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दुष्कर्म से लेकर आतंकवाद तक

दुष्कर्म से लेकर आतंकवाद तक

यह अकेला मामला नहीं: अपराध को ‘समझाने’ की राजनीति बनाम कानून का शासन

सारांश

  • मध्य प्रदेश के कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया का दुष्कर्म, महिलाओं, जाति और धर्म को लेकर दिया गया बयान कोई अकेली या आकस्मिक घटना नहीं है।
  • यह वर्षों से दिख रहे उस राजनीतिक और वैचारिक पैटर्न का हिस्सा है, जिसमें अपराध को “समझाने”, “सामाजिक कारणों” से जोड़ने और जिम्मेदारी को व्यक्ति से हटाकर समाज, परिस्थिति या आस्था पर डालने की कोशिश की जाती रही।
  • इसी मानसिकता ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों से लेकर आतंकवाद और उग्रवाद तक, अपराधियों और असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़ाए।
  • इसके विपरीत, मोदी–योगी काल में कानून का शासन, नागरिकों की सुरक्षा और राष्ट्र की अखंडता सर्वोच्च प्राथमिकता बनी—जहाँ पहचान नहीं, अपराध निर्णायक है।

दुष्कर्म से लेकर आतंकवाद तक—कांग्रेस की सोच, उसका पैटर्न और मोदी–योगी मॉडल की निर्णायक स्पष्टता

1. फूल सिंह बरैया का बयान: जुबान की फिसलन नहीं, सोच का आईना

  • दुष्कर्म को “ध्यान भटकने” से जोड़ना।
  • महिलाओं की सुंदरता पर टिप्पणी कर अपराध को सामान्य बनाना।
  • जाति और धार्मिक मान्यताओं को अपराध से जोड़ना।
  • दुष्कर्म को “पुण्य” जैसी विकृत व्याख्याओं से जोड़ने का दुस्साहस।

निष्कर्ष:

  • यह बयान अपराध को हल्का करता है, पीड़िता को दोषी ठहराने की सोच को बढ़ावा देता है और अपराधी की जिम्मेदारी को धुंधला करता है।

2. अपराध को ‘स्वाभाविक’ बताने की खतरनाक प्रवृत्ति

  • “भावनात्मक बहाव”, “उकसावा”, “परिस्थितियाँ”—ऐसी भाषा।
  • अपराधी के कृत्य को मानवीय कमजोरी बताने का प्रयास।
  • पीड़िता के अधिकार और गरिमा पर आघात।

परिणाम:

  • अपराधियों को नैतिक छूट और बढ़ावा।
  • पीड़ितों और समाज का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर।

3. जाति और समाज को अपराध से जोड़ने का दोहरा अपराध

  • अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्गों को अपराध की व्याख्या में घसीटना।
  • महिलाओं का अपमान और सामाजिक समूहों को नीचा दिखाने का प्रयास।
  • संविधान के समानता और गरिमा सिद्धांत का उल्लंघन।

4. धर्म और आस्था को बदनाम करने का पैटर्न

  • धार्मिक/प्राचीन ग्रंथों को अपराध से जोड़ना।
  • सामाजिक सौहार्द पर सीधा हमला।
  • अपराध की जिम्मेदारी व्यक्ति से हटाकर आस्था पर डालना।

यह असंवेदनशीलता नहीं—वैचारिक विफलता है।

5. यह अकेला मामला नहीं: कांग्रेस नेताओं के विवादित बयानों का इतिहास

  • महिलाओं के पहनावे/स्वतंत्रता को अपराध से जोड़ना।
  • दुष्कर्म को “युवावस्था की भूल” या “सामाजिक दबाव” कहना।
  • जाति-आधारित सहानुभूति या आरोप।
  • धर्म-संस्कृति पर कटाक्ष।

हर बार रणनीति समान:

  • बयान → विवाद → औपचारिक दूरी → ठोस कार्रवाई का अभाव।

यहीं से स्पष्ट होता है कि समस्या व्यक्ति की नहीं, पार्टी-संस्कृति की है।

6. कांग्रेस शासनकाल: सहानुभूति का आवरण, न्याय की कमी

महिलाओं के विरुद्ध अपराध

  • अस्पष्ट बयान, धीमी जांच।
  • वर्षों तक लटकते मुकदमे।
  • राजनीतिक दबाव में कमजोर कार्रवाई।

आतंकवाद और उग्रवाद

  • “भटके हुए युवक” जैसी नरम भाषा।
  • निर्णायक कदमों में हिचक।
  • वोट-बैंक/छवि की चिंता को राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर रखना।

परिणाम:

  • अपराधियों, उग्रवादियों और असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़े।
  • “राजनीतिक संरक्षण हो तो सज़ा टल सकती है” का संदेश गया।

7. राजनीतिक कारणों से न्याय से समझौता

  • संवेदनशील मामलों में चुनावी गणित प्राथमिक।
  • जांच एजेंसियों के हाथ बंधे।
  • अपराध की पुनरावृत्ति—चाहे यौन अपराध हों या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियाँ।

8. मोदी–योगी युग: प्राथमिकता बदली, संदेश स्पष्ट

  • पहचान नहीं, अपराध निर्णायक।
  • राजनीति नहीं, नागरिक सुरक्षा सर्वोपरि।
  • सहानुभूति अपराधी से नहीं, पीड़ित से।

महिलाओं की सुरक्षा

  • तेज़ जांच, त्वरित गिरफ्तारी।
  • फास्ट-ट्रैक सुनवाई।
  • कानून के तहत कठोर, निर्णायक दंड।

आतंकवाद और उग्रवाद

  • राष्ट्र-विरोधी अपराध के रूप में स्पष्ट परिभाषा।
  • नेटवर्क और वित्तीय चैनलों पर प्रहार।
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट रुख।
  • सुरक्षा एजेंसियों को बिना राजनीतिक डर काम करने की स्पष्टता।

9. उत्तर प्रदेश मॉडल: कानून का डर, नागरिकों का विश्वास

  • संगठित अपराध, कट्टरपंथी नेटवर्क और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों पर समान, निष्पक्ष कार्रवाई।

परिणाम:

  • अपराधियों में भय।
  • आम नागरिकों में सुरक्षा का भाव।
  • कानून के राज पर भरोसा।

यह कार्रवाई किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं—अपराध के विरुद्ध है।

10. पुराना इकोसिस्टम क्यों बौखलाया

  • बयानबाज़ी से बचाव नहीं।
  • चयनात्मक सहानुभूति काम नहीं आती।
  • “विक्टिम कार्ड” निष्प्रभावी।

जब सबको एक ही कसौटी पर रखा जाता है, तो शोर बढ़ता है, पर उनकी विश्वसनीयता घटती जाती है

11. बयान नहीं, व्यवस्था जिम्मेदार होती है

  • फूल सिंह बरैया का बयान व्यक्तिगत चूक नहीं, पुरानी संस्कृति की परछाईं है।
  • आज कानून का शासन केंद्र में है।
  • नागरिकों की सुरक्षा और राष्ट्र की अखंडता सर्वोच्च प्राथमिकता है।
  • राजनीति न्याय से ऊपर नहीं।

यही फर्क देश देख रहा है—और यही एक जिम्मेदार लोकतंत्र की पहचान है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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