राष्ट्रबोध से वंचित नई पीढ़ी
भारत कोई साधारण राष्ट्र नहीं है। यह एक सनातन सभ्यता है, जिसकी आत्मा विविधता में एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और समरसता में निहित है। यही सनातन धर्म का मूल भाव रहा है, जिसने सहस्राब्दियों तक अनेक मतों, पंथों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक साझा जीवन-दृष्टि में पिरोए रखा और भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यतागत चेतना के रूप में स्थापित किया।
1. सनातन धर्म की आत्मा: विविधता में एकता
- सनातन धर्म किसी एक पूजा-पद्धति, आहार या वेशभूषा से परिभाषित नहीं होता।
- यह देश–काल–परिस्थिति के अनुसार अपने रूप बदलता है, पर मूल भाव नहीं बदलता।
- मतभेद को संघर्ष नहीं, संवाद बनाता है।
- सह-अस्तित्व को कमजोरी नहीं, शक्ति मानता है।
यही कारण है कि भारत:
- कश्मीर से कन्याकुमारी तक
- कामरूप से कच्छ तक
- एक सभ्यतागत राष्ट्र बना रहा।
2. पिछले 800 वर्षों का सभ्यतागत आघात: ऐतिहासिक संदर्भ
(क) मध्यकालीन दौर
- सत्ता को स्थायी बनाने के लिए भारत की शिक्षा, संस्कृति और आत्मविश्वास को लक्ष्य बनाया गया।
मंदिर और गुरुकुल इसलिए प्रभावित हुए क्योंकि वे:
- ज्ञान और शिक्षा के केंद्र थे
- सामाजिक संगठन और नैतिक चेतना के आधार थे
- परिणामस्वरूप, सभ्यतागत निरंतरता को गंभीर क्षति पहुँची।
(ख) औपनिवेशिक काल
- पारंपरिक शिक्षा प्रणाली को हटाकर पाश्चात्य शिक्षा मॉडल थोपा गया।
- भारतीय भाषाओं, परंपराओं और दर्शन को पिछड़ा बताया गया।
- यह केवल राजनीतिक शासन नहीं था, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक उपनिवेशवाद था।
- पीढ़ियों में आत्महीनता और हीनभावना का संचार हुआ।
(ग) स्वतंत्रता के बाद के दशकों में नीतिगत भ्रम
- औपनिवेशिक मानसिकता और तुष्टिकरण की राजनीति साथ-साथ चली।
- शिक्षा से सनातन दर्शन, संतुलित इतिहास और सांस्कृतिक बोध धीरे-धीरे हटता गया।
- समाज को जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर बांटने वाली प्रवृत्तियाँ मजबूत हुईं।
3. परिणाम: राष्ट्रबोध का क्षरण
- नई पीढ़ी अपने ही देशवासियों को “पराया” समझने लगी।
- सीमांत क्षेत्रों, विशेषकर उत्तर–पूर्व, के योगदान के प्रति अज्ञान बढ़ा।
- सोशल मीडिया पर बिना ज्ञान के आक्रामकता को राष्ट्रवाद समझ लिया गया।
यह स्थिति केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता के लिए चेतावनी है।
4. शिक्षा व्यवस्था की विफलता: असली जड़
आज की शिक्षा:
- नौकरी के लिए तैयार करती है, नागरिकता के लिए नहीं।
- जानकारी देती है, पहचान और बोध नहीं।
कई शिक्षक:
- “विवाद” के डर से संस्कृति और राष्ट्र पर मौन रहते हैं।
- सिलेबस, परीक्षा और फीडबैक तक सीमित हो जाते हैं।
जब कक्षाओं में भारत की समग्र कहानी नहीं बताई जाती, तो बच्चे पहचान सोशल मीडिया से लेते हैं—जो अक्सर अधूरी और विकृत होती है।
5. उत्तर–पूर्व: भारत की परिधि नहीं, रीढ़
उत्तर–पूर्व भारत की:
- रणनीतिक सुरक्षा
- सांस्कृतिक समृद्धि
- और ऐतिहासिक शौर्य का प्रतीक है।
- लाचित बोरफुकन, शंकरदेव और असंख्य जनजातीय परंपराएँ भारत की सभ्यता को और सशक्त बनाती हैं।
इस इतिहास को शिक्षा की मुख्यधारा में स्थान मिलना अनिवार्य है।
6. पिछले 11 वर्षों का सुधारात्मक दौर: आत्मविश्वास की वापसी
आर्थिक क्षेत्र में:
- स्थिरता, तेज़ विकास और वैश्विक भरोसा।
- तकनीक और नवाचार:
- डिजिटल अवसंरचना, स्टार्टअप, विज्ञान और अंतरिक्ष में प्रगति।
- सांस्कृतिक आत्मविश्वास:
- योग, आयुर्वेद, भारतीय भाषाओं और परंपराओं का वैश्विक सम्मान।
शिक्षा और इतिहास:
- संतुलन, तथ्य और आत्मबोध की दिशा में सुधार की शुरुआत।
यह दौर सभ्यतागत पुनर्जागरण की नींव रखता है।
7. आगे की राह: समाज की निर्णायक भूमिका
- सरकार नीतियाँ बना सकती है, लेकिन सभ्यता को जीवित रखने की जिम्मेदारी समाज की होती है।
हमें:
- जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर एकजुट होना होगा।
- शिक्षा में राष्ट्रबोध और सांस्कृतिक साक्षरता को अनिवार्य बनाना होगा।
- शिक्षकों को केवल ज्ञान नहीं, साहस और समर्थन भी देना होगा।
- विविधता को खतरा नहीं, भारत की पहचान के रूप में सिखाना होगा।
8. राजनीतिक और सामाजिक समर्थन क्यों आवश्यक है
सुधारों की निरंतरता के लिए:
- स्थिर नीतियाँ
- दीर्घकालिक दृष्टि
- और जनसमर्थन आवश्यक है।
आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक लक्ष्यों को पाने के लिए समाज को सक्रिय भागीदार बनना होगा।
9. इतिहास से सीख, भविष्य का संकल्प
- सनातन धर्म ने सदियों तक दुनिया को सह–अस्तित्व और संतुलन का मार्ग दिखाया।
आज भारत के पास अवसर है कि वह:
- आर्थिक रूप से सशक्त
- तकनीकी रूप से अग्रणी
- और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी बने।
इसके लिए आवश्यक है:
- शिक्षा में राष्ट्रबोध
- समाज में समरसता
- और राष्टवादी शासन को निरंतर सामाजिक–राजनीतिक समर्थन
यदि हम यह सामूहिक उत्तरदायित्व निभाते हैं, तो भारत केवल एक वैश्विक शक्ति ही नहीं बल्कि शांति, संतुलन और सह–अस्तित्व का मार्गदर्शक भी बनेगा।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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