सारांश
- चुनाव नज़दीक आते ही भारत की चुनी हुई सरकार को अस्थिर और विभाजित दिखाने की परिचित कोशिशें तेज़ हो जाती हैं—हाल में यह “योगी बनाम मोदी” नैरेटिव के रूप में दिख रहा है।
- इससे पहले भी नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू और नितिन गडकरी जैसे नामों को लेकर इसी तरह का भ्रम फैलाया गया। साथ-साथ “चौकीदार चोर है”, “लोकतंत्र खतरे में है”, “वोट चोरी” जैसे बार-बार दोहराए गए झूठे नारे संस्थाओं पर भरोसा तोड़ने के लिए आगे किए जा रहे हैं।
- हकीकत यह है कि पिछले 11 वर्षों में भारत की प्रगति स्थिर, टीम-आधारित और परिणाम-उन्मुख शासन से आई है। केंद्र और राज्यों में भाजपा/एनडीए की निरंतरता ने कानून-व्यवस्था सुधारी, आंतरिक सुरक्षा मज़बूत की, अवसंरचना बढ़ाई और आर्थिक विकास को तेज़ किया।
- इसके विपरीत, कई विपक्ष-शासित राज्यों का रिकॉर्ड कमज़ोर शासन, धीमा विकास और नीतिगत ठहराव दिखाता है—जो राष्ट्रीय स्तर पर उनकी क्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
कैसे झूठे नैरेटिव भारत की स्थिरता और विकास को खतरे में डालते हैं
खंड 1: पुराना पैटर्न—नाम बदलते हैं, स्क्रिप्ट वही रहती है
चुनाव आते ही वही पुराना खेल शुरू होता है:
- सरकार को “अस्थिर” दिखाना
- नेतृत्व में “दरारें” गढ़ना
- गठबंधन टूटने की अफ़वाहें फैलाना
इसी स्क्रिप्ट के पुराने संस्करण:
- नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी के बीच मतभेद की कहानियाँ
- नितीश कुमार के समर्थन वापस लेने की अटकलें
- चंद्रबाबू नायडू द्वारा सरकार गिरने की भविष्यवाणियाँ
हर बार नतीजा एक ही रहा—शासन चलता रहा, नीतियाँ आगे बढ़ीं और अफ़वाहें तथ्यों के सामने ढह गईं।
खंड 2: ऐसे नैरेटिव क्यों गढ़े जाते हैं?
क्योंकि विरोधियों के पास:
- साझा राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं
- विश्वसनीय विकास-रोडमैप नहीं
- भारत के लिए स्पष्ट, दीर्घकालिक विज़न नहीं
जब नागरिक देखते हैं:
- स्थिर शासन
- स्पष्ट निर्णय
- ज़मीन पर दिखते परिणाम
तो भ्रम और डर फैलाना आख़िरी हथियार बन जाता है।
खंड 3: राजनीतिक हथियार के रूप में दुष्प्रचार—एक लाल रेखा
- नेतृत्व-विभाजन की अफ़वाहों से आगे एक और खतरनाक तरीका अपनाया जाता है—लोकतांत्रिक संस्थाओं को ही अवैध ठहराने की कोशिश।
बार-बार दोहराए जाने वाले, प्रमाण-विहीन दावे:
- “चौकीदार चोर है”
- “लोकतंत्र खतरे में है”
- “वोट चोरी / ईवीएम में गड़बड़ी”
- चुनिंदा विदेशी विवादों को घरेलू प्रमाण की तरह पेश करना
यह खतरनाक क्यों है:
- लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर करता है
- बिना सबूत चुनावों पर संदेह पैदा करता है
- न्यायपालिका, चुनाव आयोग और सुरक्षा एजेंसियों को कमजोर दिखाता है
- स्थायी अस्थिरता का माहौल बनाता है, जो राष्ट्रीय हित के विरुद्ध है
जब ऐसे नैरेटिव विदेशी मीडिया, निहित स्वार्थों या वैचारिक इकोसिस्टम से बल पाते हैं, तो राजनीति नीतिगत प्रतिस्पर्धा से फिसलकर संस्थागत क्षरण बन जाती है—जिसे कोई भी जिम्मेदार लोकतंत्र स्वीकार नहीं कर सकता।
खंड 4: एक टीम, एक दिशा—केंद्र से राज्यों तक
