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संवैधानिक रणनीति

धार्मिक पहचान की राजनीति और चयनात्मक सेकुलरिज़्म: कांग्रेस–ठगबंधन रणनीति

2014 के बाद कांग्रेस–ठगबंधन ने अपना राजनीतिक ध्यान शासन और विकास से हटाकर धार्मिक पहचान और चयनात्मक सेकुलरिज़्म की ओर केंद्रित कर लिया। राज्य विधानसभाओं के माध्यम से ऐसे कानून प्रस्तावित किए जा रहे हैं, जो संवैधानिक रणनीति के नाम पर समान नागरिकता, उचित प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों पर सवाल उठाते हैं। यह लेख इसी पहचान-आधारित संवैधानिक रणनीति के प्रभाव और जोखिमों का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

सत्ता से बाहर होने के बाद पहचान की राजनीति

  • 2014 के बाद केंद्र की सत्ता से बाहर होने पर काँग्रेस आउट ठगबंधन ने शासन, विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थागत सुधारों पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय पहचानआधारित तुष्टिकरण को अपनी मुख्य रणनीति बनाया।
  • सामाजिक न्याय और संवेदनशीलता की भाषा में पेश किए जाने वाले अनेक प्रस्ताव कानूननिर्माण की प्रक्रिया और मंशा पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।
  • समस्या न्याय या कल्याण की अवधारणा से नहीं—वे संविधान की आत्मा हैं—समस्या उस ढांचे से है जो चयनात्मक उत्पीड़न का मार्ग खोल देता है।

राज्य विधानसभाएँ: अस्वीकार्य विचारों की प्रयोगशाला

  • राष्ट्रीय स्तर पर सीमित प्रभाव के बाद कुछ राज्य विधानसभाएँ ऐसे प्रस्तावों की प्रयोगशाला बनती जा रही हैं।
  • भावनात्मक भाषा का प्रयोग, पर सीमित संवैधानिक परीक्षण
  • अस्पष्ट प्रावधान, जो कार्यपालिका को अत्यधिक विवेकाधिकार देते हैं।
  • दुरुपयोग रोकने के लिए कमजोर या अनुपस्थित सुरक्षा उपाय
  • टिकाऊ सुधारों के बजाय वोटबैंक संकेत प्राथमिक।

परिणाम:

  • राष्ट्रीय विमर्श में अस्वीकार्य विचार स्थानीय स्तर पर सामान्य बनते हैं।
  • संविधान राजनीतिक दबाव में परखा जाने लगता है।
  • कानूनी अस्थिरता स्वयं एक राजनीतिक हथियार बन जाती है।

कर्नाटक मैं रोहित वेमुला अधिनियम जैसे प्रस्ताव: प्रक्रिया ही दंड

  • न्यूनतम प्रारंभिक जांच के आधार पर ही अनिवार्य कार्रवाई
  • न्यायिक निर्णय से पहले प्रशासनिक/अनुशासनात्मक दंड।
  • समयबद्ध प्रक्रियाएँ, जो संस्थानों को रक्षात्मक मुद्रा में धकेलती हैं।
  • व्यवहार में सबूत का बोझ आरोपी पर डालना।

संवैधानिक प्रभाव:

  • अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का क्षरण।
  • अनुच्छेद 21 (उचित प्रक्रिया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) पर आघात।
  • “निर्दोष जब तक दोष सिद्ध न हो” सिद्धांत का उलटाव।
  • शिकायत-आधारित राजनीति को संस्थागत रूप देना।

कर्नाटक मैं हेट स्पीच विधेयक: अस्पष्टता का दुरुपयोग

  • “आहत भावना”, “अपमान”, “घृणा” जैसे अत्यंत व्यक्तिपरक शब्द
  • स्पष्ट, वस्तुनिष्ठ मानकों और परिभाषाओं का अभाव।
  • कार्यपालिका को मनमानी व्याख्या का अवसर।

खतरे:

  • अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) कमजोर।
  • असहमति, व्यंग्य, अकादमिक शोध और धार्मिक विमर्श का अपराधीकरण।
  • एकतरफा लागू होने का जोखिम, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है।

धर्मआधारित आरक्षण: उद्देश्य से विचलन

  • धर्म-विशेष कोटा या पुनर्वर्गीकरण के प्रयास।
  • आरक्षण के मूल उद्देश्य—ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय का सुधार—से विचलन।
  • कल्याण का पहचानगणित में बदलना।

संवैधानिक टकराव:

  • समानता के सिद्धांत से असंगति।
  • सकारात्मक कार्रवाई की नैतिक वैधता कमजोर।
  • अनुच्छेद 14, 15 और 16 से संभावित टकराव।

केंद्र मैं सच्चर समिति: निदान से राजनीति तक

सच्चर समिति मूलतः नैदानिक अध्ययन थी—शिक्षा, रोजगार और संसाधनों तक पहुँच की खामियों की पहचान।

  • उद्देश्य था आवश्यकताआधारित, समावेशी समाधान
  • परंतु चयनात्मक निष्कर्षों से पहचानप्रथम नीतियों का औचित्य गढ़ा गया।
  • गरीबी उन्मूलन से हटकर पहचान-आधारित अधिकारों पर जोर।

संस्थागत विरोध के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका।

केंद्र मैं साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक: पूर्व चेतावनी

  • समूहगत उत्तरदायित्व जैसे विचार।
  • कमजोर सुरक्षा उपायों के साथ कार्यपालिका की शक्ति-वृद्धि।
  • पहचान के आधार पर पूर्वधारणा का जोखिम।

बीजेपी के लागतर विरोध के कारण इसका पारित होने से रुकना स्पष्ट संदेश था: पहचान-आधारित दंड कानून समान नागरिकता को क्षति पहुँचाते हैं इसलिए संवेधनिक रूप से स्वीकार्य नहीं हैं।

इन सभी प्रावधानों मैं स्पष्ट पैटर्न

  • समान नागरिकता से हटकर पहचानप्रथम दृष्टि
  • अस्पष्ट और व्यापक प्रावधान।
  • कमजोर प्रक्रियात्मक सुरक्षा।
  • कानून का राजनीतिक हथियार बन जाना।
  • भावना और संरचना—दोनों स्तरों पर असंवैधानिक झुकाव

सरकार और न्यायपालिका की भूमिका

सरकार से अपेक्षाएँ:

  • समानता और उचित प्रक्रिया को कमजोर करने वाले कानूनों से परहेज।
  • विधेयकों से पहले कठोर संवैधानिक परीक्षण
  • स्पष्ट परिभाषाएँ, सीमित दायरा और मजबूत सुरक्षा उपाय।

न्यायपालिका से अपेक्षाएँ:

  • पहचान-आधारित तुष्टिकरण पर सख्त समीक्षा
  • अस्पष्ट प्रावधानों से होने वाले चयनात्मक उत्पीड़न पर रोक।
  • मूल अधिकारों की प्राथमिक और निरंतर रक्षा

संवैधानिक सीमाओं की अनदेखी की राष्ट्रीय कीमत

सच्चा सामाजिक न्याय आधारित है:

  • कानून में सटीकता,
  • प्रवर्तन में समानता,
  • उचित प्रक्रिया की रक्षा,
  • संविधान के प्रति पूर्ण निष्ठा।

पहचानआधारित तुष्टिकरण कानून भारत को कमजोर करते हैं।

  • भारत का भविष्य राजनीतिक सुविधा में नहीं, संवैधानिक साहस में है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

पुराने लेख: https://saveindia108.in/our-blog/

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