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I.N.D.I.

I.N.D.I. गठबंधन में हिंदू-विरोधी वक्तव्यों का पैटर्न

सारांश

  • जनवरीदिसंबर 2025 के दौरान दिए गए सार्वजनिक बयानों की एक वर्ष की समीक्षा से यह सामने आता है कि I.N.D.I. गठबंधन से जुड़े नेताओं के वक्तव्यों में हिंदू आस्थाओं, प्रतीकों, परंपराओं और सभ्यतागत पहचान के प्रति बार-बार अपमानजनक/अवमाननापूर्ण रुख दिखाई देता है।
  • रैलियों, विधानसभाओं, मीडिया, सोशल प्लेटफॉर्म्स और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दर्ज इन घटनाओं ने चयनात्मक सेकुलरिज़्म, हेटस्पीच मानकों के असमान अनुप्रयोग और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
  • हालिया न्यायिक टिप्पणियों ने इन चिंताओं को और बल दिया है। समग्र रूप से, यह पैटर्न एक राष्ट्रीय आवश्यकता की ओर संकेत करता है—हेट स्पीच और ऑनलाइन दुरुपयोग पर स्पष्ट व सख्त कानून, आतंकवाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर शून्य सहिष्णुता, और न्यायपालिका द्वारा बिना भेदभाव कड़ा व समान प्रवर्तन
  • संवैधानिक लोकतंत्र में कोई भी कानून से ऊपर नहीं, और राष्ट्र की एकता व सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

बार-बार उकसावे से लेकर समान कानून और राष्ट्रीय प्राथमिकता की तात्कालिक आवश्यकता तक

1) अलगथलग चूक नहीं, एक प्रलेखित पैटर्न

जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच कम से कम 19 व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई घटनाएँ सामने आईं, जो निम्न मंचों पर घटित हुईं:

  • सार्वजनिक रैलियाँ और पार्टी बैठकें
  • विधानसभाई कार्यवाही
  • टीवी व प्रिंट इंटरव्यू
  • सोशल मीडिया पोस्ट
  • अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच

इन सबको एक साथ देखने पर यह एक स्पष्ट पैटर्न बनता है—केवल आकस्मिक बयान नहीं—जो राजनीतिक वक्तव्य की जिम्मेदारी और समान मानकों पर सवाल उठाता है।

2) न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही का प्रश्न

  • 20 जनवरी 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ) ने भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज FIR को निरस्त करते हुए, सनातन धर्म की तुलना बीमारियों से करने और उसके उन्मूलन का संकेत देने वाली भाषा पर टिप्पणी  की।

न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:

  • किसी धर्म के समूल नाश का संकेत देने वाली भाषा हेट स्पीच के दायरे में आती है

एक चिंताजनक प्रवृत्ति दिखती है जहाँ उकसाने वाले वक्तव्य देने वाले अक्सर जवाबदेही से बच जाते हैं, जबकि उन्हें प्रश्नांकित करने वालों पर कानूनी कार्रवाई होती है

  • इन टिप्पणियों ने मुद्दे को राजनीतिक बहस से ऊपर उठाकर कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक प्रश्न में बदल दिया।

3) राज्यों और दलों में व्यापक फैलाव

  • विवाद कई राज्यों और दलों में फैले—जिससे यह स्थानीय अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्थित रुझान प्रतीत होता है।

उदाहरणात्मक मामले:

  • पश्चिम बंगाल: भगवान राम की पहचान पर विवादित दावे
  • तेलंगाना: हिंदू दार्शनिक बहुलता को तुच्छ ठहराने वाली टिप्पणियाँ
  • उत्तर प्रदेश: दीपोत्सव के दौरान हिंदू उत्सवों पर चयनात्मक कसौटी
  • बिहार: देवी-देवताओं व मंदिरों को लेकर आपत्तिजनक बयान, जिनसे विरोध हुआ
  • कर्नाटक: धर्मांतरण को लेकर हिंदू समाज पर व्यापक आरोप
  • महाराष्ट्र व तमिलनाडु: कलंकित करने वाले शब्दों की पुनरावृत्ति व पवित्र प्रतीकों का उपहास
  • जम्मूकश्मीर: विधानसभा में हिंदुओं पर सामान्यीकरण

4) सनातन धर्म को बारबार निशाना

कई मामलों में सनातन धर्म को सीधे नकारात्मक फ्रेम में रखा गया:

  • सनातन को प्रतिगामी/दमनकारी बताना
  • अदालतों द्वारा पहले खारिज किए गए कलंकित शब्दों को पुनर्जीवित करना
  • वैचारिक पहचान दिखाने के लिए हिंदू प्रतीकों से दूरी बनाने की सलाह

