“इतिहास से ‘मिथक’ तक : हमें अपने पूर्वजों पर हँसना किसने सिखाया?” यह विषय बताता है कि कैसे समय के साथ हमारी सोच बदली और विरासत पर दृष्टि परिवर्तित हुई।
- उन्होंने हमारे मंदिर जलाए — हमने उन्हें फिर से खड़ा किया।
- उन्होंने हमारा सोना लूटा — हमने फिर से कमाया।
- लेकिन जब उन्होंने हमारा इतिहास चुराकर उसे “मिथक” कहा, तब हमने न प्रतिरोध किया, न क्रांति।
- बल्कि हमने स्वयं अपने बच्चों को भी यही सिखाया।
⚠️ यदि आपकी रगों में सनातन बहता है, तो इसे अंत तक पढ़ें और फिर संकल्प लें — कभी अपने इतिहास को “मिथक” मत कहें।
1. जब इतिहास और आस्था एक थे
भारतवर्ष में वह काल था जब इतिहास और आस्था एक–दूसरे का पर्याय थे।
- अयोध्या में बच्चे विश्वास नहीं करते थे कि श्रीराम का जन्म वहीं हुआ था — वे जानते थे। पीढ़ी-दर-पीढ़ी दादाजी पोते को जन्मस्थान दिखाते थे।
- द्वारका में मछुआरे जानते थे कि यह नगर यादवों का था जिसे समुद्र ने निगल लिया।
- कुरुक्षेत्र के किसान जानते थे कि इसी भूमि पर महाभारत का महासंग्राम हुआ था।
> कोई “पाठ्यपुस्तक” सबूत नहीं देती थी, भूमि और लोककथाएँ ही इतिहास की जीवित गवाही थीं।
> यही था इतिहास — “इत्थं आसीत्” — “ऐसा ही हुआ।”
2. पहला घाव – आक्रमणकारियों की तलवार
मुग़ल और तुर्की आक्रांता जब आए, तो उन्होंने केवल मंदिर या धन नहीं लूटा — उन्होंने हमारी स्मृति पर प्रहार किया। वे समझते थे कि जब तक हिंदू अपने धर्म और गुरुकुलों से जुड़े रहेंगे, तब तक वे आत्मा से आज़ाद रहेंगे और गुलामी स्वीकार नहीं करेंगे।
इसलिए उन्होंने निशाना साधा हमारे गुरुकुलों और शास्त्रों पर।
- नालंदा, जो दुनिया की सबसे बड़ी विश्वविद्यालय थी, महीनों तक जलती रही। हज़ारों ग्रंथ राख में बदल गए।
- विक्रमशिला, तक्षशिला और असंख्य छोटे गुरुकुल ध्वस्त कर दिए गए।
- ताम्रपत्र अभिलेख जो राजवंशों का इतिहास बताते थे, पिघलाकर सिक्के बनाए गए।
- मंदिरों पर मस्जिदें बनाकर न सिर्फ़ हमारे धर्मस्थल मिटाए गए बल्कि हमारी भूगोल–स्मृति को भी बदला गया।
लेकिन फिर भी हम जीवित रहे। क्यों? क्योंकि मराठा और राजपूत न झुके, न समझौता किया।
- छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू स्वराज्य स्थापित किया।
- महाराणा प्रताप जैसे वीरों ने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपने जीवन को दाँव पर लगा दिया।
वे जानते थे — धर्म से समझौता = राष्ट्र का अंत।
3. दूसरा घाव – उपनिवेशवादियों की कलम
- अंग्रेज़ तलवार से नहीं, शिक्षा और विचारधारा से आए। उन्होंने वही किया जो मुग़ल असफल रहे थे।
उनका लक्ष्य था: “इनके मंदिर तो नष्ट हुए पर स्मृति अभी जीवित है। यदि हम इनकी सोच बदल दें, तो यह कभी उठ नहीं पाएंगे।”
- उन्होंने गुरुकुल व्यवस्था तोड़ी और मैकाले शिक्षा प्रणाली थोपी।
- बच्चों को संस्कृत, वेद, गीता से दूर कर अंग्रेज़ी, पश्चिमी इतिहास और भौतिकवाद सिखाया गया।
- संयुक्त परिवार जहाँ धर्म और संस्कार स्वाभाविक रूप से संचारित होते थे, तोड़कर व्यक्तिगतवाद और उपभोगवाद फैलाया गया।
ज़हरीली चाल – भाषा का खेल
- बाइबल = इतिहास
- कुरान = ईश्वर का आदेश
- रामायण = “मिथक”
- महाभारत = “किंवदंती”
यही सबसे बड़ा हमला था। हिंदू धीरे-धीरे अपने ग्रंथों को कहानियाँ समझने लगे, और दूसरों को सत्य मानने लगे।
4. 1947 के बाद – अपने ही हाथों मानसिक गुलामी
स्वतंत्रता के बाद भी हम आज़ाद नहीं हुए। क्यों?
