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उभरता भारत

उभरता भारत, राजनीतिक प्रतिरोध और राष्ट्रीय हितों की रक्षा

सारांश

  • भारत पिछले एक दशक में वैश्विक मंच पर अधिक आत्मविश्वासी और निर्णायक राष्ट्र के रूप में उभरा है। आर्थिक सुधार, डिजिटल क्रांति, अवसंरचना विस्तार, रक्षा-सुदृढ़ीकरण और कूटनीतिक सक्रियता ने देश की छवि को मजबूत किया है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को उनके समर्थक इसी परिवर्तन से जोड़ते हैं।
  • इसके साथ ही, यह भी तर्क दिया जाता है कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत कुछ घरेलू राजनीतिक शक्तियों और विदेशी हित समूहों के लिए असुविधाजनक हो सकता है—विशेषकर वे जो एक कमजोर और विभाजित भारत से लाभान्वित होते रहे हों।
  • मुख्य प्रश्न यह है: क्या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय हितों से ऊपर चली जाएगी, या राष्ट्र की स्थिरता और विकास सर्वोपरि रहेंगे?

वैश्विक प्रगति, नेतृत्व की लोकप्रियता और विभाजनकारी रणनीतियों का विश्लेषण

1️⃣ भारत की वैश्विक प्रगति: एक बदलती छवि

भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति में स्पष्ट परिवर्तन देखा गया है:

🌍 कूटनीतिक सक्रियता

  • वैश्विक मंचों पर निर्णायक भूमिका
  • जी20 जैसी बहुपक्षीय बैठकों की मेजबानी
  • वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज़ बनने का प्रयास

💻 डिजिटल परिवर्तन

  • डिजिटल भुगतान प्रणाली का वैश्विक मॉडल
  • आधार और डीबीटी (Direct Benefit Transfer) का व्यापक उपयोग
  • टेक्नोलॉजी आधारित प्रशासन

🏗️ अवसंरचना विस्तार

  • हाईवे, रेलवे, हवाई अड्डों और बंदरगाहों का विस्तार
  • ग्रामीण और शहरी विकास परियोजनाएँ

🛡️ राष्ट्रीय सुरक्षा

  • सीमाओं पर स्पष्ट रुख
  • रक्षा साझेदारियों का विस्तार

समर्थकों का मत है कि यह प्रगति केवल नीतिगत नहीं, बल्कि मानसिक परिवर्तन का संकेत है—भारत अब प्रतिक्रियाशील नहीं, बल्कि आत्मविश्वासी राष्ट्र है।

2️⃣ “मोदी फैक्टर” और राजनीतिक समीकरण

समर्थकों के अनुसार “मोदी मैजिक” कई कारकों का परिणाम है:

  • प्रत्यक्ष लाभ योजनाएँ
  • भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त छवि
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर स्पष्ट रुख
  • वैश्विक मंच पर भारत की सशक्त उपस्थिति

जब किसी नेता की लोकप्रियता व्यापक होती है, तो विपक्ष के लिए चुनौती बढ़ती है।
राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, पर रणनीतियाँ अधिक तीखी हो सकती हैं।

3️⃣ क्या एक मजबूत भारत कुछ हितों के लिए चुनौती है?

यह तर्क सामने आता है कि:

  • एक कमजोर और विभाजित भारत से कुछ स्थानीय एवं विदेशी शक्तियाँ या लॉबी लाभान्वित हमेशा स लाभान्वित होती रही हैं।
  • आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रभाव से पुराने शक्ति-संतुलन प्रभावित होते है

समर्थकों का आरोप है कि:

  • सरकार और संस्थानों पर निरंतर अविश्वास पैदा करने की कोशिश
  • नकारात्मक अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव
  • आंतरिक अस्थिरता का वातावरण

इन सबका उद्देश्य भारत की प्रगति को धीमा करना है।

  • हालाँकि, लोकतंत्र में आलोचना आवश्यक है। लेकिन आलोचना और व्यवस्थित अस्थिरता में अंतर है।

4️⃣ विभाजन की राजनीति: एक पुरानी चाल?

