दशकों से चला आ रहा चयनात्मक प्रवर्तन, वोट-बैंक राजनीति और लोकतांत्रिक अनिवार्यता
सारांश
- भारत में भाषण, आस्था और जवाबदेही के मामले में असमान व्यवहार की धारणा कोई नई नहीं है। यह समस्या स्वतंत्रता के बाद से चली आ रही है, जिसका प्रमुख कारण वोट–बैंक राजनीति और नीति–प्रवर्तन में भेदभाव, विशेष रूप से मुस्लिम वोट-बैंक को साधने की प्रवृत्ति रही है।
- दशकों तक हिंदू आस्थाओं, सनातन धर्म और बहुसंख्यक सभ्यतागत पहचान को निशाना बनाने वाले वक्तव्यों को “प्रगतिशील आलोचना” कहकर सामान्य बनाया गया, जबकि हिंदुओं की प्रतिक्रियाओं—अक्सर आत्मरक्षात्मक—को अपराध की तरह देखा गया।
- 2014 के बाद स्थिति में कुछ हद तक सुधार अवश्य हुआ है। वर्तमान सरकार ने इन विकृतियों को स्वीकार किया और सुधार की दिशा में कार्य शुरू किया।
- लेकिन यह प्रगति असमान और धीमी रही है, क्योंकि रास्ते में विपक्षी दलों (तथाकथित ठगबंधन), पूर्व-2014 काल की वैचारिक सोच से प्रभावित न्यायपालिका के कुछ हिस्से, जड़ जमाई नौकरशाही और पक्षपाती मीडिया तंत्र लगातार अवरोध पैदा करते रहे हैं।
- परिणामस्वरूप, विपक्ष से जुड़े कुछ राजनीतिक और धार्मिक नेताओं द्वारा दिए गए घृणास्पद या धमकीपूर्ण वक्तव्य आज भी प्रायः बिना दंड के रह जाते हैं, जबकि हिंदुओं की ओर से की गई समान या उससे कहीं हल्की टिप्पणियों पर तुरंत कार्रवाई हो जाती है।
- अब समय आ गया है कि लोकतांत्रिक स्थिरता और सामाजिक सौहार्द के लिए इन मुद्दों को संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप, बिना डर और तुष्टिकरण के, तत्काल और जिम्मेदारी से सुलझाया जाए।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह समस्या नई नहीं है
- 1947 के बाद से भारतीय राजनीति में सभ्यतागत संतुलन की बजाय चुनावी गणित को प्राथमिकता दी जाती रही।
दशकों तक:
- नीतियाँ समान नागरिकता के बजाय समुदाय–विशेष की संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर बनीं
- कानून का प्रवर्तन अक्सर चयनात्मक रहा, “अल्पसंख्यक असंतोष” के भय से
- राजनीतिक अभिजात वर्ग ने यह धारणा संस्थागत कर दी कि कुछ भावनाएँ संरक्षित हैं और कुछ उपेक्षित
परिणाम: एक ऐसी संस्कृति बनी जहाँ—
- हिंदू आस्थाओं की आलोचना “सुधार” कहा गया
- हिंदू प्रतिवाद को “बहुसंख्यकवाद” और गैरजिम्मेददार करार दिया गया
यह असमानता धीरे-धीरे संस्थागत आदत बन गई।
2. वोट–बैंक तुष्टिकरण और भेदभावपूर्ण प्रवर्तन
- मुस्लिम वोट-बैंक राजनीति कांग्रेस और बाद में उसके सहयोगियों की मुख्य रणनीति बन गई।
इस एकीकरण को बनाए रखने के लिए:
- मुस्लिम नेताओं या सहयोगी दलों के भड़काऊ बयानों को नज़रअंदाज़ किया गया
- प्रशासनिक और पुलिस कार्रवाई टाल दी गई या कमजोर कर दी गई
- मीडिया ने इसे “पहचान की अभिव्यक्ति” बताकर जायज़ ठहराया
इसके विपरीत:
हिंदू संतों, विद्वानों, कार्यकर्ताओं या आम नागरिकों को:
- तुरंत अपराधी बना दिया गया
- सार्वजनिक रूप से बदनाम किया गया
- “सेक्युलरिज़्म के लिए खतरा” बताया गया
यह धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि चयनात्मक सेक्युलरिज़्म था।
3. 2014 के बाद: समस्या की पहचान और आंशिक सुधार