- क्योंकि कांग्रेस ने वही ज़हर हमारे शैक्षिक और सांस्कृतिक ढाँचे में बनाए रखा।
- 70+ वर्षों तक स्कूलों में सनातन धर्म को कोई स्थान नहीं मिला।
- पाठ्यपुस्तकों में अकबर महान पढ़ाया गया, लेकिन शिवाजी को क्षेत्रीय नायक बना दिया गया।
- वैदिक विज्ञान की जगह पश्चिमी इतिहास और नायक भर दिए गए।
- “धर्मनिरपेक्षता” के नाम पर हिंदू मूल्यों का उपहास किया गया।
यह मानसिक गुलामी थी — इस बार विदेशी नहीं, बल्कि अपने ही नेताओं के हाथों।
5. समाधान – गुरुकुल धर्म की ओर वापसी
- जब मुग़लों ने गुरुकुल जलाए और अंग्रेज़ों ने उन्हें नष्ट किया, तो स्पष्ट है कि हमारी सबसे बड़ी ताक़त शिक्षा और परिवार थी।
इसलिए समाधान भी यही है:
- गुरुकुल आधारित शिक्षा का पुनर्जागरण।
> वेद, उपनिषद, गीता, पुराण आधुनिक विज्ञान के साथ पढ़ाए जाएँ।
> संस्कृत को अनिवार्य बनाया जाए।
- परिवार प्रणाली का पुनर्निर्माण।
> संयुक्त परिवार और सामूहिक संस्कृति को पुनर्जीवित किया जाए।
- ब्रिटिश और मुग़ल ज़हर का उन्मूलन।
> स्कूलों से “मिथक” शब्द हटाकर “इतिहास” सिखाया जाए।
बच्चों में आत्मगौरव जगाया जाए कि वे विश्व की सबसे प्राचीन और जीवित सभ्यता के वंशज हैं।
🚩 स्मृति ही सनातन की साँस है
- सनातन इसलिए जिंदा है क्योंकि हमने याद रखा। जिस दिन हम भूल गए, उसी दिन यह मर जाएगा।
- जब आप रामायण को “मिथक” कहते हैं, तो आप अयोध्या को दफ़नाते हैं।
- जब आप महाभारत को “किंवदंती” कहते हैं, तो आप कुरुक्षेत्र को मिटाते हैं।
- जब आप रामसेतु को “प्राकृतिक” कहते हैं, तो आप अपने ही पूर्वजों को नकारते हैं।
अब शत्रु हमारे मंदिर नहीं जलाते — हमें हमारी स्मृति जलाते हैं।
🔥 अंतिम आह्वान
- यदि यह सच आपके हृदय को झकझोर गया है, तो इसे यहीं मत रोकिए।
- अपने बच्चों को सिखाइए, मित्रों तक पहुँचाइए।
- हर शेयर, हर पाठ, हर संवाद — सदियों के झूठ पर एक प्रहार है।
आइए, हम केवल पत्थरों के मंदिर न बनाएँ, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हृदयों में अच्छी स्मृतियों के मंदिर बनाएँ।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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