सारांश
- भारत की संसद की कल्पना संविधान के मंदिर के रूप में की गई थी—एक अनुशासित, नियमबद्ध मंच जहाँ बहस कानून द्वारा संचालित हो, शोर द्वारा नहीं। लेकिन बार-बार होने वाली नारेबाज़ी, प्रक्रिया की अवहेलना और जबरन स्थगन ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है
- क्या संसद को अव्यवस्था और भीड़तंत्र की ओर धकेला जा रहा है?
यह लेख दो मूल तर्कों को जोड़ता है:
- संसद की संवैधानिक पवित्रता को सामान्यीकृत अवरोध से क्षति पहुँच रही है, और
- सुस्पष्ट संसदीय नियम पहले से मौजूद हैं, पर उनका खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।
निष्कर्ष स्पष्ट है: लोकतंत्र, गरिमा और विधि-शासन की रक्षा के लिए प्रक्रिया का कड़ाई से, विधिसम्मत प्रवर्तन अनिवार्य है।
संसदीय पवित्रता, प्रक्रिया और प्राधिकार को दृढ़ता व विधिसम्मत तरीके से क्यों बहाल किया जाना चाहिए
1) संसद को “संविधान का मंदिर” क्यों कहा जाता है
भारत की संसद केवल एक राजनीतिक स्थल नहीं है। यह सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है, जिसे “मंदिर” इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह प्रतीक है:
- व्यक्तियों और दलों पर संविधान की सर्वोच्चता
- सड़क-दबाव या शक्ति के बजाय विधि-शासन
- आवेग और भावनाओं के बजाय प्रक्रिया
- धमकी और तमाशे के बजाय तर्कसंगत बहस
प्रश्नकाल, शून्यकाल, प्रस्ताव, नोटिस, समितियों की जाँच और बजट बहस जैसे तंत्र इसलिए हैं ताकि:
- राजनीतिक टकराव सभ्य बने
- आरोपों के लिए साक्ष्य की माँग हो
- अल्पमत और असहमत स्वर सुरक्षित रहें
- रिकॉर्ड और मतदान के माध्यम से जवाबदेही तय हो
अनुशासन के बिना ये सभी सुरक्षा-कवच ढह जाते हैं।
2) चिंताजनक यथार्थ: नागरिक क्या बार-बार देख रहे हैं
लोकसभा और राज्यसभा के अनेक सत्रों में एक परेशान करने वाला पैटर्न सामान्य बन गया है:
- सदन शुरू होते ही तुरंत शोर-शराबा
- न नोटिस, न अनुमति → “अभी चर्चा” की माँग
- वरिष्ठ नेता—यहाँ तक कि विपक्ष के नेता—कार्यवाही शुरू होते ही नारेबाज़ी
- वेल में पहुँचकर कार्यवाही को शारीरिक रूप से रोकना
- पीठासीन अधिकारी के निर्देशों की अनदेखी
- बार-बार स्थगन, पूरे दिन की कार्यवाही व्यर्थ
यह लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि सुनियोजित अवरोध है।
3) संसद नियमबद्ध है—कोई खुला मैदान नहीं
- संसदीय लोकतंत्र स्पष्ट, लिखित प्रक्रियाओं पर चलता है। ये वैकल्पिक परंपराएँ नहीं, बल्कि संवैधानिक सुरक्षा-उपाय हैं।
किसी भी मुद्दे को उठाने की सही प्रक्रिया:
- सचिवालय को औपचारिक नोटिस देना
- तथ्यों/रिकॉर्ड/दस्तावेज़ों के साथ समर्थन
- अध्यक्ष/सभापति द्वारा ग्राह्यता, तात्कालिकता, प्रासंगिकता और दोहराव की जाँच
- केवल अध्यक्ष की अनुमति से विषय का उठाया जाना
- सभी पक्षों को बोलने का समय आवंटित होना
किसी भी सदस्य को बिना अनुमति बोलने या चिल्लाने का अधिकार नहीं है।
इस प्रक्रिया को दरकिनार करना साहसी विपक्ष नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया की अवहेलना है।
4) अध्यक्ष का प्राधिकार: संसदीय अस्तित्व का केंद्र
अध्यक्ष/सभापति कोई औपचारिक पद नहीं, बल्कि संवैधानिक निर्णायक हैं।
- क्या और कब चर्चा होगी—यह तय करना
- न्यायसंगतता और व्यवस्था सुनिश्चित करना
- नियम मानने वाले सदस्यों की रक्षा करना
यदि अध्यक्ष के प्राधिकार को कमजोर किया गया:
