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लोकतंत्र पर संकट

लोकतंत्र पर संकट: झूठे नैरेटिव और विदेशी हस्तक्षेप के दौर में सजगता की आवश्यकता

सारांश

  • भारत आज अपने राष्ट्रीय सफर के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पिछले ग्यारह वर्षों में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है—आर्थिक विस्तार, रणनीतिक स्वायत्तता, अवसंरचना विकास, डिजिटल समावेशन और वैश्विक प्रभाव में वृद्धि।
  • लेकिन इस उभार के साथ-साथ प्रतिरोध भी तेज़ हुआ है। एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है, जहाँ विपक्ष के कुछ हिस्से और एक व्यापक राष्ट्रविरोधी पारितंत्र “लोकतंत्र की रक्षा” के नाम पर अलोकतांत्रिक तरीकों का सहारा ले रहे हैं—झूठे नैरेटिव फैला रहे हैं, संस्थानों में अविश्वास पैदा कर रहे हैं और विदेशी दबाव आमंत्रित कर भारत की गति को धीमा करने का प्रयास कर रहे हैं।
  • यह लेख तर्क देता है कि लोकतंत्र की रक्षा अराजकता या बाहरी हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं, राजनीतिक स्थिरता और जागरूक नागरिकों से होती है। इस समय ध्रुवीकरण के बिना सजगता और स्थिर, राष्ट्रवादी शासन के लिए सामाजिक व राजनीतिक समर्थन भारत को अग्रणी वैश्विक शक्ति बनाने के लिए आवश्यक है।

क्यों भारत के उत्थान के लिए एकता, संवैधानिक अनुशासन और राष्ट्रीय संकल्प अनिवार्य है


1. भारत का परिवर्तनकारी दशक: संदर्भ महत्वपूर्ण है

पिछले ग्यारह वर्षों में भारत ने ऐसे परिवर्तन देखे हैं जिन्होंने उसकी घरेलू और वैश्विक स्थिति बदल दी है:

  • वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सतत आर्थिक वृद्धि
  • अवसंरचना का व्यापक विस्तार—सड़कें, रेल, बंदरगाह और डिजिटल नेटवर्क
  • रक्षा, ऊर्जा और विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता
  • डिजिटल सार्वजनिक साधनों से शासन और समावेशन में क्रांति
  • दीर्घकालिक साझेदार के रूप में भारत पर बढ़ता वैश्विक विश्वास

ये उपलब्धियाँ संयोग नहीं हैं। ये नीतिगत निरंतरता, राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रहित पर केंद्रित विकासदृष्टि का परिणाम हैं।

2. “लोकतंत्र बचानेके नाम पर अलोकतांत्रिक तरीकों का विरोधाभास

राजनीतिक विमर्श में एक खतरनाक विरोधाभास उभर रहा है:

  • लोकतंत्र की बात, लेकिन संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला, लेकिन दुष्प्रचार और चयनात्मक आक्रोश
  • संघवाद का प्रचार, लेकिन विदेशी हस्तक्षेप को आमंत्रण

इस विरोधाभास के प्रमुख रूप:

  • संवैधानिक संस्थानों को निरंतर संदेह के घेरे में लाना
  • अस्थिरता के नैरेटिव से जनविश्वास कमजोर करने का प्रयास
  • नीति-बहस की जगह तमाशा और उकसावे को बढ़ावा देना

ये तरीके लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि गणराज्य को भीतर से कमजोर करते हैं।

3. नैरेटिव युद्ध और राष्ट्रविरोधी पारितंत्र

आधुनिक अस्थिरता सीधे संघर्ष से नहीं, बल्कि इन माध्यमों से आती है:

  • सूचना युद्ध और नैरेटिव में हेरफेर
  • भारत को असुरक्षित/अलोकतांत्रिक दिखाने के समन्वित अभियान
  • विदेशी विधायिकाओं, मीडिया और एनजीओ के ज़रिए दबाव
  • निवेश, व्यापार और कूटनीति को बाधित करने के प्रयास

जब घरेलू राजनीतिक शक्तियाँ अल्पकालिक लाभ के लिए इन नैरेटिव्स को वैधता देती हैं, तो वे व्यापक अस्थिरकारी पारितंत्र का हिस्सा बन जाती हैं।

4. विदेशी हस्तक्षेप: एक खतरनाक शॉर्टकट

घरेलू राजनीतिक टकरावों को सुलझाने के लिए विदेशी हस्तक्षेप बुलाना असहमति नहींरणनीतिक गैरजिम्मेदारी है।

