भारत की सभ्यतागत विडंबना
सारांश
- भारत सनातन धर्म की भूमि है — एक ऐसा जीवनदर्शन जो मानव जीवन, समाज, राष्ट्र और विश्व के लिए सर्वोच्च मार्गदर्शन देता है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि कर्तव्य, संयम, साहस, करुणा, एकता और मोक्ष पर आधारित एक संपूर्ण सभ्यतागत व्यवस्था है।
फिर भी आज एक गहरी विडंबना हमारे सामने है:
- हमारे पास विश्व का महानतम दर्शन है
- पर हमारा सामाजिक आचरण अक्सर संकीर्ण और स्वार्थप्रधान है
- हम वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करते हैं
- पर स्वयं जाति, क्षेत्र और राजनीति में विभाजित हैं
- हम धर्म का उत्सव मनाते हैं
- पर उसे जीवन में लागू करने से बचते हैं
यह लेख आलोचना नहीं, बल्कि आत्ममंथन और जागरण का आह्वान है।
1. सनातन धर्म: सर्वोच्च सभ्यतागत मार्गदर्शन
सनातन धर्म हमें सिखाता है:
व्यक्तिगत स्तर पर
- आत्मसंयम
- कर्तव्य को अधिकार से ऊपर रखना
- कर्म की जिम्मेदारी
- सत्य आधारित निर्भीकता
- मोक्ष की साधना
सामाजिक स्तर पर
- निर्बलों की रक्षा
- दान और सेवा
- नैतिक शासन
- विविधता में एकता
- शक्ति और करुणा का संतुलन
वैश्विक स्तर पर
- वसुधैव कुटुम्बकम्
- न्याय आधारित शांति
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
यह केवल धार्मिक पहचान नहीं — यह जीवन जीने की प्रणाली है।
2. वर्तमान सामाजिक यथार्थ: स्वार्थ में डूबा समाज
आज का समाज मुख्यतः व्यस्त है:
- धन कमाने में
- परिवार की उन्नति में
- सुख-सुविधाओं में
- सामाजिक प्रतिष्ठा में
सामान्य मानसिकता बन चुकी है:
- “मेरा परिवार सुरक्षित है, बस वही काफी है।”
- “राजनीति से हमें क्या लेना?”
- “त्याग क्यों करें?”
- “सब ठीक चल रहा है।”
यह सोच पैदा करती है:
- नागरिक उदासीनता
- राजनीतिक निष्क्रियता
- सामाजिक विखंडन
- सामूहिक कमजोरी
3. आत्मसंतोष का भ्रम (Fool’s Paradise)
हम यह मानकर चल रहे हैं कि:
- देश की सुरक्षा स्थायी है
- संस्कृति को कोई खतरा नहीं
- संस्थाएं स्वतः रक्षा करेंगी
इतिहास सिखाता है:
- जब समाज आत्मसंतुष्ट होता है, तब पतन प्रारंभ होता है
- जब आंतरिक विभाजन बढ़ता है, बाहरी शक्तियाँ लाभ उठाती हैं
- जब नागरिक निष्क्रिय होते हैं, राष्ट्र कमजोर होता है
4. विभाजन: हमारी सबसे बड़ी कमजोरी
हम दशकों से बंटे हुए हैं:
- जाति के आधार पर
- भाषा के आधार पर
- क्षेत्र के आधार पर
- राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर
इन विभाजनों ने:
- राष्ट्रीय एकता कमजोर की
- बाहरी और आंतरिक शोषण को आसान बनाया
- सामूहिक शक्ति को विभाजित किया
जब तक हम धर्म और राष्ट्रहित को संकीर्ण पहचान से ऊपर नहीं रखेंगे, तब तक एकता अधूरी रहेगी।
5. शासन और समाज का संबंध
कोई भी राष्ट्र तभी मजबूत होता है जब:
- नागरिक जागरूक हों
- सामाजिक एकता हो
- राजनीतिक समर्थन स्पष्ट हो
- जिम्मेदारी साझा हो
यदि समाज:
- विभाजित
- स्वार्थी
- निष्क्रिय रहे,
- तो कोई भी सरकार अकेले राष्ट्र को मजबूत नहीं बना सकती।
राष्ट्र केवल सरकार से नहीं चलता — वह नागरिकों की भागीदारी से चलता है।
6. अहंकार और लालच: असली अवरोध
हम बुद्धिमान हैं, परंतु:
- अहंकार हमें जोड़ने नहीं देता
- लालच सेवा को सीमित करता है
- आराम साहस को दबा देता है
- आलोचना कर्म का स्थान ले लेती है
सनातन धर्म जिन गुणों की बात करता है:
- नम्रता
- त्याग
- सेवा
- साहस
- संयम
उनका अभ्यास घटता जा रहा है।
7. गरीब और जरूरतमंदों की उपेक्षा
- धर्म का अर्थ है:
- भूखे को भोजन
- दुखी को सहारा
- निर्बल की रक्षा
परंतु:
- असमानता बनी हुई है
- सेवा सीमित है
- सामाजिक उत्तरदायित्व कम है
केवल मंदिर निर्माण और पूजा पर्याप्त नहीं — मानव निर्माण भी आवश्यक है।
8. सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता
राष्ट्रीय सुरक्षा निर्भर करती है:
- सामाजिक एकता पर
- आर्थिक स्थिरता पर
- सांस्कृतिक निरंतरता पर
- नागरिक जागरूकता पर
यदि समाज विभाजित और निष्क्रिय है, तो राष्ट्र की शक्ति धीरे-धीरे कम होती है।
9. वसुधैव कुटुम्बकम्: आदर्श बनाम व्यवहार
हम विश्व को परिवार कहते हैं। पर परिवार बनने के लिए आवश्यक है:
- आंतरिक एकता
- नैतिक शक्ति
- जिम्मेदार नागरिकता
- राष्ट्रीय आत्मविश्वास
बिना आंतरिक मजबूती के वैश्विक आदर्श केवल नारे बन जाते हैं।
10. आवश्यक परिवर्तन
व्यक्तिगत स्तर पर
- धन के साथ सेवा
- राजनीतिक जागरूकता
- जाति और क्षेत्र से ऊपर उठना
- जरूरतमंदों की सक्रिय सहायता
सामाजिक स्तर पर
- एकता को प्राथमिकता
- विभाजनकारी मानसिकता का त्याग
- नैतिक नेतृत्व को समर्थन
सभ्यतागत स्तर पर
- धर्म को जीवन में लागू करना
- व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को राष्ट्रहित से जोड़ना
- जिम्मेदारी को अधिकार से ऊपर रखना
- सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि चुनौतियाँ हैं।
- हर सभ्यता के सामने चुनौतियाँ होती हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि:
- हमारे पास श्रेष्ठ दर्शन है
- पर हम उसे पूरी तरह जी नहीं रहे
समस्या ज्ञान की नहीं — संकल्प और एकता की है।
जब:
- अहंकार से ऊपर एकता होगी
- लालच से ऊपर सेवा होगी
- आराम से ऊपर साहस होगा
- विभाजन से ऊपर राष्ट्रहित होगा
तभी भारत सच में धर्म, शक्ति और वसुधैव कुटुम्बकम् का जीवंत उदाहरण बनेगा।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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