सुरक्षा, कूटनीति और आत्मनिर्भरता का उदय
सारांश
- यह लेख 2014 के बाद भारत के सुरक्षा परिदृश्य, विदेशी नीति और आर्थिक संप्रभुता में आए क्रांतिकारी बदलावों का विश्लेषण करता है।
- इसमें बताया गया है कि कैसे प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने ‘रक्षात्मक’ मुद्रा त्यागकर ‘आक्रामक रक्षा’ (Pro-active Defense) की नीति अपनाई, जिससे आंतरिक आतंकवाद पर लगाम लगी।
- लेख इस बात को रेखांकित करता है कि जिन विदेशी दौरों की आलोचना “भारत-विरोधी ईकोसिस्टम” द्वारा की जाती थी, उन्होंने आज वैश्विक अस्थिरता और युद्ध के समय भारत के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ (Strategic Shield) का काम किया है।
- वैकल्पिक बाजारों की खोज और वैश्विक ब्लैकमेलिंग के विरुद्ध भारत की कठोर स्थिति ने देश को एक ‘स्थिरता के टापू’ के रूप में स्थापित किया है।
1. जन-संकल्प: विश्वास का नया पैमाना
- एक आवाज़, एक राष्ट्र: कोरोना काल के दौरान जब प्रधानमंत्री ने ताली-थाली बजाने और दीये जलाने का आह्वान किया, तो वह केवल एक अनुष्ठान नहीं था। विज्ञान अपनी जगह था, लेकिन वह दृश्य उस ‘सामूहिक चेतना’ का प्रतीक था जो भारत ने दशकों बाद महसूस की।
- राजनीतिक सीमाओं से परे: गौर करने वाली बात यह है कि यह एकजुटता उन राज्यों में भी देखी गई जहाँ भाजपा की कभी सरकार नहीं रही। यह नेतृत्व के प्रति उस अटूट भरोसे का प्रमाण था जो वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठ चुका था।
- अप्रूवल रेटिंग का संदेश: जब यह सब हुआ, तब मोदी जी की रेटिंग 67% थी, जो आज 75% के पार है। यह वृद्धि दर्शाती है कि जनता अब नारों पर नहीं, बल्कि ‘डिलीवरी’ और ‘नीयत’ पर विश्वास करती है।
2. सुरक्षा परिदृश्य: आतंक का भूगोल और मनोविज्ञान बदला
- 2014 से पहले का भयावह दौर: याद कीजिए वही पाकिस्तान था, वही सेना थी और वही आतंकी कमांडर। दिल्ली की दिवाली हो, मुंबई की ट्रेनें, वाराणसी के घाट या संसद की गरिमा—आतंकियों ने हर जगह लहू बहाया था। हजारों निर्दोष भारतीयों ने अपनी जान गंवाई और तत्कालीन सरकारें केवल ‘कड़ी निंदा’ और कागजी डॉजियर भेजने तक सीमित थीं।
- रणनीतिक बदलाव (Shift in Strategy): 2014 के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि “हम छेड़ेंगे नहीं, लेकिन छेड़ा तो छोड़ेंगे नहीं।” सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक ने आतंकियों के मन में वह खौफ पैदा किया जो पिछले 70 सालों में गायब था।
- आतंक का नया ‘कार्यक्षेत्र’: आज भारत के महानगर सुरक्षित हैं क्योंकि आतंक की लड़ाई अब सीमा के उस पार लड़ी जा रही है। ‘अज्ञात’ लोगों द्वारा आतंकी सरगनाओं का उनके घर में सफाया होना इस नए भारत की अदृश्य शक्ति का परिचय है।
- पड़ोस का आंतरिक संकट: जो तालिबान कभी भारत के लिए खतरा था, आज वह खुद पाकिस्तानी सेना के लिए काल बना हुआ है। बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना की जो दुर्गति हो रही है, वह उनके अपने कर्मों का फल है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि पाकिस्तानी जनरल अब बुलेटप्रूफ सुरक्षा के बिना कहीं जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं।
3. कूटनीति और विदेशी दौरों का ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’
- आलोचना बनाम उपलब्धि: भारत-विरोधी तंत्र ने हमेशा प्रधानमंत्री के विदेशी दौरों का उपहास उड़ाया। लेकिन आज जब मध्य-पूर्व (Middle East) और यूरोप युद्ध की आग में झुलस रहे हैं, तब उन्हीं दौरों के दौरान बनाए गए संबंध काम आ रहे हैं।
- वैश्विक युद्ध और भारत की स्थिरता: आज दुनिया भर में सप्लाई चेन ध्वस्त हो गई है, लेकिन भारत सबसे कम प्रभावित (Least Affected) देशों में से एक है। यह उन व्यक्तिगत संबंधों का परिणाम है कि युद्धरत देश भी भारत की ऊर्जा और खाद्य आवश्यकताओं का सम्मान कर रहे हैं।
