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इस्लामी आतंक

इस्लामी आतंक के विरुद्ध भारत की दीर्घकालिक लड़ाई (2001–2024)

रणनीतिक भटकाव से लेकर सतत राष्ट्रीय संकल्प तक

I. भारत में आतंकवाद: एक संगठित वैचारिक पारिस्थितिकी तंत्र

भारत में इस्लामी आतंकवाद कभी भी अलग-थलग घटनाओं का समूह नहीं रहा। यह एक संगठित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करता रहा, जिसमें शामिल थे:

  • धार्मिक गतिविधियों की आड़ में वैचारिक कट्टरता का प्रचार
  • पहचान की राजनीति के ज़रिए युवाओं का लक्षित कट्टरपंथीकरण
  • हवाला, विदेशी चैरिटी और शेल NGOs के माध्यम से अवैध फंडिंग
  • शत्रु देशों से संचालित हैंडलरों के साथ सीमा-पार समन्वय
  • मनोवैज्ञानिक युद्ध, जिसका उद्देश्य लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास को कमजोर करना था

इसने आतंकवाद को केवल सुरक्षा समस्या नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक चुनौती बना दिया।

II. 2001–2014: रणनीतिक हिचकिचाहट और नीतिगत असंगति

  • लगातार आतंकी हमलों के बावजूद, एक दशक से अधिक समय तक भारत की आतंक-रोधी नीति प्रतिक्रियात्मक और बिखरी हुई रही।

A. राजनीतिक बाधाएँ

  • सुरक्षा निर्णयों को अक्सर वोट-बैंक समीकरणों से तौला गया
  • संभावित विरोध के डर से चरमपंथी संगठनों पर कार्रवाई टाली या कमजोर की गई
  • आतंक नेटवर्क ने इस अनिर्णय का लाभ उठाकर स्थानीय स्तर पर जड़ें जमा लीं

B. संस्थागत कमजोरी

जांच एजेंसियाँ झेलती रहीं:

  • राजनीतिक हस्तक्षेप
  • स्वीकृति में देरी
  • एजेंसियों के बीच कमजोर समन्वय

कठोर कानून मौजूद थे, लेकिन:

  • उनका चयनात्मक उपयोग हुआ
  • अभियोजन धीमा रहा
  • निवारक प्रभाव कमजोर रहा

C. आर्थिक और रणनीतिक असुरक्षा

  • रक्षा और तकनीक में भारी आयात निर्भरता
  • स्वदेशी निर्माण की कमी
  • अपारदर्शी खरीद, कमीशन और किकबैक के आरोप
  • परिणाम: रणनीतिक स्वायत्तता कमजोर और वित्तीय दबाव बढ़ा

2014 तक भारत नीतिगत ठहराव, सुरक्षा थकान और आर्थिक मंदी के खतरनाक दौर में पहुँच चुका था।

III. 2014: राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत में निर्णायक बदलाव

  • 2014 का राजनीतिक परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत का पुनर्निर्धारण था।

मूलभूत परिवर्तन

  • राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक सुविधा से ऊपर रखा गया

स्पष्ट अंतर किया गया:

  • धर्म और कट्टरता के बीच
  • असहमति और राष्ट्रविरोध के बीच

यह स्वीकार किया गया कि:

  • “अनियंत्रित कट्टरता हर समुदाय और गणराज्य दोनों को नुकसान पहुँचाती है।”

इस बदलाव ने आतंक-रोधी नीति को तात्कालिक प्रतिक्रिया से निकालकर दीर्घकालिक राज्य नीति बना दिया।

IV. मनमानी शक्ति नहीं, कानून का सशक्त प्रयोग

2014 के बाद रणनीति का केंद्र रहा — कानूनी दृढ़ता

A. कानूनी निरंतरता

साक्ष्य-आधारित और नियमित उपयोग:

  • UAPA
  • वित्तीय खुफिया कानून

इसका उद्देश्य:

  • गैरकानूनी संगठनों पर प्रतिबंध
  • नेतृत्व की जवाबदेही
  • फंडिंग नेटवर्क का ध्वस्तीकरण

B. संस्थागत सशक्तिकरण

अधिक संचालनात्मक स्वतंत्रता:

  • NIA, ED और अन्य खुफिया एजेंसियों को
  • केंद्र–राज्य समन्वय में सुधार
  • हमले के बाद जांच से आगे बढ़कर रोकथाम आधारित खुफिया तंत्र

V. नेटवर्क का ध्वंस: 17 प्रतिबंधित संगठन

  • 2014 से 2025  के बीच 17 प्रमुख इस्लामी आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया।

