🔎 सारांश
- डिजिटल युग में पत्रकारिता का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब पारंपरिक टीवी स्टूडियो के साथ-साथ यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारिता बड़े प्रभाव का माध्यम बन चुके हैं।
- कुछ चर्चित पत्रकारों ने पिछले कुछ वर्षों में हजारों वीडियो प्रकाशित किए हैं, जिनमें से अधिकांश केंद्र सरकार, विशेषकर नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों की आलोचना पर केंद्रित रहे हैं।
- समर्थकों का प्रश्न है: क्या यह सत्ता से सवाल है — या चयनात्मक राजनीतिक रुख?
- क्या पत्रकारिता का अर्थ केवल केंद्र सरकार की आलोचना है — या सभी स्तरों की सत्ता से जवाबदेही मांगना?
- यह विमर्श किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि पत्रकारिता के संतुलन, विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक भूमिका पर है।
डिजिटल मीडिया के दौर में विश्वसनीयता, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर विस्तृत विमर्श
📺 1️⃣ डिजिटल पत्रकारिता का नया दौर
पिछले 5–6 वर्षों में कई वरिष्ठ पत्रकार यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हुए।
उनके चैनलों पर:
- सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों वीडियो अपलोड हुए
- अधिकांश वीडियो केंद्र सरकार की आलोचना पर आधारित रहे
डिजिटल प्लेटफॉर्म की खासियत है:
- कोई संपादकीय बाध्यता नहीं
- कोई संस्थागत संतुलन-नियंत्रण नहीं
- दर्शकों की पसंद के अनुसार सामग्री
इससे एक “नैरेटिव इकोसिस्टम” बनता है, जहाँ दर्शक वही सुनते हैं जो उनके विचारों से मेल खाता है।
❓ 2️⃣ पत्रकारिता का मूल सिद्धांत क्या है?
अक्सर कहा जाता है:
- “पत्रकारिता का काम है सत्ता से सवाल करना।”
यह पूरी तरह सही है। लेकिन सवाल यह है:
- सत्ता केवल केंद्र में है?
- क्या राज्य सरकारें सत्ता नहीं हैं?
- क्या क्षेत्रीय दलों से समान तीव्रता से प्रश्न पूछे जाते हैं?
यदि किसी पत्रकार का लगभग पूरा कंटेंट केवल एक ही राजनीतिक दिशा में केंद्रित हो, तो निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
🏛️ 3️⃣ केंद्र बनाम राज्य — संतुलन कहाँ है?
भारत में अनेक राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें हैं:
- पश्चिम बंगाल
- दिल्ली
- केरल
- तमिलनाडु
- कर्नाटक
- तेलंगाना
- झारखंड
- हिमाचल प्रदेश
यदि पत्रकारिता का उद्देश्य जवाबदेही है, तो
- राज्य सरकारों की नीतियाँ
- कानून-व्यवस्था
- आर्थिक प्रबंधन
- प्रशासनिक विफलताएँ
- इन सभी पर भी समान तीव्रता से प्रश्न उठने चाहिए।
एकतरफा आलोचना से यह धारणा बन सकती है कि
पत्रकारिता नीति-विश्लेषण से अधिक राजनीतिक एजेंडा बन गई है।
📊 4️⃣ उपलब्धियों और आलोचनाओं का संतुलन
पिछले दशक में केंद्र सरकार ने कई योजनाएँ लागू कीं, जिनमें समर्थकों द्वारा अक्सर उल्लेखित बिंदु शामिल हैं:
- करोड़ों घरों का निर्माण
- उज्ज्वला योजना के अंतर्गत गैस कनेक्शन
- शौचालय निर्माण
- जनधन खाते
- हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार
- DBT के माध्यम से सीधे लाभ हस्तांतरण
- डिजिटल भुगतान प्रणाली
समर्थकों का तर्क है कि: इन उपलब्धियों को आलोचनात्मक वीडियो में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।
- हालाँकि, पत्रकारों का तर्क हो सकता है कि उनका दायित्व कमियों को उजागर करना है, उपलब्धियों का प्रचार नहीं।
यही वह बिंदु है जहाँ संतुलन और विश्वसनीयता का प्रश्न उठता है।
⚖️ 5️⃣ आलोचना बनाम सक्रिय पक्षधरता
लोकतंत्र में तीखी आलोचना अनिवार्य है। लेकिन यदि:
- हर वीडियो एक ही दिशा में जाए
- सकारात्मक पक्ष लगभग अनुपस्थित रहे
- अन्य दलों की सरकारें चर्चा से बाहर रहें
तो दर्शक यह प्रश्न उठा सकते हैं कि क्या यह विश्लेषण है या वैचारिक पक्षधरता?
📱 6️⃣ एल्गोरिथ्म और दर्शकों की भूमिका
डिजिटल प्लेटफॉर्म का एल्गोरिथ्म:
- उसी प्रकार की सामग्री आगे बढ़ाता है
- जो अधिक भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करे
- जो ध्रुवीकरण बढ़ाए
इसका परिणाम:
- समर्थक केवल समर्थन देखते हैं
- विरोधी केवल विरोध देखते हैं
इसलिए जिम्मेदारी केवल पत्रकारों की नहीं, दर्शकों की भी है।
🧠 7️⃣ संवाद की मर्यादा
विचारों से असहमति लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन व्यक्तिगत अपमान, गाली-गलौज या “दलाल” जैसे शब्द:
- विमर्श को कमजोर करते हैं
- बहस को भावनात्मक बनाते हैं
- तर्क की जगह उत्तेजना को बढ़ाते हैं
यदि उद्देश्य पत्रकारिता की गुणवत्ता सुधारना है, तो आलोचना तथ्य और तर्क पर आधारित होनी चाहिए।
🇮🇳 8️⃣ लोकतंत्र की असली ताकत
भारत का लोकतंत्र इसलिए मजबूत है क्योंकि:
- यहाँ सरकार की खुलकर आलोचना हो सकती है
- मीडिया स्वतंत्र है
- नागरिक बहस कर सकते हैं
लेकिन लोकतंत्र की गुणवत्ता इस पर निर्भर करती है कि:
- क्या पत्रकारिता संतुलित है?
- क्या सत्ता के हर स्तर से प्रश्न पूछे जाते हैं?
- क्या उपलब्धियों और कमियों दोनों पर चर्चा होती है?
- यह बहस किसी एक पत्रकार या समूह तक सीमित नहीं है।
- यह बहस पत्रकारिता की विश्वसनीयता, संतुलन और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी की है।
- यदि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल विरोध बन जाए, तो विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
- यदि पत्रकारिता सत्ता के साथ खड़ी हो जाए, तो स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
सही रास्ता है:
- संतुलन
- तथ्य आधारित विश्लेषण
- सभी स्तरों की सत्ता से समान प्रश्न
🇮🇳 मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत और संतुलित पत्रकारिता आवश्यक है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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