2014 के बाद एक बड़ा बदलाव आया:
- वर्षों से अनदेखी समस्याओं को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया
- शासन का फोकस तुष्टिकरण से हटकर बिना धार्मिक भेदभाव के कल्याण पर गया
- राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्थागत दक्षता और सभ्यतागत आत्मविश्वास फिर से एजेंडा बने
लेकिन, प्रगति इसलिए सीमित रही क्योंकि:
- विपक्षी दल हर सुधार को राजनीतिक हथियार बनाते हैं
- न्यायिक प्रक्रियाएँ, जो दशकों की वैचारिक व्याख्याओं से प्रभावित हैं, क्रियान्वयन को धीमा करती हैं
- नौकरशाही की जड़ता बदलाव का विरोध करती है
- मीडिया तथ्यों से पहले नैरेटिव बनाकर असमान दबाव पैदा करता है
इसलिए दिशा बदली है, लेकिन ज़मीनी असंतुलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
4. अभिव्यक्ति और जवाबदेही में जारी दोहरा मापदंड
- नागरिक स्पष्ट रूप से देखते हैं
सनातन धर्म, हिंदू प्रतीकों या हिंदू समाज पर हमले:
- “राजनीतिक बयानबाज़ी” कहकर टाल दिए जाते हैं
- कानूनी परिणाम लगभग नहीं होते
वहीं हिंदुओं की ओर से की गई प्रतिक्रियात्मक या आत्मरक्षात्मक बातें:
- तुरंत FIR
- गिरफ्तारी
- मीडिया ट्रायल
यह प्रवृत्ति 2014 से पहले भी थी और आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।
5. न्यायपालिका और मीडिया: वैचारिक जड़ता
कई न्यायिक दृष्टिकोण अब भी:
- औपनिवेशिक काल की बहुसंख्यक–शंका से ग्रस्त हैं
- “बहुसंख्यक की बात = खतरा” मान लेते हैं
मीडिया संस्थान:
- आज भी बड़े पैमाने पर पूर्व-2014 वैचारिक ढांचे से संचालित हैं
- प्रक्रिया से पहले फैसला सुना देते हैं
परिणाम: सुधारों को संवैधानिक समता तक पहुँचने में भारी कठिनाई।
6. अब और अनदेखी क्यों खतरनाक है
यदि यह असंतुलन जारी रहा तो:
- संस्थानों पर भरोसा टूटेगा
- समुदायों में असुरक्षा और प्रतिक्रिया बढ़ेगी
- हर मुद्दा वैचारिक युद्ध बन जाएगा
- शासन निरंतर मुक़दमों और नैरेटिव संघर्ष में उलझा रहेगा
लोकतंत्र अनंत काल तक अन्याय की धारणा पर नहीं चल सकता।
7. संवैधानिक निष्पक्षता की तत्काल आवश्यकता
अब आवश्यकता है:
- सभी समुदायों के लिए हेट स्पीच की समान परिभाषा
- शिकायतों पर समयबद्ध और समान कार्रवाई
- केस बंद करने पर पारदर्शी कारण
- वैचारिक न्यायिक सक्रियता पर संयम
- मीडिया की जवाबदेही
यह दमन नहीं, कानून के समक्ष समान सुरक्षा है।
निष्कर्ष: तुष्टिकरण से संवैधानिक साहस तक
- दशकों तक भारत ने तुष्टिकरण आधारित शासन की कीमत चुकाई।
- 2014 के बाद सुधार की शुरुआत हुई—लेकिन विरासत में मिली व्यवस्थाएँ अब भी बाधा हैं।
अब विकल्प स्पष्ट है:
- या तो असमान न्याय सहते रहें
- या संविधान को जैसा लिखा है वैसा लागू करें, राजनीतिक व्याख्या के अनुसार नहीं
कानून के समक्ष समानता—गणराज्य की बुनियाद है।
अंतिम विचार
- तुष्टिकरण ने चुप्पी पैदा की।
- चुप्पी ने आक्रोश को जन्म दिया।
- आक्रोश एकता को तोड़ता है।
केवल निष्पक्ष और निर्भीक कानून–प्रवर्तन ही विश्वास और सौहार्द लौटा सकता है।
जय भारत, वन्देमातरम
Read our previous blogs 👉 Click here
Join us on Arattai 👉 Click here
👉Join Our Channels 👈
