समृद्ध भारत की कल्पना केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है। सनातन चेतना के पुनर्जागरण, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आधुनिक विकास के संतुलन से भारत अपनी सभ्यतागत जड़ों से जुड़ते हुए फिर से विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर है।
समृद्ध भारत से विश्वगुरु तक
- भारत कभी ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और संस्कृति का वैश्विक मार्गदर्शक था। लगभग एक हज़ार वर्ष पहले उसकी सभ्यतागत शक्ति आक्रांताओं की आँखों में खटकने लगी, जिससे उसकी सांस्कृतिक जड़ों को नुकसान पहुँचा।
- औपनिवेशिक शासन ने इस क्षति को और गहरा किया और स्वतंत्रता के बाद दशकों तक चली नीतियों ने आत्मगौरव की जगह अपराध-बोध को बढ़ावा दिया।
- 2014 के बाद एक वैचारिक बदलाव दिखा—जहाँ राष्ट्रवाद, सनातन मूल्यों, शिक्षा-सुधार और विकास के साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर बल दिया गया।
- आज आवश्यकता है सतर्कता, एकता और राष्ट्रीय हित में राजनीतिक–सामाजिक समर्थन की, ताकि भारत फिर से विश्वगुरु और वैश्विक शक्ति बन सके।
1. भारत क्यों था ‘विश्वगुरु’: सभ्यता की आधारभूमि
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं रहा— यह सभ्यता की नर्सरी रहा है।
- गणित, खगोल, चिकित्सा, दर्शन और शासन-विज्ञान में अग्रणी परंपरा
- तक्षशिला, नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय
- वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, योग और व्याकरण की समृद्ध विरासत
- सह-अस्तित्व, संतुलन और करुणा पर आधारित सनातन दृष्टि
इसी समग्र बौद्धिक–सांस्कृतिक शक्ति के कारण भारत विश्वगुरु कहलाया।
2. आक्रमणों का दौर: लक्ष्य भूमि नहीं, सभ्यता
लगभग एक सहस्राब्दी पहले हुए आक्रमण केवल सत्ता के लिए नहीं थे।
- शिक्षा केंद्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों को नुकसान
- सामाजिक आत्मविश्वास को तोड़ने का प्रयास
- परंपराओं को कमजोर करने की कोशिश
यह सभ्यतागत क्षरण था, जिसने भारत की निरंतरता को आहत किया।
3. औपनिवेशिक शासन: आत्मगौरव पर गहरी चोट
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में:
- भारतीय इतिहास का विकृतिकरण
- ज्ञान-परंपरा को “अवैज्ञानिक” बताने की प्रवृत्ति
- शिक्षा से संस्कृति और दर्शन का हाशियाकरण
- हीन भावना का संस्थानीकरण
परिणामस्वरूप पीढ़ियों में आत्म-संदेह पनपा।
4. स्वतंत्रता के बाद की विडंबना: आत्मविस्मृति का विस्तार
स्वतंत्रता के बाद भी:
- औपनिवेशिक ढांचे का पूर्ण सुधार नहीं हुआ
- शिक्षा और इतिहास में भारतीय दृष्टिकोण सीमित रहा
- धर्मनिरपेक्षता की गलत व्याख्या से सनातन संस्कृति को अपराध-बोध के रूप में देखा गया
- वोट-बैंक राजनीति ने सांस्कृतिक आत्मसम्मान को संदेह के घेरे में रखा।
5. 2014 के बाद का परिवर्तन: आत्मगौरव की वापसी
2014 के बाद एक स्पष्ट वैचारिक बदलाव दिखा:
- राष्ट्रहित और सांस्कृतिक संतुलन पर बल
- सनातन मूल्यों को सम्मान
- इतिहास के तथ्यों पर पुनर्विचार
- शिक्षा में भारतीय ज्ञान-परंपरा की वापसी
- विकास, अवसंरचना और वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि
यह किसी के विरुद्ध नहीं, सत्य और संतुलन के पक्ष में प्रयास रहा।
6. शिक्षा और इतिहास: निर्णायक मोर्चा
- सभ्यताएँ पाठ्यक्रम से बनती-बिगड़ती हैं
- गलत इतिहास आत्मविश्वास तोड़ता है
- सही इतिहास जिम्मेदार नागरिक गढ़ता ह
भारतीय दृष्टि से शिक्षा और इतिहास का समावेश सत्य, संतुलन और आत्मसम्मान को मजबूत करता है।
7. आगे की राह: सतर्कता, एकता और जिम्मेदारी
भारत को विश्वगुरु और वैश्विक शक्ति बनाने के लिए:
- जाति, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय से ऊपर उठकर एकता
- संवैधानिक व्यवस्था के भीतर राष्ट्रहित का समर्थन
- संस्कृति और आधुनिकता का संतुलन
- शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा—तीनों पर समान ध्यान
इतिहास चेतावनी देता है कि आत्मविस्मृति और विभाजन आर्थिक संघर्ष और असुरक्षा को जन्म देते हैं।
चेतना ही सुरक्षा है
यह घृणा या हिंसा का आह्वान नहीं। यह सभ्यतागत जागरण का संदेश है—
- जो समाज अपनी जड़ों को पहचानता है, वही भविष्य को दिशा देता है।
आज आवश्यकता है राजनीतिक और सामाजिक रूप से जिम्मेदार समर्थन की ,
ताकि भारत न केवल आर्थिक शक्ति बने, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विश्वगुरु के रूप में उभरे।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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