रणनीतिक भटकाव से लेकर सतत राष्ट्रीय संकल्प तक
I. भारत में आतंकवाद: एक संगठित वैचारिक पारिस्थितिकी तंत्र
भारत में इस्लामी आतंकवाद कभी भी अलग-थलग घटनाओं का समूह नहीं रहा। यह एक संगठित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करता रहा, जिसमें शामिल थे:
- धार्मिक गतिविधियों की आड़ में वैचारिक कट्टरता का प्रचार
- पहचान की राजनीति के ज़रिए युवाओं का लक्षित कट्टरपंथीकरण
- हवाला, विदेशी चैरिटी और शेल NGOs के माध्यम से अवैध फंडिंग
- शत्रु देशों से संचालित हैंडलरों के साथ सीमा-पार समन्वय
- मनोवैज्ञानिक युद्ध, जिसका उद्देश्य लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास को कमजोर करना था
इसने आतंकवाद को केवल सुरक्षा समस्या नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक चुनौती बना दिया।
II. 2001–2014: रणनीतिक हिचकिचाहट और नीतिगत असंगति
- लगातार आतंकी हमलों के बावजूद, एक दशक से अधिक समय तक भारत की आतंक-रोधी नीति प्रतिक्रियात्मक और बिखरी हुई रही।
A. राजनीतिक बाधाएँ
- सुरक्षा निर्णयों को अक्सर वोट-बैंक समीकरणों से तौला गया
- संभावित विरोध के डर से चरमपंथी संगठनों पर कार्रवाई टाली या कमजोर की गई
- आतंक नेटवर्क ने इस अनिर्णय का लाभ उठाकर स्थानीय स्तर पर जड़ें जमा लीं
B. संस्थागत कमजोरी
जांच एजेंसियाँ झेलती रहीं:
- राजनीतिक हस्तक्षेप
- स्वीकृति में देरी
- एजेंसियों के बीच कमजोर समन्वय
कठोर कानून मौजूद थे, लेकिन:
- उनका चयनात्मक उपयोग हुआ
- अभियोजन धीमा रहा
- निवारक प्रभाव कमजोर रहा
C. आर्थिक और रणनीतिक असुरक्षा
- रक्षा और तकनीक में भारी आयात निर्भरता
- स्वदेशी निर्माण की कमी
- अपारदर्शी खरीद, कमीशन और किकबैक के आरोप
- परिणाम: रणनीतिक स्वायत्तता कमजोर और वित्तीय दबाव बढ़ा
2014 तक भारत नीतिगत ठहराव, सुरक्षा थकान और आर्थिक मंदी के खतरनाक दौर में पहुँच चुका था।
III. 2014: राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत में निर्णायक बदलाव
- 2014 का राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत का पुनर्निर्धारण था।
मूलभूत परिवर्तन
- राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक सुविधा से ऊपर रखा गया
स्पष्ट अंतर किया गया:
- धर्म और कट्टरता के बीच
- असहमति और राष्ट्रविरोध के बीच
यह स्वीकार किया गया कि:
- “अनियंत्रित कट्टरता हर समुदाय और गणराज्य दोनों को नुकसान पहुँचाती है।”
इस बदलाव ने आतंक-रोधी नीति को तात्कालिक प्रतिक्रिया से निकालकर दीर्घकालिक राज्य नीति बना दिया।
IV. मनमानी शक्ति नहीं, कानून का सशक्त प्रयोग
2014 के बाद रणनीति का केंद्र रहा — कानूनी दृढ़ता।
A. कानूनी निरंतरता
साक्ष्य-आधारित और नियमित उपयोग:
- UAPA
- वित्तीय खुफिया कानून
इसका उद्देश्य:
- गैरकानूनी संगठनों पर प्रतिबंध
- नेतृत्व की जवाबदेही
- फंडिंग नेटवर्क का ध्वस्तीकरण
B. संस्थागत सशक्तिकरण
अधिक संचालनात्मक स्वतंत्रता:
- NIA, ED और अन्य खुफिया एजेंसियों को
- केंद्र–राज्य समन्वय में सुधार
- हमले के बाद जांच से आगे बढ़कर रोकथाम आधारित खुफिया तंत्र
V. नेटवर्क का ध्वंस: 17 प्रतिबंधित संगठन