- वैकल्पिक बाजार और स्रोत: सरकार ने पिछले 10 वर्षों में अत्यंत बुद्धिमानी से अपने निर्यात के लिए नए बाजार तलाशे और अपनी महत्वपूर्ण जरूरतों (जैसे कच्चा तेल और रक्षा उपकरण) के लिए वैकल्पिक स्रोत विकसित किए। इससे हमें किसी एक देश की ‘जी-हुज़ूरी’ करने की आवश्यकता नहीं रही।
4. वैश्विक ‘ब्लैकमेलिंग’ के विरुद्ध अभेद्य दीवार
- विकसित राष्ट्रों का दबाव: दशकों तक अमेरिका और अन्य विकसित राष्ट्रों ने तकनीक, रक्षा सौदों और कच्चे तेल के नाम पर भारत को ‘ब्लैकमेल’ किया है। प्रतिबंधों की धमकियां देना उनकी पुरानी आदत थी।
- रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): आज का भारत किसी के दबाव में नहीं आता। चाहे रूस से तेल खरीदना हो या ईरान के साथ चाबहार पोर्ट का समझौता करना, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि “इंडिया फर्स्ट” ही हमारी नीति है।
- ब्लैकमेलिंग का अंत: हमारी इस विविधता (Diversification) ने पश्चिमी देशों के ब्लैकमेलिंग प्रयासों को विफल कर दिया है। अब वे जानते हैं कि भारत के पास विकल्प मौजूद हैं, इसलिए वे अब हमें डराने के बजाय हमारे साथ समान स्तर पर जुड़ने को मजबूर हैं।
5. LPG संकट और आर्थिक प्रबंधन की वास्तविकता
- विपक्ष का खोखला विमर्श: विपक्ष एलपीजी संकट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि यह एक वैश्विक संकट है। खाड़ी देशों में युद्ध के बावजूद भारत में सिलेंडर की उपलब्धता बनी हुई है—यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
- अतीत का आईना: मनमोहन सिंह के दौर में सिर्फ ओबामा की एक घोषणा से देश में राशन और तेल की कालाबाजारी शुरू हो जाती थी। आज कांग्रेस उन्हीं पुराने दिनों की तस्वीरें दिखाकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रही है, जबकि आज की स्थिति कहीं अधिक नियंत्रण में है।
- जनमानस की परिपक्वता: 2026 की जनता 2004 वाली नहीं है। आज का युवा जानता है कि महंगाई वैश्विक कारणों से है, न कि प्रशासनिक विफलता से। जनता संकट सहने को तैयार है, बशर्ते नेतृत्व ईमानदार हो।
6. सूचना युद्ध (Information Warfare) और पारदर्शिता
- कांग्रेस और पाकिस्तान का ‘गठबंधन’: पाकिस्तान का मुख्य हथियार अब बम नहीं, बल्कि ‘सूचना’ है। वह भारत के भीतर अविश्वास फैलाना चाहता है और दुर्भाग्यवश कांग्रेस जैसे तत्व उसी विमर्श को आगे बढ़ाते हैं। राहुल गांधी के बयान अक्सर आसिम मुनीर के एजेंडे को हवा देते प्रतीत होते हैं।
- ऑपरेशन सिंदूर और राफेल: ऑपरेशन सिंदूर की सफलता हमारी वायुसेना के शौर्य का प्रतीक थी। राफेल जैसे विमान ‘शो-पीस’ के लिए नहीं, बल्कि शत्रु के विनाश के लिए खरीदे गए हैं। युद्ध में विमानों का गिरना या हताहत होना सामरिक हिस्सा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम कमजोर हो गए।
- पारदर्शिता की आवश्यकता: सरकार को अविश्वास फैलाने वाले ‘ईकोसिस्टम’ को कुचलने के लिए और अधिक पारदर्शिता अपनानी चाहिए। सच को समय पर साझा करना अफवाहों के बाजार को ठंडा करने का सबसे बड़ा हथियार है।
7. 2004 की गलती अब नहीं होगी
बदला हुआ भारत: भाजपा और देश के नागरिकों को यह समझना होगा कि यह 2003-04 का समय नहीं है। आज की भाजपा अधिक संगठित है और आज का नागरिक अधिक जागरूक।
- 2004 में जो भूल हुई थी, वह अब दोहराई नहीं जाएगी क्योंकि जनता को पता है कि यदि आज कांग्रेस होती, तो आतंकी और कट्टरपंथी तत्व हमारे सिर पर चढ़कर नाच रहे होते।
अंतिम संदेश: भारत की सुरक्षा और समृद्धि का मार्ग ‘पारदर्शिता’ और ‘दृढ़ इच्छाशक्ति’ से होकर गुजरता है। हम सुरक्षित हैं क्योंकि हमारे पास एक ऐसा नेतृत्व है जो वैश्विक शक्तियों की आंखों में आंखें डालकर बात कर सकता है।
🇮🇳 जयभारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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