सारांश
- 2014 के बाद का कालखंड केवल राजनीतिक परिवर्तन का दौर नहीं रहा, बल्कि एक व्यापक मनोवैज्ञानिक और सभ्यतागत परिवर्तन का चरण रहा है।
- अनेक लोगों के लिए यह “पुनर्जागरण” किसी समुदाय के प्रभुत्व का प्रतीक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान, वैचारिक आत्मविश्वास और रणनीतिक जागरूकता का संकेत है।
- यह परिवर्तन विनम्रता से पलायन नहीं, बल्कि संतुलन की खोज है—राम राज्य की नैतिक मर्यादा और कृष्ण नीति की रणनीतिक सजगता का समन्वय।
- यदि यह पुनर्जागरण संवैधानिक मर्यादा, सामाजिक समरसता और नैतिक अनुशासन में स्थिर रहता है, तो यह क्षणिक राजनीतिक घटना नहीं बल्कि दीर्घकालिक सभ्यतागत जागरण सिद्ध हो सकता है।
मोदी युग में हिंदुओं का पुनर्जागरण
1) ‘पुनर्जागरण’ का अर्थ
- पुनर्जागरण आक्रामकता नहीं है। यह पुनः उद्भव है।
सनातन धर्म सहस्राब्दियों से निम्न मूल्यों पर आधारित रहा है:
- आध्यात्मिक बहुलता
- दार्शनिक गहराई
- सांस्कृतिक निरंतरता
- अनुकूलनशीलता
- सहिष्णुता
फिर भी दशकों तक समाज के एक वर्ग में यह धारणा बनी रही कि:
- सार्वजनिक विमर्श में अपनी पहचान व्यक्त करना असहज था।
- परंपराओं का समर्थन करना प्रगतिशीलता के विपरीत माना जाता था।
- ऐतिहासिक विमर्श आंशिक रूप से प्रस्तुत किए जाते थे।
- बहुसंख्यक समाज से अपेक्षा थी कि वह स्वयं को सीमित रखे।
चाहे यह धारणा पूरी तरह सत्य हो या आंशिक, इसने मनोविज्ञान को प्रभावित किया।
- पुनर्जागरण उसी मनोविज्ञान के परिवर्तन से प्रारंभ हुआ।
2) 2014: राजनीतिक उत्प्रेरक, मानसिक परिवर्तन
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह प्रतीक था:
- दशकों बाद स्पष्ट बहुमत सरकार
- सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी नेतृत्व
- वैश्विक मंच पर भारतीय पहचान की पुनर्स्थापना
- नीति और विमर्श में स्वदेशी शब्दावली का प्रवेश
इससे उत्पन्न हुआ:
- सांस्कृतिक वैधता का भाव
- सार्वजनिक आत्मविश्वास
- रक्षात्मक मनोवृत्ति में कमी
जब शीर्ष नेतृत्व अपनी सभ्यता से जुड़ा दिखाई देता है, तो समाज में आत्मविश्वास का संचार होता है।
3) राम राज्य से कृष्ण नीति तक: संतुलन की खोज
भारतीय परंपरा ने केवल एक आदर्श प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि दो आयाम दिए:
राम राज्य
- नैतिक शासन
- मर्यादा और संयम
- करुणा और सहिष्णुता
- न्यायपूर्ण संतुलन
कृष्ण नीति
- रणनीतिक बुद्धिमत्ता
- परिस्थितिजन्य निर्णय
- धर्म की रक्षा हेतु सजगता
- अन्याय के विरुद्ध दृढ़ता
>लंबे समय तक समाज में यह भावना रही कि केवल सहिष्णुता पर बल दिया गया।
अब एक समन्वय उभरता दिख रहा है:
- सहिष्णुता, परंतु आत्मविलोपन नहीं
- करुणा, परंतु असुरक्षा नहीं
- समावेश, परंतु आत्मसंकोच नहीं
आधुनिक लोकतंत्र में कृष्ण नीति का अर्थ है:
- संवैधानिक साधनों का उपयोग
- संस्थाओं को सशक्त करना
- समान कानून लागू करना
- राष्ट्रीय हितों की रणनीतिक रक्षा
यह उग्रता नहीं, बल्कि विधिसम्मत दृढ़ता है।
4) संस्थागत संतुलन की अनुभूति
समर्थकों में यह धारणा प्रबल हुई है कि:
- कानून का पालन अधिक समान रूप से हो रहा है
- अवैध गतिविधियों पर कठोर कार्रवाई हो रही है
- सांस्कृतिक स्थलों के अधिकारों पर चर्चा संभव हुई है
- राष्ट्रीय सुरक्षा पर स्पष्ट रुख अपनाया गया है
राज्य स्तर पर Yogi Adityanath जैसे नेतृत्व ने इस धारणा को और पुष्ट किया।
- धारणा ही मनोविज्ञान को आकार देती है—और मनोविज्ञान ही पुनर्जागरण की आधारशिला है।
5) आत्मविश्वास बनाम प्रभुत्व
परिपक्व पुनर्जागरण को यह समझना होगा:
आत्मविश्वास क्या है?