  • संप्रभु राष्ट्र मतभेद संवैधानिक तरीकों से सुलझाते हैं
  • बाहरी दबाव लोकतांत्रिक वैधता को कमजोर करता है
  • वैश्विक शक्तियाँ परोपकार नहीं, अपने हित देखती हैं

इतिहास बताता है कि स्वायत्तता एक झटके में नहीं, बल्कि सामान्यीकृत बाहरी प्रभाव से खोती है

5. अभी भारत को निशाना क्यों बनाया जा रहा है

भारत का उभार वैश्विक शक्ति-संतुलन के बदलाव के साथ हो रहा है:

  • पारंपरिक शक्ति-केंद्रों का प्रभाव घट रहा है
  • उभरती अर्थव्यवस्थाएँ स्थापित ढाँचों को चुनौती दे रही हैं
  • रणनीतिक स्वायत्तता जमे हुए हितों को असहज करती है

इस संदर्भ में:

  • भारत की गति धीमी करना एक उद्देश्य बनता है
  • प्रतिस्पर्धा से आसान अवरोध है
  • आंतरिक विभाजनों का दोहन किया जा रहा है

6. नागरिकों की जिम्मेदारी: ध्रुवीकरण के बिना सजगता

  • इस समय जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं। लोकतंत्र की पहली रक्षापंक्ति नागरिक होते हैं

यह सजगता होनी चाहिए:

  • कानूनी — संवैधानिक प्रक्रियाओं में निहित
  • सूचित — दुष्प्रचार और भावनात्मक उकसावे से परे
  • लोकतांत्रिक — हिंसा, अराजकता और संस्थागत तोड़फोड़ का अस्वीकार

राष्ट्रवादी शासन का समर्थन अंध-समर्थन नहीं, बल्कि:

  • अस्थिरता के विरुद्ध खड़ा होना
  • संवैधानिक संस्थानों की रक्षा
  • राष्ट्रीय प्रगति की निरंतरता सुनिश्चित करना

7. वैश्विक शक्ति बनने की शर्त: स्थिरता

यदि भारत शीर्ष वैश्विक शक्तियों में स्थान पाना चाहता है, तो उसे चाहिए:

  • संघ और राज्यों में राजनीतिक स्थिरता
  • मजबूत और विश्वसनीय संस्थान
  • नीतिगत निरंतरता और रणनीतिक धैर्य
  • दुष्प्रचार के प्रति लचीला, एकजुट समाज

आर्थिक विकास, सैन्य शक्ति और कूटनीतिक प्रभाव स्थायी राजनीतिक तोड़फोड़ के माहौल में फल-फूल नहीं सकते।

8. लोकतंत्र की सही समझ

सच्चा लोकतंत्र यह नहीं है:

  • संसदीय बहस के स्थान पर सड़क जैसी अराजकता
  • घरेलू वैधता के स्थान पर विदेशी प्रमाणपत्र
  • रचनात्मक विपक्ष के स्थान पर स्थायी अवरोध

सच्चा लोकतंत्र है:

  • चुनावों के माध्यम से जवाबदेही
  • संस्थानों के माध्यम से असहमति
  • अव्यवस्था नहीं, मतदान के माध्यम से परिवर्तन

भारत के उत्थान को पटरी से उतरने न दें

पिछले ग्यारह वर्षों की भारत की प्रगति एक ऐतिहासिक अवसर है। लेकिन जब आंतरिक विभाजनों को हथियार बनाया जाता है और झूठे नैरेटिव सामान्य हो जाते हैं, तो प्रगति नाज़ुक हो जाती है।

  • लोकतंत्र अराजकता से सुरक्षित नहीं होता
  • संप्रभुता विदेशी समर्थन से संरक्षित नहीं होती
  • विकास पक्षाघात से नहीं आता

भारत के भविष्य की रक्षा के लिए नागरिकों को दुष्प्रचार उजागर करना, विदेशी हस्तक्षेप अस्वीकार करना और स्थिर, राष्ट्रवादी शासन का सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक समर्थन करना होगा।

  • सजग राष्ट्र ही सशक्त राष्ट्र होता है।
  • एकजुट समाज ही संप्रभु समाज होता है।
  • भारत का उत्थान अवश्यंभावी हैयदि उसकी रक्षा की जाए।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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