भारत की प्रगति समन्वित और उद्देश्यपूर्ण रही है:
- केंद्र में रणनीतिक नीति-दिशा
- राज्यों में सख़्त कानून-व्यवस्था और तेज़ कार्यान्वयन
प्रमुख नेतृत्व योगदान:
- योगी आदित्यनाथ: कानून-व्यवस्था के ढाँचागत सुधार, निवेश-अनुकूल शासन, तेज़ अवसंरचना विकास और सांस्कृतिक-धार्मिक केंद्रों का सुव्यवस्थित विकास।
- हिमांत बिसवा सरमा: सीमावर्ती चुनौतियों के बीच प्रशासनिक सख़्ती, अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई और शासन में पारदर्शिता।
- केंद्र में आंतरिक सुरक्षा के लिए अमित शाह के नेतृत्व में समन्वय—जिससे अपराध, उग्रवाद और अवैध गतिविधियों पर संविधान के दायरे में निर्णायक कार्रवाई संभव हुई।
खंड 5: सुरक्षा और कानून का राज—कठोर, निष्पक्ष, संवैधानिक
राष्ट्रीय सुरक्षा नारों से नहीं, बल्कि:
- स्पष्ट नीति
- संस्थागत समन्वय
- कानून और प्रक्रिया के भीतर सख़्त कार्रवाई से मज़बूत होती है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
- कार्रवाई किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध नहीं
- बल्कि अपराध, उग्रवाद और संप्रभुता के खतरों के विरुद्ध होती है
यही संतुलन लोकतांत्रिक वैधता और राष्ट्रीय हित—दोनों की रक्षा करता है।
खंड 6: राज्य-स्तरीय रिकॉर्ड—क्षमता की असली कसौटी
राष्ट्रीय नेतृत्व का दावा राज्यों के प्रदर्शन से परखा जाता है। कई विपक्ष/ठगबंधन-शासित राज्यों में एक-सा पैटर्न दिखता है:
- कमज़ोर आर्थिक परिणाम
- धीमा या रुका हुआ अवसंरचना विकास
- वोट-बैंक आधारित तुष्टीकरण
- बार-बार के घोटाले, भ्रष्टाचार और नीति-लकवा
>यह बयानबाज़ी नहीं, तुलनात्मक शासन-आकलन है।
>जो राज्य ठीक से नहीं चला पाए, वे देश कैसे चलाएँगे?
खंड 7: प्री-2014 बनाम आज—संरचनात्मक बदलाव
तब (2014 से पहले):
- नीति-लकवा
- बड़े घोटाले
- तुष्टीकरण-केंद्रित राजनीति
- आंतरिक सुरक्षा पर नरमी
आज:
- स्थिर शासन
- तेज़ अवसंरचना विस्तार
- कानून-आधारित सुरक्षा कार्रवाई
- वैश्विक मंच पर मज़बूत भारत
यह परिवर्तन निरंतरता, जवाबदेही और संस्थागत सम्मान का परिणाम है।
अपील: गढ़ी हुई अराजकता के बजाय स्थिरता और विकास चुनें
सभी देशभक्त नागरिकों से विनम्र लेकिन स्पष्ट अपील:
- अफ़वाहों से ऊपर उठकर तथ्यों और परिणामों पर निर्णय लें
- समझें कि स्थिरता से ही विकास संभव है
- संस्थाओं को अस्थिर करने की कोशिशों को नकारें
- देश की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता को दलगत शोर से ऊपर रखें
लोकतंत्र में मत केवल अधिकार नहीं, गणराज्य के प्रति ज़िम्मेदारी भी है—और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति भी।
“योगी बनाम मोदी”, नेतृत्व-विभाजन की अफ़वाहें और लोकतंत्र/चुनावों पर बिना प्रमाण के नारे—गढ़ा हुआ शोर हैं, वास्तविकता नहीं।
भारत के सामने विकल्प साफ़ है:
- स्थिरता और विकास बनाम अराजकता
- शासन बनाम निरंतर आंदोलन
- राष्ट्रीय हित बनाम नैरेटिव-युद्ध
चुनाव अफ़वाहों पर नहीं होते।
- वे दिशा, स्थिरता और शासन-क्षमता—और विकास पर होते हैं।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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