Skip to content Skip to sidebar Skip to footer
लोकतंत्र

लोकतंत्र की असली परीक्षा — नैतिक राजनीति बनाम सत्ता का दुरुपयोग

  • भारत का लोकतंत्र हमेशा से एक गहरे सवाल से जूझता रहा है — क्या सत्ता जनता की सेवा के लिए है, या केवल कुर्सी और व्यक्तिगत स्वार्थ बचाने का साधन?
  • आज यह सवाल फिर से हमारे सामने है क्योंकि मोदी सरकार ने एक ऐसा ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसने पूरे विपक्ष की बेचैनी बढ़ा दी है।

मोदी सरकार का ऐतिहासिक कदम खुद को भी शामिल किया नियम में

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में जो नए विधेयक लाए हैं, वे केवल विपक्ष या अन्य दलों के नेताओं के लिए नहीं हैं। बल्कि, इनका दायरा स्वयं प्रधानमंत्री तक है।
  • यानी यदि प्रधानमंत्री (मोदीजी खुद भी), किसी गंभीर आपराधिक मामले में गिरफ्तार होकर 30 दिन तक जेल में रहते हैं, तो वे भी स्वतः 31वें दिन पद से मुक्त हो जाएंगे।

👉 इतिहास गवाह है कि किसी भी प्रधानमंत्री ने अपने लिए ऐसा नैतिक और कठोर प्रावधान लागू करने का साहस नहीं दिखाया।
👉 यह कदम स्पष्ट करता है कि मोदीजी केवल दूसरों पर नियम नहीं थोप रहे, बल्कि खुद को भी उसी कसौटी पर रख रहे हैं।

विपक्ष का शोर आखिर क्यों डर है उन्हें?

  • इस विधेयक के आते ही विपक्षी दलों में हड़कंप मच गया।
  • वे इसे ‘तानाशाही’ और ‘लोकतंत्र की हत्या’ बताने लगे।

लेकिन सवाल उठता है — यदि विपक्ष निर्दोष है, तो उन्हें डर किस बात का है?
क्या उन्हें यह भय है कि उनके नेता जेल में जाकर भी सत्ता का आनंद नहीं ले पाएंगे?
क्या यह विधेयक उन लोगों की राजनीति को खत्म कर देगा, जो अपराध और भ्रष्टाचार को राजनीति का साधन मानते हैं?

इतिहास की तुलना इंदिरा गांधी बनाम नरेंद्र मोदी

भारत के लोकतंत्र ने दो बिल्कुल अलग तस्वीरें देखी हैं:

1975 — इंदिरा गांधी का संविधान संशोधन

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया।
  • कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने आपातकाल लगाया।
  • संविधान संशोधन कर खुद को कानून से ऊपर बना लिया।

परिणाम: लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय, सेंसरशिप, जेलों में बंद विपक्ष, और नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन।

2025 — नरेंद्र मोदी का संविधान संशोधन

  • मोदीजी खुद को भी कानून के दायरे में शामिल कर रहे हैं।
  • कह रहे हैं कि यदि प्रधानमंत्री भी जेल में रहेगा तो 31वें दिन पदमुक्त होगा।
  • परिणाम: राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता का नया युग

👉 यही फर्क है सत्ता बचाने वाली राजनीति और देश सुधारने वाली राजनीति में

न्यायपालिका की भूमिका सुधार बनाम अड़चन

लोकतंत्र तीन स्तंभों पर खड़ा है — विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका।
लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि न्यायपालिका अपनी भूमिका कैसे निभा रही है?

  • क्या अदालतें वाकई जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं?
  • क्यों कई गंभीर मामले वर्षों तक लटकाए जाते हैं?
  • क्यों कुछ मामलों पर अदालतें तुरंत सक्रिय हो जाती हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा,  और भ्रष्टाचार जैसे मामलों में अनुचित विलंब होता है?

👉 न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि समय पर होना चाहिए।
👉 वर्षों तक लंबित पड़े मामले, जनता के विश्वास को तोड़ते हैं और अपराधियों को राजनीतिक सुरक्षा देते हैं।

लोकतंत्र में सहयोग, टकराव नहीं होना चाहिए

  • यह सही समय है जब संसद और न्यायपालिका को एकदूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि एकदूसरे के साथ काम करना चाहिए।
  • संसद का दायित्व है कि वह नए और कठोर कानून बनाए।
  • न्यायपालिका का दायित्व है कि वह उन कानूनों पर समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करे।
  • यदि दोनों संस्थाएँ सहयोग करेंगी, तभी देश विकास, सुशासन और नैतिक राजनीति की ओर बढ़ सकेगा।

जनता की अपेक्षा अपराधमुक्त राजनीति

आज आम नागरिक यही चाहता है:

  • राजनीति में अपराधियों की जगह न हो।
  • भ्रष्टाचारियों को जेल भेजा जाए और वे पद पर बने न रहें।
  • संसद और न्यायपालिका दोनों जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरें।

मोदी सरकार के इन विधेयकों ने जनता के मन में उम्मीद जगाई है कि आने वाले समय में राजनीति सचमुच स्वच्छ और जवाबदेह बनेगी।

असली स्वतंत्रता और नैतिक राजनीति

  • हैशटैग्सभारत ने 1947 में ब्रिटिश शासन से आज़ादी पाई थी।
    लेकिन असली आज़ादी तब मिलेगी जब राजनीति अपराधियों और भ्रष्टाचारियों की कैद से मुक्त होगी।
  • मोदी सरकार ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक शुरुआत की है।
    यह केवल कानून नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को बचाने का प्रयास है।

 

🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮

पुराने ब्लॉग्स के लिए कृपया हमारी वेबसाईट www.saveindia108.in पर जाएं।

👉Join Our Channels👈

Share Post

Leave a comment

from the blog

Latest Posts and Articles

We have undertaken a focused initiative to raise awareness among Hindus regarding the challenges currently confronting us as a community, our Hindu religion, and our Hindu nation, and to deeply understand the potential consequences of these issues. Through this awareness, Hindus will come to realize the underlying causes of these problems, identify the factors and entities contributing to them, and explore the solutions available. Equally essential, they will learn the critical role they can play in actively addressing these challenges

SaveIndia © 2025. All Rights Reserved.