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वैचारिक विरासत

औपनिवेशिक शासन से भी अधिक घातक वैचारिक विरासत

कांग्रेस शासन की 70 वर्षों की नीतिगत समीक्षा

  • स्वतंत्रता के बाद भारत को राजनीतिक आज़ादी तो मिली, लेकिन वैचारिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता लंबे समय तक अधूरी रही।
  • दशकों तक सत्ता में रही कांग्रेस सरकारों पर यह आरोप रहा है कि उन्होंने औपनिवेशिक सोच, तुष्टिकरण की राजनीति और असंतुलित धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से भारत की सनातन परंपराओं, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता को कमजोर किया।
  • यह लेख किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन नीतियों और वैचारिक प्रवृत्तियों की समीक्षा है, जिनका दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय समाज पर पड़ा। उद्देश्य संघर्ष नहीं, बल्कि सुधार, संतुलन और आत्ममंथन है।

1. सांस्कृतिक प्रतीकों को हाशिये पर डालने की प्रवृत्ति

  • सार्वजनिक संस्थानों, शैक्षणिक परिसरों और प्रसारण माध्यमों से भारतीय आध्यात्मिक प्रतीकों की उपस्थिति धीरे-धीरे कम होती गई।
  • श्लोक, प्रार्थनाएँ और सांस्कृतिक उद्घोष, जो राष्ट्रीय चेतना और आत्मगौरव से जुड़े थे, उन्हें “निरपेक्षता” के नाम पर विवादास्पद बना दिया गया।

इसके कारण नई पीढ़ी में:

  • अपनी संस्कृति के प्रति संकोच
  • और सार्वजनिक जीवन में परंपराओं से दूरी बढ़ती चली गई।

2. धर्मनिरपेक्षता बनाम तुष्टिकरण: संतुलन का अभाव

  • संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है।
  • व्यवहार में यह कई बार चयनात्मक दृष्टिकोण में बदलती दिखाई दी।
  • कुछ धार्मिक परंपराओं को विशेष संरक्षण मिला, जबकि कुछ पर नियंत्रण या उपेक्षा हुई।

इससे समाज में यह धारणा बनी कि:

  • राज्य निष्पक्ष नहीं,
  • बल्कि राजनीतिक लाभ के अनुसार झुकाव रखता है।

3. मंदिर, ट्रस्ट और संस्थागत असमानता

  • अनेक राज्यों में मंदिरों और उनकी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण लंबे समय तक बना रहा।
  • नियुक्तियाँ, लेखा-परीक्षा और प्रशासनिक हस्तक्षेप ने धार्मिक स्वायत्तता पर प्रश्न खड़े किए।
  • वहीं अन्य धर्मस्थलों को अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिली।
  • इससे धार्मिक समानता और संवैधानिक निष्पक्षता पर बहस तेज हुई।

4. शिक्षा और इतिहास: एकांगी प्रस्तुति का प्रभाव

इतिहास के पाठ्यक्रमों में:

  • मध्यकालीन संघर्षों और सांस्कृतिक क्षति का संतुलित चित्रण नहीं हुआ।
  • भारतीय प्रतिरोध, पुनर्निर्माण और सभ्यतागत दृढ़ता को सीमित स्थान मिला।

परिणामस्वरूप:

  • आत्मगौरव में कमी
  • और अपने अतीत के प्रति झिझक पीढ़ियों में देखने को मिली।

5. आपातकाल: लोकतंत्र पर सबसे गहरा आघात

1975–77 का आपातकाल:

  • मौलिक अधिकारों का निलंबन
  • प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश
  • विपक्ष का दमन लेकर आया।

यह घटना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक चेतावनी के रूप में दर्ज है।

6. राष्ट्रीय सुरक्षा और निर्णायकता पर उठते सवाल

  • कश्मीर, सीमापार आतंकवाद, अवैध घुसपैठ और विदेश नीति जैसे मुद्दों पर
    निर्णयों की कठोरता और दूरदर्शिता पर सवाल उठते रहे।

एक वर्ग का मानना रहा कि:

  • राष्ट्रीय हितों की तुलना में
  • राजनीतिक संतुलन और छवि प्रबंधन को अधिक महत्व दिया गया।
    •  

7. सामाजिक नीतियाँ और विभाजन की राजनीति

सामाजिक न्याय आवश्यक है, लेकिन जब नीतियाँ:

  • पहचान-आधारित ध्रुवीकरण बढ़ाएँ
  • साझा राष्ट्रीय पहचान को कमजोर करें तो समाज दीर्घकाल में बंटता है।
    •  
  • जाति, वर्ग और समुदाय की राजनीति ने समरसता के बजाय प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया।

8. समग्र प्रभाव: सांस्कृतिक संकोच और आत्मविश्वास की कमी

इन दशकों की नीतियों का संयुक्त प्रभाव यह रहा कि:

  • बहुसंख्यक समाज में अपराधबोध-सा भाव पैदा हुआ
  • अपनी परंपराओं पर गर्व करना भी विवादास्पद बना दिया गया
  • राष्ट्रवाद और संस्कृति को रक्षात्मक विषय के रूप में प्रस्तुत किया गया।

9. हाल के वर्षों में दिशा परिवर्तन

हाल के समय में:

  • सांस्कृतिक आत्मविश्वास की वापसी
  • इतिहास और परंपरा पर खुला विमर्श
  • विकास, सुरक्षा और संस्कृति के बीच संतुलन देखने को मिला है।

यह दर्शाता है कि लोकतंत्र में नीतियाँ बदली जा सकती हैं, यदि जनता सजग हो।

10. आलोचना का उद्देश्य—संघर्ष नहीं, संतुलन

  • इस विमर्श का लक्ष्य किसी समुदाय को दोषी ठहराना नहीं है।

उद्देश्य है:

  • नीतिगत भूलों से सीख लेना
  • वास्तविक धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करना
  • और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना।

संतुलन, संवाद और आत्ममंथन ही भारत को एक सशक्त राष्ट्र और सभ्यतागत मार्गदर्शक बना सकते हैं।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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