तुष्टिकरण, विभाजन और सांस्कृतिक क्षरण की कहानी
🔶 सेक्शन 1 — 1914 की चेतावनी, जिसे इतिहास ने सच साबित किया
1914 में विद्वान यू.एन. मुखर्जी ने एक छोटी लेकिन विचलित कर देने वाली पुस्तक लिखी —
- “Hindus – A Dying Race” (हिंदू – एक मरती हुई नस्ल)।
उन्होंने यह चेतावनी 1911 की जनगणना के आधार पर दी थी।
- यह RSS के गठन से पहले की बात थी।
- यह सावरकर और हिंदू महासभा से पहले की बात थी।
- यह विभाजन से बहुत पहले की बात थी।
- यह कोई उकसावे वाला लेख नहीं था, बल्कि आंकड़ों और दूरदर्शिता पर आधारित विश्लेषण था।
दुर्भाग्यवश, यह चेतावनी समय के साथ समाप्त नहीं हुई। बल्कि पूरी एक सदी तक सच साबित होती रही।
🔶 सेक्शन 2 — 1914 से 2014: पतन जो रुक ही नहीं पाया
मुखर्जी द्वारा कही गई “मृत्यु” का अर्थ जैविक विनाश नहीं था, बल्कि राजनीतिक, सांस्कृतिक और संस्थागत क्षरण था।
स्वतंत्रता के बाद से 2014 तक, यह क्षरण जारी रहा। इस दौर की प्रमुख विशेषताएँ रहीं:
- वोट-बैंक की राजनीति को शासन का आधार बनाना
- मुस्लिम तुष्टिकरण को “सेक्युलरिज़्म” के नाम पर सही ठहराना
- हिंदुओं की चिंताओं का दमन, उन्हें “सांप्रदायिक” कहकर खारिज करना
हिंदुओं को बाँटना:
- जाति के आधार पर
- भाषा के आधार पर
- क्षेत्र के आधार पर
- पंथ और उप-समुदायों के आधार पर
इस विभाजन ने:
- सामाजिक एकता तोड़ी,
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास घटाया,
- और सामूहिक शक्ति को कमजोर किया।
🔶 सेक्शन 3 — तुष्टिकरण की राजनीति की राष्ट्रीय कीमत
वोट-बैंक पर आधारित नीतियों ने केवल हिंदुओं को ही नहीं, पूरे राष्ट्र को नुकसान पहुँचाया।
- कानून-व्यवस्था चयनात्मक बन गई
- राष्ट्रीय सुरक्षा को नज़रअंदाज़ किया गया
- कट्टरता को तब तक अनदेखा किया गया जब तक वह हिंसक न बन गई
- सीमाएँ, संस्थाएँ और संप्रभुता बार-बार चुनौती में पड़ीं
विभाजित बहुसंख्यक और लाड़ले वोट-बैंक ने देश को अस्थिर बना दिया।
- 2014 तक भारत:
- आर्थिक रूप से कमजोर,
- रणनीतिक रूप से संकोची,
- सांस्कृतिक रूप से रक्षात्मक बन चुका था।
🔶 सेक्शन 4 — 2014: एक सभ्यतागत मोड़
यह भारत का सौभाग्य था कि 2014 मेंएक ऐसी सरकार सत्ता में आई जिसने
तुष्टिकरण की राजनीति को स्पष्ट रूप से नकार दिया।
बदलाव साफ दिखाई दिया:
- राष्ट्रहित को वोट-बैंक से ऊपर रखा गया
- सांस्कृतिक पहचान को बोझ नहीं माना गया
- सनातन धर्म को सभ्यतागत धरोहर के रूप में स्वीकार किया गया
- सुरक्षा और संप्रभुता को समझौते से बाहर रखा गया
यह वर्चस्व की राजनीति नहीं थी — यह सुधार और संतुलन की शुरुआत थी।
🔶 सेक्शन 5 — अस्थिरता से उभरती वैश्विक शक्ति तक
2014 में भारत को जो विरासत मिली थी:
- आर्थिक कमजोरी
- नीति-निर्णय में जड़ता
- वैश्विक मंच पर झिझक
- आंतरिक विभाजन
उसके बाद:
- इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा और निर्माण को प्राथमिकता मिली
- भारत की वैश्विक आवाज़ मजबूत हुई
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास लौटा
- देश निर्भरता से निकलकर आत्मविश्वासी शक्ति बनने लगा
यह सब राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं था।
🔶 सेक्शन 6 — धार्मिक नेतृत्व की असहज सच्चाई
राजनीतिक विफलता के साथ एक और सच्चाई स्वीकार करनी होगी:
- हिंदू धार्मिक और आध्यात्मिक नेतृत्व का बड़ा हिस्सा अपने धर्मिक कर्तव्य से चूक गया।
जहाँ उन्हें चाहिए था:
- समाज को दिशा देना
- धर्म और समुदाय की रक्षा करना
- सरकार और समाज को समय रहते चेताना
वहाँ कई लोग:
- केवल कर्मकांड में उलझे रहे
- दान और साम्राज्य विस्तार में व्यस्त रहे
- सभ्यतागत हानियों पर मौन साधे रहे
इस चुप्पी ने समाज की दिशा कमजोर कर दी।
🔶 सेक्शन 7 — सनातन धर्म का एक मूल सिद्धांत जो भुला दिया गया
सनातन धर्म सिखाता है:
- मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) और रक्षा (संरक्षण) एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
यदि:
- देश सुरक्षित नहीं है
- समाज असुरक्षित है
- संस्कृति कमजोर हो रही है
- तो धार्मिक संस्थाओं का अस्तित्व भी खतरे में पड़ता है।
संकट के समय धार्मिक संस्थाएँ सबसे पहले प्रभावित होती हैं, सबसे बाद में नहीं।
🔶 सेक्शन 8 — मार्गदर्शन के अभाव का परिणाम
स्पष्ट दिशा के अभाव में:
- सामूहिक कर्तव्य की जगह स्वार्थ आया
- दीर्घकालिक सोच की जगह तात्कालिक लाभ
- धर्म कर्मकांड बनकर रह गया, जिम्मेदारी नहीं
जिस समाज के पास दिशा नहीं होती, उसका धीरे-धीरे पतन होता है।
🔶 सेक्शन 9 — अब क्या करना होगा
तात्कालिक और नैतिक प्राथमिकताएँ:
- जाति और क्षेत्र से ऊपर उठकर एकता
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास, बिना किसी शर्म के
- संस्थागत निर्माण — शिक्षा, सेवा, उद्यम
- लोकतांत्रिक सहभागिता
- राजनीतिक और धार्मिक — दोनों नेतृत्व की जवाबदेही
- तथ्यों पर आधारित संवाद, न कि भ्रम
यदि यह सब टाल दिया गया, तो हम जीवित सभ्यता नहीं, इतिहास का अध्याय बन जाएंगे।
🔶 सेक्शन 10 — “मरती हुई” से भविष्य गढ़ने तक
हिंदू कोई मरती हुई नस्ल नहीं हैं। हम सनातन हैं — शाश्वत।
लेकिन शाश्वतता के लिए चाहिए:
- सजगता
- एकता
- जिम्मेदारी
- और निरंतर प्रयास
1914 से 2014 तक पतन को बढ़ावा मिला:
- इनकार से
- तुष्टिकरण से
- विभाजन से
- मौन से
2014 के बाद सुधार शुरू हुआ है — लेकिन उसे मजबूती से आगे बढ़ाना होगा।
- नहीं तो इतिहास हमें उस संस्कृति के लिए याद रखेगा जिसे हम बचा नहीं सके।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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