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भारतीय सिनेमा

खाड़ी देशों में भारतीय सिनेमा पर बढ़ती सेंसरशिप क्यों?

तुष्टिकरण-युग की कहानी से राष्ट्रीय आत्मविश्वास तक

  • भारतीय सिनेमा ने लंबे समय तक खाड़ी क्षेत्र में एक विशाल और निष्ठावान दर्शक वर्ग का आनंद लिया है। इसका कारण वहाँ रहने वाला बड़ा भारतीय और दक्षिण एशियाई प्रवासी समुदाय तथा दशकों की सांस्कृतिक परिचितता रहा है।
  • लेकिन हाल के वर्षों में एक स्पष्ट बदलाव दिख रहा है—जो फ़िल्में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, ऐतिहासिक स्मृति और राजनीतिक वास्तविकताओं से जुड़ती हैं, वे खाड़ी देशों में बढ़ती सेंसरशिप, प्रतिबंध या भारी कटौती का सामना कर रही हैं।

यह कोई संयोग नहीं है। यह भारत के भीतर कथानक (नैरेटिव) के बदलाव और विदेशों में उस बदले हुए कथानक की स्वीकार्यता—दोनों का प्रतिबिंब है।

I. 2014 से पहले का ‘कंफर्ट ज़ोन’: तब विरोध क्यों नहीं हुआ?

स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक भारत की राजनीतिक व्यवस्था ने इतिहास, धर्म और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर तुष्टिकरण और कथात्मक संयम की नीति अपनाई। इसका सीधा असर सिनेमा पर पड़ा।

2014 से पहले की मुख्यधारा की कहानियों की विशेषताएँ

मध्यकालीन और औपनिवेशिक इतिहास में:

  • आक्रमणों और संघर्षों को नरम दिखाया गया
  • आक्रांताओं का रोमानीकरण
  • सभ्यतागत पीड़ा से परहेज़

हिंदू शासकों, सुधारकों और प्रतिरोध नायकों को:

  • हाशिये पर रखा गया
  • प्रतिगामी या त्रुटिपूर्ण दिखाया गया

आतंकवाद और उग्रवाद को:

  • विचारधारा से अलग कर
  • केवल कानून-व्यवस्था की समस्या बताया गया

भारतीय सांस्कृतिक पहचान को:

  • क्षमाप्रार्थी
  • असंतुलित आत्म-आलोचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया

यह दृष्टिकोण घरेलू वोट-बैंक राजनीति के अनुकूल था और खाड़ी जैसे मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की संवेदनशीलताओं से भी टकराता नहीं था। जब तक भारतीय सिनेमा अपनी सभ्यतागत पहचान को मुखरता से व्यक्त नहीं करता था, सब सहज थे

II. 2014 के बाद का बदलाव: कहानी में राष्ट्रीय आत्मविश्वास

2014 के बाद भारत में केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत परिवर्तन दिखाई दिया।

क्या बदला? खुलकर चर्चा:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा खतरों पर
  • सीमा-पार आतंकवाद पर
  • ऐतिहासिक अन्याय पर

पुनर्प्राप्ति:

  • स्वदेशी नायकों की
  • दबाई गई इतिहास-कथाओं की
  • सांस्कृतिक गर्व की

सामान्यीकरण:

  • रणनीतिक स्पष्टता का
  • संप्रभुता-प्रथम नीति का

समाज का दर्पण होने के नाते, सिनेमा ने भी इस बदलाव को प्रतिबिंबित करना शुरू किया।

III. भारतीय फ़िल्मों की नई धारा: क्या अलग है?

एक नए वर्ग के फ़िल्मकारों ने ऐसी कहानियाँ कही हैं जो:

  • भारत–पाक संघर्ष को भारत के दृष्टिकोण से दिखाती हैं
  • आतंकवाद को बिना यूफ़ेमिज़्म के संबोधित करती हैं
  • कश्मीर और संवैधानिक फैसलों को संप्रभु मुद्दा मानती हैं
  • मध्यकालीन इतिहास को रोमानी फ़िल्टर के बिना परखती हैं
  • भारतीय सशस्त्र बलों को गरिमा और यथार्थ के साथ प्रस्तुत करती हैं

ये फ़िल्में नई वास्तविकताएँ गढ़ती नहीं, बल्कि लंबे समय से दबे दृष्टिकोणों को सामने लाती हैं।

IV. खाड़ी में असहजता क्यों बढ़ी?

खाड़ी के नियामक प्रायः कारण बताते हैं:

  • सांस्कृतिक संवेदनशीलता
  • सामाजिक सौहार्द
  • भू-राजनीतिक तटस्थता

परंतु प्रतिबंधों का पैटर्न चयनात्मक असहजता की ओर संकेत करता है। जिन फ़िल्मों पर आपत्ति होती है, उनकी सामान्य विशेषताएँ:

