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भीड़तंत्र और तोड़फोड़

जब भीड़तंत्र और तोड़फोड़ लोकतंत्र व संविधान को हाइजैक करने की कोशिश करते हैं

सारांश

  • यह लेख बताता है कि भारत में असहमति किस प्रकार धीरे-धीरे संगठित अवरोध, तोड़फोड़ और डराने-धमकाने में बदलती जा रही है—जिसका उद्देश्य सुधार नहीं बल्कि संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाना है।
  • यह स्पष्ट करता है कि यह प्रवृत्ति क्यों खतरनाक है, कैसे हर सत्र में सामान्य बनती जा रही है, और क्यों कोई भी संवैधानिक लोकतंत्र अनैतिक व अवैध तरीकों से शासन को बंधक बनाने को सहन नहीं कर सकता।

वैध असहमति से संगठित अराजकता तक

1) संवैधानिक आदर्श: बहस, निर्णय और जवाबदेही

भारत का लोकतंत्र इस सिद्धांत पर आधारित है कि मतभेदों का समाधान संस्थाओं, प्रक्रियाओं और कानून के माध्यम से हो। इस व्यवस्था के केंद्र में संसद है, जहाँ:

  • नागरिकों का प्रतिनिधित्व होता है
  • नीतियों और बजट की समीक्षा होती है
  • प्रश्नकाल और बहस के माध्यम से कार्यपालिका को जवाबदेह बनाया जाता है
  • मतदान द्वारा असहमति को कानून में बदला जाता है

मूल सिद्धांत: लोकतंत्र शोर नहीं, बल्कि नियमों द्वारा संचालित संवाद है।

2) क्या बदला है: विरोध से पंगुकरण तक

हाल के वर्षों में लोकसभा और राज्यसभा—दोनों में एक चिंताजनक पैटर्न दिखा है:

  • कार्यवाही शुरू होते ही हंगामा
  • भाषणों की जगह नारेबाज़ी
  • वेल में आकर कार्यवाही रोकना
  • प्रश्नकाल खत्म करने के लिए सुनियोजित वॉकआउट
  • बार-बार स्थगन ताकि कोई काम न हो

यह क्यों गंभीर है:

  • बहस करना चाहने वाले सांसदों को बोलने नहीं दिया जाता
  • करदाताओं का समय और पैसा बर्बाद होता है
  • बिना चुनाव के ही नागरिकों का प्रतिनिधित्व छिन जाता है

यह संसद के भीतर विरोध नहीं, बल्कि संसद को चलने से रोकने का प्रयास है।

3) नियमितता और बढ़ती तीव्रता: लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

  • हर लोकतंत्र में तनाव होता है, लेकिन आज की समस्या है बार-बार और पूर्वानुमेय अवरोध

खतरनाक रुझान:

  • हर सत्र में अधिक घंटे बर्बाद
  • पहले से जल्दी हंगामा, लंबे समय तक अवरोध
  • पीठासीन अधिकारियों के निर्देशों की खुली अवहेलना
  • अराजकता ही उद्देश्य बन जाना

सामान्यीकरण का जाल:

  • जो एक बार सहा गया, वह स्वीकार्य बनता है
  • जो स्वीकार्य हुआ, वह नियमित बनता है
  • जो नियमित हुआ, वही भविष्य की मिसाल बनता है

लोकतंत्र अचानक नहीं गिरता—वह धीरे-धीरे क्षरण से खत्म होता है।

4) तोड़फोड़ और डर: राजनीति से अपराध की ओर

संसदीय अवरोध के साथ-साथ अब यह भी दिख रहा है:

  • सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान
  • सुरक्षा प्रतिक्रिया भड़काने की कोशिश
  • अधिकारियों, पत्रकारों और विधायकों को डराना
  • संस्थाओं को अवैध ठहराने वाले भड़काऊ बयान

संवैधानिक स्पष्टता:

✔ शांतिपूर्ण विरोध = अधिकार

✖ जानबूझकर अवरोध, तोड़फोड़, धमकी = अपराध

अवैध कृत्य राजनीति कहलाने से वैध नहीं हो जाते।

5) भीड़तंत्र का वास्तविक अर्थ

भीड़तंत्र “जनशक्ति” नहीं है, बल्कि:

  • कानून की जगह शोर
  • तर्क की जगह दबाव
  • सहमति की जगह डर

लक्षण:

  • तर्क की जगह आवाज़
  • प्रक्रिया की जगह धमकी
  • जवाबदेही की जगह अराजकता

यह तब फलता-फूलता है जब संस्थाएँ कठोर कार्रवाई से हिचकती हैं।

6) नागरिकों को चुकानी पड़ने वाली कीमत

संवैधानिक संस्थाएँ जब नहीं चलतीं, तो नुकसान सभी का होता है:

  • प्रतिनिधित्व का नुकसान
  • शासन में देरी
  • आर्थिक अनिश्चितता
  • संस्थाओं पर विश्वास में गिरावट

यह नुकसान धीरे-धीरे जमा होता है—जब तक कि अराजकता सामान्य न लगने लगे।

7) उदासीनता तटस्थता नहीं

जब अवैध तरीकों से संविधान को बंधक बनाया जाता है:

  • चुप्पी = अनुमति
  • देरी = प्रोत्साहन
  • सहनशीलता = मिलीभगत

संविधान स्वतंत्रता के साथ अनुशासन और जिम्मेदारी भी मांगता है।

8) लोकतांत्रिक चेतावनी

  • लोकतंत्र अव्यवस्था नहीं है।
  • यह कानून और सहमति से संचालित व्यवस्था है।

यदि:

  • विधायिकाएँ ठप हों
  • तोड़फोड़ सामान्य बने
  • बहस की जगह धमकी ले

तो लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल जाता है।

आगे क्या

  • यदि यह व्यवधान जानबूझकर है, तो लाभ किसे हो रहा है?
  • चुनावी हताशा
  • नैरेटिव वॉरफेयर
  • अर्थव्यवस्था पर असर

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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