- स्वतंत्रता के बाद भारत को केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं मिली, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के निर्माण की ज़िम्मेदारी भी मिली।
- दुर्भाग्य से, दशकों तक कांग्रेस-प्रभुत्व वाले राजनीतिक–बौद्धिक तंत्र ने शिक्षा को राष्ट्रीय एकीकरण का साधन बनाने के बजाय वैचारिक इंजीनियरिंग का औज़ार बना दिया।
📚 शिक्षा और इतिहास का वैचारिक पुनर्लेखन
- इतिहास, सामाजिक विज्ञान और मानविकी विषयों का उपयोग सभ्यतागत आत्मविश्वास जगाने के लिए नहीं, बल्कि चयनात्मक नैरेटिव थोपने के लिए किया गया।
इसके तहत:
- हिंदू सभ्यता की निरंतरता को हाशिये पर डाला गया
- स्वदेशी परंपराओं को मिथक या अंधविश्वास कहा गया
- आक्रांताओं को “शासक” और प्रतिरोध को “अराजकता” बताया गया
- सनातन धर्म को पिछड़ा और अप्रासंगिक सिद्ध करने की कोशिश हुई
इसका उद्देश्य स्पष्ट था—इस्लामिक और ईसाई वैचारिक ढाँचों के लिए वैधता बनाना और सनातन परंपरा को अकादमिक तरीके से कमजोर करना।
⚖️ छद्म-धर्मनिरपेक्षता का असंतुलन
- जिसे धर्मनिरपेक्षता कहा गया, वह व्यवहार में लगभग पूरी तरह हिंदू समाज पर लागू हुई:
- मंदिरों पर राज्य नियंत्रण
- हिंदू परंपराओं और अनुष्ठानों का उपहास
- “सुधार” के नाम पर निरंतर नैतिक निगरानी
जबकि अन्य धार्मिक व्यवस्थाएँ आलोचना से लगभग मुक्त रहीं। यह समानता नहीं, बल्कि संरचनात्मक असंतुलन था।
🧠 मनोवैज्ञानिक प्रभाव
दशकों की इस वैचारिक शिक्षा ने:
- इतिहास से कटाव
- अपनी पहचान व्यक्त करने का भय
- अपराध-बोध और हीनता
दीर्घकालिक सभ्यतागत खतरों को न पहचान पाने की स्थिति पैदा की। पीढ़ियाँ यह मानने लगीं कि “जो भारतीय है, वह तब तक पिछड़ा है जब तक पश्चिम उसे प्रमाणित न करे।”
⚠️ यह खतरा अदृश्य क्यों रहा
- यह प्रक्रिया अचानक नहीं, बल्कि क्रमिक थी पाठ्यक्रम में हेरफेर, भाषा का नियंत्रण, चयनात्मक आक्रोश और अकादमिक गेटकीपिंग के ज़रिये।
- जब सवाल उठे, तब तक कई पीढ़ियाँ ढल चुकी थीं।
आगे का रास्ता
यह किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि सत्य और संतुलन की माँग है:
- पाठ्यपुस्तकों का ईमानदार पुनर्मूल्यांकन
- सभी ऐतिहासिक कालों का संतुलित प्रस्तुतीकरण
- भारतीय ज्ञान परंपराओं का समावेश
- सनातन दर्शन को दर्शन के रूप में पढ़ाना
- चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता का अंत
- शिक्षा केवल जानकारी नहीं देती—वह पहचान गढ़ती है।
- जो सभ्यता अपने मूल से कट जाती है, वह अपने भविष्य की रक्षा नहीं कर सकती।
ऐतिहासिक सत्य की पुनर्प्राप्ति उग्रवाद नहीं—आत्म-संरक्षण है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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