेक्षित रहे, जबकि दूसरों के लिए वही मानक लागू नहीं हुए।
- इस असंतुलन ने तुष्टिकरण को नीति बनाया, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक तनाव बढ़ा, कुछ तत्व अधिक आक्रामक हुए, और देश की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता पर प्रश्न खड़े हुए।
- आज राष्ट्रवादी सरकार भारत को आत्मनिर्भर, सुरक्षित और वैश्विक महाशक्ति बनाने का प्रयास कर रही है, पर समाज के पर्याप्त राजनीतिक–सामाजिक समर्थन के बिना यह लक्ष्य कठिन और धीमा हो रहा है।
- यह लेख डर नहीं, जागरण का आह्वान है—आज नहीं जागे, तो कल विकल्प सीमित होंगे।
यह राजनीति नहीं, सभ्यतागत ज़िम्मेदारी है
- पिछले 15 महीनों से नेशनल हिंदूइज़्म बोर्ड के माध्यम से मेरा प्रयास किसी पद, वेतन या प्रायोजन के लिए नहीं है।
स्पष्ट है—
- न किसी पार्टी से वेतन
- न किसी नेता से धन
- न कोई निजी लाभ
प्रेरणा केवल आप, आपका परिवार और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।
- आज चुप रहना, कल पछतावे का कारण बन सकता है—इसी चेतना से यह अपील है।
1️⃣ सबसे बड़ा भ्रम: “मैं ठीक हूँ, इसलिए सब ठीक है”
यह मानसिकता सबसे खतरनाक है—
- मेरी नौकरी/व्यवसाय ठीक है
- मेरे बच्चों को अभी समस्या नहीं
- मेरे इलाके में शांति है
लेकिन इतिहास बताता है कि राष्ट्रीय पतन व्यक्तिगत संकट से पहले शुरू होता है।
- धीरे-धीरे संस्थाएँ कमजोर होती हैं, मानक ढीले पड़ते हैं, और जब व्यक्तिगत स्तर पर असर दिखता है—तब बहुत देर हो चुकी होती है।
2️⃣ दशकों की ठगी: छद्म–धर्मनिरपेक्षता और एकतरफ़ा भाईचारा
पिछली सरकारों कर बारे में यह व्यापक धारणा बनी कि—
- “धर्मनिरपेक्षता” का बोझ हिंदुओं पर असमान रूप से डाला गया
- “भाईचारा” एकतरफ़ा अपेक्षा बन गया
- हिंदू परंपराओं/संस्थानों पर कठोरता, दूसरों पर नरमी
- नीति-निर्णयों में तुष्टिकरण को प्राथमिकता
इस असंतुलन ने:
- सामाजिक विश्वास को कमजोर किया
- समान नागरिक मानकों की भावना को क्षति पहुँचाई
- और हिंदू समाज के हितों को पीछे धकेला
3️⃣ तुष्टिकरण के दुष्परिणाम: सामाजिक तनाव और सुरक्षा की चिंता
जब नीति-स्तर पर असमानता लंबे समय तक चलती है—
- कुछ समूहों में अधिकार–बोध बढ़ता है
- कानून का समान अनुप्रयोग कमजोर पड़ता है
- कट्टरता/आक्रामकता को अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिलता है
परिणामस्वरूप:
- आंतरिक सुरक्षा पर दबाव
- सामाजिक समरसता में दरार
- और राष्ट्रीय संप्रभुता पर प्रश्न उठते हैं
4️⃣ विदेशी मंचों पर हस्तक्षेप की धारणा: क्यों चिंता बढ़ी
हाल के वर्षों में यह भी महसूस किया गया कि—
कुछ राजनीतिक-वैचारिक समूह भारत-विरोधी वैश्विक लॉबी/नेटवर्क्स के साथ मिलकर:
- राष्ट्रीय नीतियों को विदेशी मंचों पर बदनाम करने
- “हस्तक्षेप” का माहौल बनाने
- और चुनी हुई सरकार को अस्थिर दिखाने की कोशिशें करते हैं।
यह प्रवृत्ति:
- राष्ट्रीय निर्णय–स्वतंत्रता को चुनौती देती है
- और देश के हितों के विरुद्ध जाती है
5️⃣ इतिहास की चेतावनी: विफल राज्य कैसे बनते हैं
पाकिस्तान और बांग्लादेश किसी एक दिन में विफल नहीं हुए—
- “सब ठीक है” का भ्रम
- चेतावनियों की अनदेखी
- संस्थागत क्षरण
- और सामाजिक विभाजन
- अंततः देश अस्तित्व–संकट में फँसते हैं।
भारत के साथ ऐसा न हो—इसके लिए समय रहते जागना आवश्यक है।
6️⃣ आज का अंतर: राष्ट्रवादी सरकार—लेकिन अकेली
आज एक ऐसी सरकार काम कर रही है जो—
- आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखती है
- सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और संस्कृति—तीनों पर साथ-साथ काम करती है
- भारत को वैश्विक महाशक्ति बनाने की स्पष्ट दृष्टि रखती है
पर सच यह है—
- सरकार अकेले सब कुछ नहीं कर सकती। उसे समाज का नैतिक समर्थन, वैचारिक स्पष्टता और धैर्य चाहिए।
7️⃣ समर्थन की कमी: लक्ष्य में देरी क्यों?
समस्या प्रयासों की नहीं, सामूहिक समर्थन की कमी की है—
- बहुत से लोग तमाशबीन बने रहते हैं
- झूठे/भ्रामक नैरेटिव का समय रहते प्रतिवाद नहीं होता
- तटस्थता को सुरक्षा समझ लिया जाता है
परिणाम:
8️⃣ नागरिक की भूमिका: सरकार से पहले समाज
राष्ट्र जाग्रत समाज से बनता है। आप क्या कर सकते हैं?
- असमान मानकों पर सवाल उठाएँ
- तथ्य-आधारित चर्चा करें, भ्रम का प्रतिवाद करें
- राष्ट्रहित के प्रयासों का खुला समर्थन दें
- परिवार/समुदाय में समान नागरिक मानकों की बात रखें
आज तटस्थता, समर्थन नहीं—अनुपस्थिति है।
9️⃣ यह अपील है—डर नहीं
यह किसी पर आरोप लगाने का संदेश नहीं, बल्कि ईमानदार अपील है—
- अपने सुरक्षित बुलबुले से बाहर आइए
- राष्ट्रीय परिदृश्य को समग्र रूप से देखिए
- असंतुलन और तुष्टिकरण की कीमत समझिए
- और राष्ट्रहित के साथ डटकर खड़े होइए
🔟 निर्णय का क्षण: अभी या कभी नहीं
भारत के पास आज:
- नेतृत्व, दृष्टि और अवसर सबकुछ है लेकिन समय सीमित है।
इतिहास उन समाजों को माफ़ नहीं करता जो खतरे पहचानकर भी आराम में बैठे रहते हैं।
- आज जागना ही सबसे बड़ा देशभक्ति का कार्य है। कल शायद विकल्प सीमित हों।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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