- बहस अराजकता में बदल जाती है
- नियम अर्थहीन हो जाते हैं
- संसद अशासनीय हो जाती है
जहाँ सबसे ऊँची आवाज़ जीतने की कोशिश होती है, वहाँ लोकतंत्र नहीं—डेसिबल-आधारित भीड़तंत्र होता है।
5) असहमति बनाम अव्यवस्था: लाल रेखा स्पष्ट हो
यह भेद सरल है, पर अत्यंत महत्वपूर्ण:
असहमति
- नोटिस देती है
- अनुमति लेती है
- बहस करती है, तर्क देती है, मतदान करती है
- विरोध को रिकॉर्ड पर दर्ज कराती है
अव्यवस्था
- बिना अनुमति चिल्लाती है
- कार्यवाही को शारीरिक रूप से रोकती है
- अध्यक्ष की अवहेलना करती है
- शासन को चलने से रोकती है
जब अव्यवस्था सामान्य बनती है, संसद मछली बाज़ार जैसी दिखने लगती है:
- समझ पर शोर हावी
- वैधता पर आवाज़ भारी
- एजेंडा “बेचने” का माध्यम—चिल्लाना
यह लोकतंत्र नहीं—विधायिका के भीतर भीड़-राज है।
6) गणराज्य के लिए यह अत्यंत ख़तरनाक क्यों है
संसद में अव्यवस्था दूरगामी नुकसान करती है:
- नागरिक प्रतिनिधित्व खोते हैं—जब सांसद बोल नहीं पाते
- शासन धीमा पड़ता है—कानून और बजट अटकते हैं
- जन-विश्वास टूटता है—जब नियम वैकल्पिक लगें
- विधि-शासन कमजोर होता है—जब विधि-निर्माता ही नियम तोड़ें
जो विधायिका अपने भीतर अनुशासन लागू नहीं कर सकती, वह समाज में अनुशासन की माँग विश्वसनीय ढंग से नहीं कर सकती।
7) परिणामों के बिना नियम अराजकता को न्योता देते हैं
- नियम तभी मायने रखते हैं जब उल्लंघन की कीमत हो।
कठोर लेकिन विधिसम्मत कदम अनिवार्य हैं:
- बिना नोटिस/अनुमति मुद्दा उठाने वालों पर कार्रवाई
- बार-बार अवरोध करने वालों को नामित करना और निलंबन
- शारीरिक अवरोध और अव्यवस्थित दृश्यों पर त्वरित अनुशासनात्मक कदम
- सीरियल उल्लंघनकर्ताओं पर क्रमिक लेकिन दृढ़ दंड
यह विपक्ष को दबाना नहीं—संसद के सामूहिक अधिकार की रक्षा है।
8) विधि, न्यायपालिका और प्रवर्तन: कोई अस्पष्टता नहीं
व्यवस्था बहाल करने के लिए:
- संसदीय नियमों का समान और निर्भीक अनुप्रयोग
- न्यायपालिका द्वारा विरोध और शासन-अवरोध के बीच स्पष्ट भेद
- सदन के मार्शल/सुरक्षा को व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार
- उचित प्रक्रिया—पर हिचक या चयनात्मकता के बिना
कानून के भीतर दृढ़ता लोकतांत्रिक शक्ति है।
- अव्यवस्था के सामने हिचक संवैधानिक विफलता है।
9) एक सरल संवैधानिक कसौटी
- अध्यक्ष की अनुमति के बिना कोई चर्चा नहीं।
- उचित प्रक्रिया के बिना कोई अनुमति नहीं।
- अवहेलना पर परिणामों के बिना कोई प्रक्रिया नहीं।
यह कठोरता नहीं—कार्यशील लोकतंत्र की न्यूनतम शर्त है।
संविधान के मंदिर की पुनर्प्राप्ति
- संसद स्वभावतः अव्यवस्था का मंदिर नहीं बनी है—पर जब अवरोध सामान्य हो और प्रक्रिया का उपहास हो, तो ऐसा प्रतीत होने का जोखिम बढ़ जाता है।
संवैधानिक मंदिर को बचाया जाता है:
- नियमों के सम्मान से
- अध्यक्ष के प्राधिकार से
- अव्यवस्थित आचरण की जवाबदेही से
- नाटक के बजाय अनुशासन की सार्वजनिक माँग से
भारत के सामने विकल्प स्पष्ट है:
- शोर का बाज़ार, या
- संविधान का मंदिर और विधि-शासन का केंद्र
लोकतंत्र एक बार की नारेबाज़ी से नहीं मरता।
- वह तब मरता है जब नागरिक यह माँग करना छोड़ दें कि उनकी सर्वोच्च संस्था गरिमा, अनुशासन और संवैधानिक गंभीरता के साथ कार्य करे।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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