- अपनी पहचान का सम्मान
- लोकतांत्रिक विमर्श में सहभागिता
- बौद्धिक संस्थानों का निर्माण
- सामाजिक सुधार
प्रभुत्व क्या है?
- दूसरों को दबाना
- प्रतिक्रियात्मक आक्रामकता
- असंतुलित ध्रुवीकरण
सनातन परंपरा का इतिहास दमन नहीं, विमर्श का इतिहास है।
6) आंतरिक एकता: जाति से परे समरसता
- पुनर्जागरण केवल बाहरी विमर्श नहीं, आंतरिक सुधार भी है।
- यदि समाज जातिगत विभाजनों में बँटा रहेगा, तो सामूहिक आत्मविश्वास स्थायी नहीं होगा।
आवश्यक है:
- सामाजिक समरसता
- आर्थिक सशक्तिकरण
- समान सम्मान
- साझा राष्ट्रीय दृष्टि
सभ्यता का पुनरुत्थान तभी स्थायी होगा जब आंतरिक न्याय स्थापित होगा।
7) लोकतंत्र और विरोध की भूमिका
लोकतंत्र में आलोचना स्वाभाविक है।
- Rahul Gandhi जैसे नेता सरकार की आलोचना करते हैं—यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। यह राष्ट्र की उन्नति के लिए होना चाहिए।
किन्तु पुनर्जागरण की परिपक्वता का परीक्षण यह है कि वह आलोचना का उत्तर:
- तथ्यों से दे
- संस्थागत शक्ति से दे
- संयम से दे
- क्रोध से नहीं।
8) वैश्विक परिप्रेक्ष्य
मोदी युग में भारत ने:
- सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा दिया
- वैश्विक मंचों पर सभ्यतागत पहचान को प्रस्तुत किया
- आत्मनिर्भरता पर बल दिया
- बहुध्रुवीय विश्व में संतुलित नीति अपनाई
जब राष्ट्र वैश्विक स्तर पर सम्मान प्राप्त करता है, तो आंतरिक आत्मविश्वास बढ़ता है।
9) शक्ति की जिम्मेदारी
यदि समाज अधिक आत्मविश्वासी हुआ है, तो जिम्मेदारी भी बढ़ी है:
- कानून सर्वोपरि रहे
- बहुसंख्यक आत्मविश्वास अल्पसंख्यकों को भयभीत न करे
- रणनीति संविधान से बाहर न जाए
- सांस्कृतिक गौरव सामाजिक समरसता को क्षति न पहुँचाए
धर्म की रक्षा अधर्म से नहीं की जा सकती।
10) दीर्घकालिक परीक्षा
राजनीतिक सत्ता अस्थायी है। सभ्यता स्थायी है।
मोदी युग का पुनर्जागरण तभी स्थायी सिद्ध होगा जब:
- शिक्षा में सभ्यतागत अध्ययन सुदृढ़ हों
- अर्थव्यवस्था मजबूत हो
- सामाजिक सद्भाव बना रहे
- बौद्धिक विमर्श समृद्ध हो
यदि आत्मविश्वास आंतरिक बन गया, तो यह किसी एक चुनाव पर निर्भर नहीं रहेगा।
परिपक्व सभ्यतागत जागरण
मोदी युग में हिंदुओं का पुनर्जागरण मूलतः:
- मानसिक मुक्ति
- सांस्कृतिक स्वाभिमान
- रणनीतिक सजगता
- सभ्यतागत पुनर्स्थापन
यह सहिष्णुता से शत्रुता की ओर संक्रमण नहीं है, बल्कि सहिष्णुता और सजगता के संतुलन की ओर है।
- यदि यह अनुशासित, संवैधानिक और विवेकपूर्ण बना रहता है, तो यह दीर्घकालिक सभ्यतागत शक्ति का आधार बनेगा।
सनातन की वास्तविक शक्ति उसकी गहराई में है—शोर में नहीं।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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