  • पाकिस्तान-सम्बद्ध आतंकवाद
  • जिहादी हिंसा
  • भारतीय सैन्य अभियान
  • अनुच्छेद 370 और कश्मीर
  • इस्लामी शासकों से जुड़े ऐतिहासिक संघर्ष

वहीं:

  • हिंदू समाज या भारतीय संस्थाओं की आलोचना करने वाली फ़िल्में अक्सर बिना रोक-टोक के चल जाती हैं
  • आत्म-आलोचनात्मक या क्षमाप्रार्थी कथाएँ सहजता से पास हो जाती हैं

इससे स्पष्ट है कि समस्या हिंसा या राजनीति नहीं, बल्कि कौन-सा दृष्टिकोण स्वीकार्य है—यह है।

V. जनसांख्यिकी और ‘स्थिरता’ का कारक

एक और अनकहा कारण जनसांख्यिकी है।

  • पाकिस्तान और दक्षिण एशिया से बड़े प्रवासी समुदाय
  • सरकारों की आंतरिक स्थिरता पर प्राथमिकता
  • वैचारिक टकराव भड़काने वाली कथाओं के प्रति कम सहिष्णुता

नियामक दृष्टि से, बहस संभालने से आसान है असहज कथाओं को दबाना

VI. घरेलू प्रतिरोध: पुराने इकोसिस्टम की बेचैनी

प्रतिरोध केवल बाहरी नहीं है। भारत के भीतर भी मीडिया, अकादमिक जगत, फ़िल्म आलोचना और एक्टिविस्ट नेटवर्क का एक हिस्सा इस बदलाव से असहज है।

यह इकोसिस्टम क्यों बेचैन है

  • नैतिक व्याख्या पर एकाधिकार कमजोर पड़ना
  • दर्शकों का पुराने नैरेटिव पर सवाल उठाना
  • राष्ट्रीय गर्व को ‘अतिवाद’ कहकर खारिज न कर पाना
  • इतिहास-पुनर्मूल्यांकन का सामान्य होना

लंबे समय तक इस इकोसिस्टम ने:

  • हिंदू आत्मविश्वास को ख़तरा बताया
  • राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं को भ्रम कहा
  • सांस्कृतिक गर्व को ‘मेजरिटेरियनिज़्म’ करार दिया

नई सिनेमाई धारा इस ढांचे को चुनौती देती है।

VII. सॉफ्ट पावर के रूप में सिनेमा: दांव क्यों बढ़े हैं

भारतीय सिनेमा अब केवल मनोरंजन नहीं, सॉफ्ट पावर है। सॉफ्ट पावर तब प्रतिरोध झेलती है जब वह:

  • प्रचलित क्षेत्रीय कथाओं को चुनौती दे
  • अनुमोदन के लिए आत्म-सेंसरशिप से इंकार करे
  • एक संप्रभु और आत्मविश्वासी राष्ट्रीय स्वर दिखाए

जो शक्तियाँ उस भारत के साथ सहज थीं जो:

  • स्वयं को छोटा महसूस करता था
  • अंतहीन क्षमा माँगता था
  • असहज सत्य से बचता था

वे उस भारत से स्वाभाविक रूप से असहज हैं जो:

  • स्पष्ट बोलता है
  • अपने इतिहास का स्वामित्व लेता है
  • अपने हितों की रक्षा करता है

VIII. भय के बिना सत्य का सामना

हर परिपक्व राष्ट्र इस चरण से गुजरता है:

  • जापान गुज़रा
  • इज़राइल रोज़ झेलता है
  • चीन बिना झिझक अपनाता है

भारत भी अपवाद नहीं।

भारतीय सिनेमा के सामने विकल्प

  • बाहरी आराम के लिए सत्य को पतला करें या
  • आत्मसम्मान की कीमत पर प्रतिरोध करना स्वीकार करें

कलात्मक स्वतंत्रता का अर्थ सर्वसम्मति नहीं, बल्कि बिना वैचारिक अनुमति अपनी कहानी कहने का अधिकार है।

IX. प्रतिरोध पतन नहीं, परिवर्तन का संकेत है

खाड़ी में भारतीय फ़िल्मों पर बढ़ती सेंसरशिप अप्रासंगिकता का संकेत नहीं है। यह दर्शाती है कि भारत का नैरेटिव बदल चुका है—और देखा जा रहा है।

  • सत्य असहज करता है।
  • सत्य व्यवधान लाता है।
  • सत्य को बाँधा नहीं जा सकता।

आज का भारतीय सिनेमा उस राष्ट्र का प्रतिबिंब है जिसने अनुमोदन माँगना छोड़ दिया है। यह परिवर्तन कुछ के लिए असुविधाजनक हो सकता है, पर यह अपरिहार्य, आवश्यक और समयोचित है।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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