1. अमेरिका की खोखली सख्ती – भारत को आसान निशाना बनाना
अमेरिका खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और महाशक्ति कहता है, लेकिन उसके फैसले अक्सर दोहरे मानकों से भरे होते हैं। हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25% टैरिफ लगा दिया, यह कहते हुए कि भारत रूस से तेल और हथियार खरीदकर युद्ध को बढ़ावा दे रहा है।
लेकिन सवाल है – यही सख्ती चीन या यूरोप पर क्यों नहीं दिखाई जाती?
- चीन रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार है, फिर भी उस पर न कोई टैरिफ और न ही कोई प्रतिबंध।
- यूरोप युद्ध के बीच रूस से सैकड़ों अरब डॉलर का गैस, तेल और स्टील खरीदता रहा, लेकिन अमेरिका चुप रहा।
👉 साफ़ है कि भारत को “आसान निशाना” बनाया गया क्योंकि अमेरिका जानता है कि भारत अभी भी विकासशील देशों का प्रतिनिधि है और दबाव डालना आसान है। लेकिन यह उनकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी।
2. रूस से व्यापार – अमेरिका और यूरोप की असलियत
अमेरिका भारत पर आरोप लगाता है कि रूस से उसका व्यापार युद्ध को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन आंकड़े उल्टी कहानी कहते हैं।
- 2022 से 2025 तक अमेरिका ने खुद रूस से 25.7 अरब डॉलर का सामान खरीदा – जिसमें यूरिया, पैलेडियम, यूरेनियम और एयरक्राफ्ट पार्ट्स शामिल थे।
- इसी अवधि में यूरोपीय देशों – जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्य – ने रूस से 458 अरब डॉलर का तेल, गैस और स्टील खरीदा।
👉 यह सब तब हुआ जब रूस-यूक्रेन युद्ध जारी था। यानी अमेरिका और यूरोप दोनों का असली मकसद नैतिकता नहीं बल्कि अपने आर्थिक फायदे हैं।
3. चीन पर चुप्पी – अमेरिकी मजबूरी
चीन रूस का सबसे बड़ा खरीदार है, वह रूस के तेल का लगभग आधा खरीद लेता है। अगर अमेरिका सचमुच रूस को कमजोर करना चाहता, तो चीन पर प्रतिबंध लगाता।
लेकिन ऐसा करने से –
- अमेरिकी जनता को और महंगाई झेलनी पड़ेगी।
- बेरोजगारी और औद्योगिक संकट और बढ़ जाएगा।
👉 इसलिए अमेरिका चीन पर चुप है और भारत पर दबाव डालता है। यह उसकी मजबूरी है और यह उसकी कमज़ोरी का सबसे बड़ा प्रमाण है।
4. अमेरिकी अर्थव्यवस्था का पतन – अपने ही फैसलों का शिकार
अमेरिका की टैरिफ नीति सिर्फ दूसरों को नहीं, खुद को भी नुकसान पहुँचा रही है।
- हाल ही में कनाडा ने अमेरिका के 4.5 अरब डॉलर के डेयरी उत्पाद लौटा दिए। अमेरिकी किसानों को दूध नालियों में बहाना पड़ा।
- हजारों किसान अब दिवालियेपन की कगार पर हैं।
- रोजमर्रा की चीज़ों के दाम 30-50% तक बढ़ गए हैं।
- जनता में असंतोष बढ़ रहा है, और अमेरिकी राजनीति अंदर से खोखली हो रही है।
👉 यह वही स्थिति है जो सोवियत संघ के पतन से पहले दिखी थी।
5. भारत की यात्रा – गुलामी से वैश्विक नेतृत्व तक
भारत का इतिहास इसके विपरीत है।
- 1991 – भारत को IMF से कर्ज लेना पड़ा, सोना गिरवी रखना पड़ा।
- 2014 से पहले – कांग्रेस सरकारों ने भ्रष्टाचार, घोटालों और वोट बैंक राजनीति से अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया।
- 2014 के बाद मोदी सरकार –
> भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग पर नकेल।
> बुनियादी ढांचे, रक्षा, डिजिटल और मैन्युफैक्चरिंग में निवेश।
> आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान।
> 21वीं सदी का सबसे बड़ा डिजिटल ट्रांजिशन।
- रिकॉर्ड विदेशी निवेश और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना।
👉 आज भारत वह देश है जिसने कभी सोना गिरवी रखा था और अब IMF, UN, G20 और BRICS में वैश्विक एजेंडा सेट करने वाला देश बन चुका है।
6. इतिहास का चक्र – ढलती शक्तियाँ, उभरता भारत
इतिहास गवाह है कि कोई भी शक्ति हमेशा के लिए हावी नहीं रहती।
- कभी पुर्तगाल, स्पेन, नीदरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन ने दुनिया पर राज किया।
- लेकिन समय के साथ उनका साम्राज्य इतिहास में विलीन हो गया।
- अब वही दौर अमेरिका पर आ रहा है।
- अमेरिका का कर्ज GDP से लगभग दोगुना है, डॉलर पर भरोसा कम हो रहा है और डेडॉलराइजेशन की प्रक्रिया तेज हो चुकी है।
👉 आने वाले समय में अमेरिका एक ढलती ताक़त और भारत एक उभरती शक्ति के रूप में सामने आएंगे।
7. भारत – 21वीं सदी का शक्ति केंद्र
भारत अब सिर्फ एक क्षेत्रीय ताक़त नहीं बल्कि एक वैश्विक संतुलनकारी शक्ति है।
- युवा शक्ति – 65% आबादी युवाओं की।
- लोकतंत्र – दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र।
- आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था – विदेशी दबाव झेलने में सक्षम।
- सैन्य शक्ति – एशिया की सबसे बड़ी ताक़त और आधुनिक हथियारों से लैस।
- वैश्विक नेतृत्व – G20, BRICS और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर निर्णायक भूमिका।
👉 यह साफ है कि 21वीं सदी भारत की होगी।
- अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी उसकी हताशा और ढलते वर्चस्व का प्रतीक है। भारत को निशाना बनाना उसकी सबसे बड़ी भूल है।
- जहाँ अमेरिका का सूरज ढल रहा है, वहीं भारत का सूर्योदय हो चुका है।
- यह सिर्फ शुरुआत है – आने वाले दशकों में भारत न केवल एशिया बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा शक्ति केंद्र बनेगा।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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