प्रतिबंधों का प्रभाव

  • भर्ती श्रृंखलाएँ टूटीं
  • विदेशी फंडिंग मार्ग उजागर हुए
  • चरमपंथी संगठनों की वैचारिक वैधता घटी
  • स्लीपर सेल और लॉजिस्टिक्स बाधित हुए

कार्रवाई केवल आतंकियों पर नहीं, बल्कि पूरी श्रृंखला पर केंद्रित रही:

  • विचारधारा → भर्ती → फंडिंग → लॉजिस्टिक्स → हिंसा

VI. जमीनी स्तर पर कट्टरता रोकथाम

  • 2014 के बाद की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह समझ थी कि आतंकवाद गतिविधियाँ हमले से बहुत पहले शुरू हो जाती हैं

अपनाए गए उपाय

  • एन्क्रिप्टेड और ऑनलाइन प्रचार चैनलों की निगरानी
  • कट्टरपंथीकरण के प्रारंभिक संकेतों की पहचान
  • समुदाय आधारित खुफिया इनपुट
  • हिंसा से पहले ही हस्तक्षेप

इससे भर्ती और हमलों दोनों में गिरावट आई।

VII. आर्थिक और रणनीतिक आतंक-रोधी नीति

  • आधुनिक आतंकी नेटवर्क पैसे, लॉजिस्टिक्स और धारणा पर निर्भर करते हैं।

A. वित्तीय युद्ध

  • संपत्तियों की जब्ती और फ्रीजिंग
  • NGO और चैरिटी फंडिंग की जांच
  • आतंक फंडिंग के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग

B. रणनीतिक स्वायत्तता = सुरक्षा नीति

  • स्वदेशी रक्षा उत्पादन का विस्तार
  • आयात निर्भरता में कमी
  • भारत का रक्षा निर्यातक के रूप में उभरना
  • आर्थिक मजबूती एक निवारक शक्ति बनी

C. विश्वसनीय प्रतिरोध

स्पष्ट संदेश:

  • आतंकी हमलों के परिणाम होंगे
  • राज्य-प्रायोजित प्रॉक्सी को छूट नहीं मिलेगी

इससे शत्रु नेटवर्क की जोखिम गणना बदल गई

VIII. वैश्विक भूमिका: पीड़ित से नेतृत्वकर्ता तक

भारत की वैश्विक स्थिति बदली:

  • अपील से आगे बढ़कर सक्रिय सहयोग
  • अलग-थलग खुफिया से नेटवर्क्ड सुरक्षा साझेदारी
  • रक्षात्मक कूटनीति से नेतृत्वकारी भूमिका

भारत अब केवल पीड़ित नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा हितधारक बन चुका है।

IX. 2014 के बाद वास्तव में क्या बदला

पहले

  • रणनीतिक अस्पष्टता
  • संस्थागत हिचकिचाहट
  • आर्थिक निर्भरता
  • बिखरा हुआ प्रवर्तन

बाद में

  • नीतिगत स्पष्टता
  • कानून का समान प्रयोग
  • सशक्त संस्थाएँ
  • वित्तीय और वैचारिक प्रहार
  • रणनीतिक आत्मनिर्भरता

अंतर सिर्फ इरादे से नहीं, निरंतर क्रियान्वयन से आया।

X. भविष्य के लिए सबक

भारत का अनुभव एक सार्वभौमिक सत्य दिखाता है:

  • आतंकवाद गुस्से से नहीं, बल्कि निरंतर, कानूनी और संस्थागत संकल्प से टूटता है।

उपलब्धियाँ बनाए रखने के लिए:

  • न्यायिक संतुलन और गति आवश्यक
  • संस्थानों की स्वतंत्रता व जवाबदेही जरूरी
  • चरमपंथ की राजनीतिक शरण समाप्त हो
  • जन-जागरूकता बनी रहे

XI. भारत के सभ्यतागत भविष्य की सुरक्षा

  • लोकतंत्र और सुरक्षा विरोधी नहीं हैं।
  • जब शासन ईमानदार हो, संस्थाएँ सशक्त हों और कानून बिना भय व पक्षपात लागू हों, तो गहराई से जड़े आतंकी तंत्र भी ध्वस्त किए जा सकते हैं
  • आगे की चुनौती संतोष नहीं, निरंतरता है।
  • एक सुरक्षित भारत दशकों की अनुशासित नीति, कानूनी दृढ़ता और राष्ट्रीय सहमति से बनता है—और यह यात्रा अभी जारी है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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