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कांग्रेस का असली सच

कांग्रेस का असली सच: संविधान और लोकतंत्र पर उसका रिकॉर्ड

संविधान को लहूलुहान करने वालों का पाखंड और ईमानदार व प्रगतिशील सरकार पर दोषारोपण

भारत की राजनीति में आज एक दुर्भाग्यपूर्ण विरोधाभास दिखता है।

  • जिन दलों ने दशकों तक संविधान और लोकतंत्र को कमजोर किया
  • जिनके शासन में संस्थाओं का दुरुपयोग हुआ
  • जिन्होंने भ्रष्टाचार, घोटालों और कमीशन-राज से देश की अर्थव्यवस्था को खोखला किया
  • वही लोग आज ईमानदार और परिणाम देने वाली सरकार पर उँगली उठा रहे हैं।

यह आलोचना नहीं, अपने अतीत से ध्यान हटाने की कोशिश है।

SECTION 1: न्यायपालिका और लोकतंत्र पर ऐतिहासिक आघात

इतिहास स्पष्ट बताता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सबसे गहरे आघात किस दौर में पड़े—

  • वरिष्ठता की परंपरा तोड़कर मुख्य न्यायाधीश की नियुक्तियाँ
  • असहमति रखने वाले न्यायाधीशों पर दबाव और दंड
  • आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का निलंबन
  • सत्ता-अनुकूलता को पुरस्कार और स्वतंत्रता को सज़ा
  • राजनीति और न्यायपालिका के बीच लक्ष्मण रेखा का धुंधलापन

आज “संविधान खतरे में है” का शोर करने वालों को पहले अपने रिकॉर्ड पर नज़र डालनी चाहिए।

SECTION 2: लाइसेंस-राज, आयात-कमीशन और आर्थिक पतन

स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक अपनाया गया मॉडल भारत को पीछे ले गया—

  • लाइसेंस-राज ने उद्यमिता का गला घोंटा
  • घरेलू विनिर्माण के बजाय आयात को बढ़ावा
  • आयात पर कमीशन और दलाली से नीतियाँ तय
  • विदेशी कंपनियों को प्राथमिकता, भारतीय उद्योगों की उपेक्षा
  • बड़े-बड़े घोटाले—रक्षा, दूरसंचार, कोयला, कॉमनवेल्थ— जिनसे देश की साख और खज़ाने दोनों को नुकसान हुआ

इसका परिणाम

  • रोज़गार सृजन बाधित
  • उद्योग पलायन
  • आर्थिक अस्थिरता
  • 2014 तक दिवालियेपन की आशंका जैसी स्थिति

जो मॉडल देश को कमजोर करता रहा, आज उसी के समर्थक विकास पर सवाल उठा रहे हैं—यह सबसे बड़ा पाखंड है।

SECTION 3: 2014 के बाद—असाधारण परिस्थितियों में असाधारण परिणाम

2014 में नई सरकार को विरासत में मिला—

  • जर्जर अर्थव्यवस्था
  • नीति पक्षाघात
  • कमजोर रक्षा-तैयारी
  • व्यापक भ्रष्टाचार
  • और खोया हुआ जन-विश्वास

इसके बावजूद, सिर्फ 11 वर्षों में

  • भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना
  • सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में पहचान
  • आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ठोस कदम
  • मेक इन इंडिया से विनिर्माण को बल
  • रक्षा उत्पादन और निर्यात में प्रगति
  • वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज़ अधिक निर्णायक

यह परिवर्तन संयोग नहीं,
स्पष्ट दृष्टि, रणनीति और कार्यान्वयन का परिणाम है।

SECTION 4: बाधाएँ—फिर भी प्रगति

इस यात्रा में सहयोग हमेशा सहज नहीं रहा—

  • विपक्ष का निरंतर अवरोध
  • नौकरशाही की जड़ता
  • नीतिगत सुधारों पर अनावश्यक शंकाएँ
  • संस्थागत परिवर्तन का प्रतिरोध

इसके बावजूद, सरकार ने स्थिरता और निरंतरता के साथ काम किया—
और जिन लक्ष्यों को असंभव कहा जा रहा था, उन्हें वास्तविकता में बदला।

SECTION 5: आज का आरोप-तंत्र—क्यों असंगत है

आज वही राजनीतिक शक्तियाँ—

  • जिन्होंने संस्थाओं को कमजोर किया
  • जिन्होंने घोटालों को सामान्य बनाया
  • जिन्होंने आयात-कमीशन मॉडल से देश को पीछे धकेला

आज वही लोग—

  • ईमानदार सुधारों पर सवाल उठाती हैं
  • प्रगति को “खतरा” बताती हैं
  • जनता को भ्रमित करने की कोशिश करती हैं

यह आलोचना नीति-आधारित नहीं, बल्कि अतीत से पलायन है।

SECTION 6: नागरिकों की भूमिका—सच पहचानना

आज प्रश्न सरकार का नहीं, दिशा का है—

  • क्या हम उस दौर में लौटना चाहते हैं जहाँ घोटाले सामान्य थे और विकास अपवाद?
  • या उस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं जहाँ पारदर्शिता, परिणाम और राष्ट्रहित प्राथमिकता हैं?

लोकतंत्र में जागरूक नागरिक ही सबसे बड़ा संरक्षक होता है।

SECTION 7: आगे का रास्ता—समर्थन और निरंतरता

यदि भारत को—

  • वैश्विक महाशक्ति बनना है
  • आत्मनिर्भर और सुरक्षित राष्ट्र बनना है
  • और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थायी समृद्धि सुनिश्चित करनी है

तो हमें ईमानदार और प्रगतिशील नेतृत्व को राजनीतिक और सामाजिक—दोनों स्तरों पर मज़बूती से समर्थन देना होगा

  • यह समर्थन व्यक्ति-पूजा नहीं, दिशा-समर्थन है।

रिकॉर्ड बोलता है

  • आज भारत जहाँ खड़ा है- वह किसी एक दिन का चमत्कार नहीं
  • बल्कि लगातार परिश्रम, कठिन निर्णय और दीर्घकालिक दृष्टि का परिणाम है
  • जो लोग आज शोर मचा रहे हैं, उनका अतीत सवालों के घेरे में है
  • और जो काम कर रहे हैं, उनका रिकॉर्ड सामने जवाब देता है।

अब निर्णय जनता का है— पिछड़े मॉडल की ओर लौटना, या आगे बढ़ते भारत के साथ चलना।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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