जब विकास और राष्ट्रीय उपलब्धियाँ प्रमुख मुद्दा बनती हैं, तो कुछ विश्लेषकों का मानना है कि:

  • जातीय समीकरणों को सक्रिय किया जाता है
  • समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ाया जाता हैसामाजिक तनाव को राजनीतिक लाभ में बदला जाता है

विशेषकर:

  • ओबीसी बनाम सवर्ण
  • एससी-एसटी बनाम अन्य वर्ग
  • क्षेत्रीय अस्मिता बनाम राष्ट्रीय पहचान

समर्थकों का दावा है कि यह “पुरानी राजनीति” है, जो अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रही।

5️⃣ विपक्ष की भूमिका: आवश्यक, पर सीमित

लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व है:

✔ सरकार की नीतियों की समीक्षा
✔ वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना
✔ जनहित के प्रश्न उठाना

लेकिन यदि:

✘ संस्थाओं को लगातार अविश्वसनीय बताया जाए
✘ विदेशों में देश की छवि को नुकसान पहुँचाया जाए
✘ सामाजिक विभाजन को हवा दी जाए

तो यह राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध जा सकता है।

  • राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सत्ता के लिए हो सकती है, पर राष्ट्र की स्थिरता दांव पर नहीं लगनी चाहिए।

6️⃣ जनता की बदलती मानसिकता

आज का मतदाता:

  • सूचना से अधिक जुड़ा हुआ है
  • सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जागरूक है
  • योजनाओं के प्रत्यक्ष लाभ का अनुभव करता है

कई विश्लेषकों का मानना है कि:

  • तुष्टिकरण की राजनीति की प्रभावशीलता घट रही है
  • जातीय ध्रुवीकरण पहले जितना निर्णायक नहीं रहा
  • विकास, रोजगार और वैश्विक प्रतिष्ठा अब प्रमुख मुद्दे हैं

जनता पहले की तुलना में अधिक परिपक्व राजनीतिक निर्णय ले रही है।

7️⃣ राष्ट्रीय हित सर्वोपरि क्यों?

राष्ट्रीय हित में शामिल हैं:

  • आर्थिक स्थिरता
  • सामाजिक समरसता
  • संस्थागत विश्वसनीयता
  • वैश्विक सम्मान
  • आंतरिक सुरक्षा

यदि राजनीतिक संघर्ष इन स्तंभों को कमजोर करता है, तो अंततः नुकसान पूरे राष्ट्र का होता है।

8️⃣ संतुलन की आवश्यकता

यह भी उतना ही सत्य है कि:

  • हर सरकार आलोचना से परे नहीं
  • नीतियों की समीक्षा लोकतंत्र का आधार है
  • सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है

परंतु संतुलन आवश्यक है:

✔ तथ्य आधारित बहस
✔ नीतिगत आलोचना
✔ संस्थाओं का सम्मान
✔ राष्ट्रीय छवि की रक्षा

9️⃣ आगे का मार्ग

यदि भारत को निरंतर प्रगति करनी है, तो:

  • सामाजिक एकता मजबूत करनी होगी
  • राजनीतिक मतभेदों को मर्यादित रखना होगा
  • विकास को केंद्र में रखना होगा
  • राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होगी

राजनीतिक दल और नेता आएँगे-जाएँगे, पर राष्ट्र स्थायी है।

✔ भारत की वैश्विक प्रगति स्पष्ट है
✔ नेतृत्व की लोकप्रियता राजनीतिक वास्तविकता है
✔ विपक्ष लोकतंत्र का आवश्यक अंग है
✔ विभाजनकारी राजनीति दीर्घकालिक हानि पहुँचाती है
✔ राष्ट्रीय हित किसी भी राजनीतिक खेल से ऊपर हैं

भारत की मजबूती केवल किसी एक नेता की सफलता नहीं, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक उपलब्धि है।

  • राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रहे — पर राष्ट्र की एकता और विकास की गति बनी रहे — यही सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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