- 2014 से 2025 के बीच 17 प्रमुख इस्लामी आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया।
प्रतिबंधों का प्रभाव
- भर्ती श्रृंखलाएँ टूटीं
- विदेशी फंडिंग मार्ग उजागर हुए
- चरमपंथी संगठनों की वैचारिक वैधता घटी
- स्लीपर सेल और लॉजिस्टिक्स बाधित हुए
कार्रवाई केवल आतंकियों पर नहीं, बल्कि पूरी श्रृंखला पर केंद्रित रही:
- विचारधारा → भर्ती → फंडिंग → लॉजिस्टिक्स → हिंसा
VI. जमीनी स्तर पर कट्टरता रोकथाम
- 2014 के बाद की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह समझ थी कि आतंकवाद गतिविधियाँ हमले से बहुत पहले शुरू हो जाती हैं।
अपनाए गए उपाय
- एन्क्रिप्टेड और ऑनलाइन प्रचार चैनलों की निगरानी
- कट्टरपंथीकरण के प्रारंभिक संकेतों की पहचान
- समुदाय आधारित खुफिया इनपुट
- हिंसा से पहले ही हस्तक्षेप
इससे भर्ती और हमलों दोनों में गिरावट आई।
VII. आर्थिक और रणनीतिक आतंक-रोधी नीति
- आधुनिक आतंकी नेटवर्क पैसे, लॉजिस्टिक्स और धारणा पर निर्भर करते हैं।
A. वित्तीय युद्ध
- संपत्तियों की जब्ती और फ्रीजिंग
- NGO और चैरिटी फंडिंग की जांच
- आतंक फंडिंग के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग
B. रणनीतिक स्वायत्तता = सुरक्षा नीति
- स्वदेशी रक्षा उत्पादन का विस्तार
- आयात निर्भरता में कमी
- भारत का रक्षा निर्यातक के रूप में उभरना
- आर्थिक मजबूती एक निवारक शक्ति बनी
C. विश्वसनीय प्रतिरोध
स्पष्ट संदेश:
- आतंकी हमलों के परिणाम होंगे
- राज्य-प्रायोजित प्रॉक्सी को छूट नहीं मिलेगी
इससे शत्रु नेटवर्क की जोखिम गणना बदल गई।
VIII. वैश्विक भूमिका: पीड़ित से नेतृत्वकर्ता तक
भारत की वैश्विक स्थिति बदली:
- अपील से आगे बढ़कर सक्रिय सहयोग
- अलग-थलग खुफिया से नेटवर्क्ड सुरक्षा साझेदारी
- रक्षात्मक कूटनीति से नेतृत्वकारी भूमिका
भारत अब केवल पीड़ित नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा हितधारक बन चुका है।
IX. 2014 के बाद वास्तव में क्या बदला
पहले
- रणनीतिक अस्पष्टता
- संस्थागत हिचकिचाहट
- आर्थिक निर्भरता
- बिखरा हुआ प्रवर्तन
बाद में
- नीतिगत स्पष्टता
- कानून का समान प्रयोग
- सशक्त संस्थाएँ
- वित्तीय और वैचारिक प्रहार
- रणनीतिक आत्मनिर्भरता
अंतर सिर्फ इरादे से नहीं, निरंतर क्रियान्वयन से आया।
X. भविष्य के लिए सबक
भारत का अनुभव एक सार्वभौमिक सत्य दिखाता है:
- आतंकवाद गुस्से से नहीं, बल्कि निरंतर, कानूनी और संस्थागत संकल्प से टूटता है।
उपलब्धियाँ बनाए रखने के लिए:
- न्यायिक संतुलन और गति आवश्यक
- संस्थानों की स्वतंत्रता व जवाबदेही जरूरी
- चरमपंथ की राजनीतिक शरण समाप्त हो
- जन-जागरूकता बनी रहे
XI. भारत के सभ्यतागत भविष्य की सुरक्षा
- लोकतंत्र और सुरक्षा विरोधी नहीं हैं।
- जब शासन ईमानदार हो, संस्थाएँ सशक्त हों और कानून बिना भय व पक्षपात लागू हों, तो गहराई से जड़े आतंकी तंत्र भी ध्वस्त किए जा सकते हैं।
- आगे की चुनौती संतोष नहीं, निरंतरता है।
- एक सुरक्षित भारत दशकों की अनुशासित नीति, कानूनी दृढ़ता और राष्ट्रीय सहमति से बनता है—और यह यात्रा अभी जारी है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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