यह आलोचना से आगे बढ़कर सभ्यतागत अवमानना की श्रेणी में आता है—विशेषकर जब यह पदासीन नेताओं द्वारा बार-बार हो।

5) अनुष्ठानों और पवित्र प्रथाओं का उपहास

सिद्धांतों से आगे, सामूहिक धार्मिक प्रथाओं पर भी तंज कसा गया:

  • तीर्थयात्राओं और अनुष्ठानिक स्नान की वैधता पर प्रश्न
  • नारों और मंदिर परंपराओं का उपहास

लोकतंत्र में आलोचना वैध है, पर सत्ता में बैठे लोगों द्वारा एक ही आस्था पर चयनात्मक और सतत उपहास सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाता है।

6) अंतरराष्ट्रीय आयाम

अप्रैल 2025 में एक अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मंच पर हिंदू देवताओं को “मिथकीय/काल्पनिक” कहने वाले वक्तव्यों ने फिर बहस छेड़ी:

  • विदेशों में सांस्कृतिक संवेदनशीलता
  • भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की जिम्मेदारी

क्या अन्य आस्थाओं पर ऐसी भाषा पर तत्काल निंदा होती?

7) चयनात्मक सेकुलरिज़्म और असमान प्रतिक्रिया

मुख्य चिंता असममता है:

  • अन्य समुदायों पर समान टिप्पणियाँ अक्सर तत्काल कार्रवाई लाती हैं
  • हिंदुओं के कई मामलों में न्यूनतम कार्यवाही हुई।

यह असंगति तटस्थ प्रवर्तन पर भरोसा कमजोर करती है।

8) लोकतांत्रिक विमर्श की कीमत

निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा लगातार अवमानना:

  • सामाजिक दरारें बढ़ाती है
  • संवैधानिक सेकुलरिज़्म को कमजोर करती है
  • संस्थागत विश्वास घटाती है
  • नीति से ध्यान हटाकर उकसावे पर ले जाती है

बहुलवाद न्याय से फलता है, पक्षपात से नहीं।

9) कानूनी और संस्थागत सुधार की तात्कालिक आवश्यकता

  • यह विषय अब दलगत सीमाओं से ऊपर राष्ट्रीय कर्तव्य बन चुका है।

A) सख्त और स्पष्ट कानून

संसद को स्पष्ट व निर्विवाद कानून बनाने चाहिए, जो निपटें:

  • हेट स्पीच (ऑनलाइन/ऑफलाइन)
  • सोशल मीडिया दुरुपयोग, दुष्प्रचार और संगठित उत्पीड़न
  • आतंकवाद का उकसावा/महिमामंडन/समर्थन
  • राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ

स्पष्टता दुरुपयोग घटाती है; अस्पष्टता उसे बढ़ाती है।

B) समान और निर्भीक प्रवर्तन

  • कानूनों का कड़ा और समान अनुप्रयोग
  • कोई व्यक्ति/विचारधारा कानून से ऊपर नहीं
  • साक्ष्यआधारित, समयबद्ध और पारदर्शी कार्रवाई

चयनात्मक प्रवर्तन, कानून न होने से भी अधिक हानिकारक है।

C) न्यायिक तत्परता और एकरूपता

  • संगत व्याख्या के लिए न्यायपालिका की तत्परता
  • हेट व उकसावे के मामलों का त्वरित निपटान
  • समान संरक्षण और समान जवाबदेही सुनिश्चित करना

10) जिम्मेदारी के साथ अभिव्यक्ति

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मूल अधिकार है—पर:

  • यह अपमान/उकसावे का लाइसेंस नहीं
  • न ही राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने का माध्यम

अधिकार संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ चलते हैं।

राष्ट्र सर्वोपरि, कानून सर्वोच्च

पिछले वर्ष का समग्र रिकॉर्ड संस्थागत आत्ममंथन की मांग करता है। यह किसी आस्था को आलोचना से बचाने का प्रश्न नहीं, बल्कि समान मानक, कानून के समक्ष समानता और जिम्मेदार नेतृत्व का है।

  • कोई भी कानून से ऊपर नहीं
  • हेट, दुरुपयोग, आतंकवाद और राष्ट्रविरोध पर शून्य सहिष्णुता
  • समान न्याय अपरिहार्य
  • राष्ट्र की एकता और सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता

बहुलवाद निष्पक्षता और जवाबदेही से जीवित रहता है—सभी के लिए, बिना भय या पक्षपात

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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