वर्तमान युग उथल-पुथल और अस्थिरता का युग है। वैश्विक स्तर पर उग्रवाद, समानांतर प्रणालियाँ और सामाजिक एकीकरण में विफलताएँ वैश्विक शांति और सद्भाव के लिए गंभीर खतरे पैदा कर रही हैं। ऐसे समय में स्पष्टता और जिम्मेदार नीति बनाना अनिवार्य है। वैश्विक अनुभव चाहे यूरोप का प्रवासन संकट हो, भारत के संवेदनशील क्षेत्र हों, या इज़राइल का सुरक्षा-प्रधान मॉडल सिखाते हैं कि केवल सह-अस्तित्व या समझौता इन चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता। वास्तविक सुरक्षा और स्थिरता तभी संभव है जब उग्रवादी विचारधाराओं और पहचान-आधारित दबावों का सामना संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक उपायों के माध्यम से किया जाए।
वैश्विक उग्रवाद, समानांतर प्रणालियाँ और एकीकरण संकट
1) आज स्पष्टता क्यों ज़रूरी है
दुनिया भर में समाज एक कठिन सच्चाई का सामना कर रहे हैं:
- शांति को विविधता से नहीं, बल्कि उन विचारधाराओं से ख़तरा है जो सह–अस्तित्व को नकारती हैं और संवैधानिक ढांचे से बाहर काम करती हैं।
- जब ऐसी विचारधाराओं को अस्पष्टता के नाम पर सहन किया जाता है, तो वे समानांतर प्रणालियों में बदल जाती हैं—जो सामाजिक व्यवस्था, सुरक्षा और विश्वास को कमजोर करती हैं।
यह चुनौती आज यूरोप में सबसे अधिक दिखाई देती है, और भारत व इज़राइल इसे दशकों से अलग-अलग तरीकों से झेलते आ रहे हैं—पर चेतावनी संकेत लगभग समान हैं।
2) आवश्यक भेद: आस्था बनाम उग्रवादी विचारधारा
जिम्मेदार संवाद की शुरुआत सटीकता से होनी चाहिए:
- आस्था–समुदाय समस्या नहीं हैं
- उग्रवादी और जिहादी विचारधाराएँ समस्या हैं
ये राजनीतिक परियोजनाएँ हैं जो:
- बहुलता और स्थानीय संस्कृति को नकारती हैं
- जानबूझकर एकीकरण से इंकार करती हैं
- सह-अस्तित्व की जगह प्रभुत्व चाहती हैं
- धर्म का उपयोग दबाव और औचित्य के लिए करती हैं
यह भेद निर्दोष नागरिकों की रक्षा करता है और वास्तविक ख़तरों पर सख़्त कार्रवाई संभव बनाता है।
3) मूल चुनौती: एकीकरण का निषेध और समानांतर प्रणालियों का निर्माण
A) कुछ उग्रवादी विचारधाराएँ एकीकृत क्यों नहीं होतीं
पीढ़ियों में घुल-मिल जाने वाले प्रवासी समुदायों के विपरीत, उग्रवादी/जिहादी विचारधाराएँ एकीकरण का विरोध करती हैं। इनके सिद्धांतों में शामिल है:
- संवैधानिक क़ानून पर धार्मिक क़ानून की सर्वोच्चता
- स्थानीय सांस्कृतिक प्रथाओं से दूरी
- सीमा-पार वैचारिक नेटवर्क के प्रति निष्ठा
- समान नागरिक दायित्वों का अस्वीकार
एकीकरण को सह–अस्तित्व नहीं, ‘कमज़ोरी’ माना जाता है।
B) समानांतर प्रणालियाँ कैसे उभरती हैं
कई क्षेत्रों में एक ही पैटर्न दर्ज हुआ है:
- बंद/अलग–थलग बस्तियाँ जो नागरिक मानदंडों से कटी रहती हैं
- अनौपचारिक “न्याय” या दबाव समूह
- डर और सामाजिक कानूनी पुलिसिंग का विरोध
- शिकायत-आधारित भर्ती
- अपराध को धार्मिक पहचान की आड़ में छिपाना
ये समानांतर प्रणालियाँ क़ानून-व्यवस्था को खोखला करती हैं।
4) आस्था की आड़ में आपराधिक शोषण
उग्रवादी नेटवर्क अक्सर निम्न माध्यमों से खुद को चलाते हैं:
- अवैध प्रवासन/मानव-तस्करी
- कल्याण योजनाओं की धोखाधड़ी
- संगठित अपराध और काला बाज़ार
- अनौपचारिक चैनलों से धन-शोधन
ऑनलाइन कट्टरपंथ और फंडरेज़िंग
धर्म ढाल बन जाता है, और जाँच से बचाव होता है—जब तक हिंसा न फूट पड़े।
5) राजनीतिक रणनीति के रूप में जनसांख्यिकीय दबाव
एक संवेदनशील पर अनिवार्य मुद्दा है जनसंख्या का राजनीतिक उपयोग।
प्रचलित तरीके:
- बंद समुदायों में रहकर तेज़ जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा
- सामाजिक मेल-जोल और आत्मसात का हतोत्साहन
- स्थानीय राजनीति में संख्या-बल का प्रदर्शन
- अलग क़ानूनी मानकों (जैसे शरिया) की मांग
परिणाम:
- शरिया-आधारित अपवादों का दबाव
- समुदाय के भीतर असहमति पर दमन
- महिलाओं और व्यक्तियों के अधिकारों का क्षरण
- संवैधानिक समानता से टकराव
यह प्रवासन नहीं—जनसंख्या के ज़रिये राजनीतिक विस्तार है।
6) अध्ययन-प्रकरण: दुनिया को मिलने वाले सबक
यूरोप (वर्तमान संकट)
- दशकों तक खुले प्रवासन के साथ कमजोर एकीकरण ढांचे
- अलग-थलग एन्क्लेव और “नो-गो” क्षेत्र
- अपराध, कट्टरपंथ और अशांति में वृद्धि
- संवेदनशील इलाकों में राज्य कानूनों का विरोध
- विवाद से डरकर राजनीतिक ठहराव
अब नियंत्रण वापस पाना कठिन हो रहा है।
भारत (दीर्घकालिक चुनौती)
- सीमा-पार घुसपैठ और अवैध प्रवासन
- गरीबी/पहचान का दुरुपयोग कर नेटवर्क विस्तार
- संवेदनशील क्षेत्रों में समानांतर अधिकार
- दशकों का तुष्टिकरण, कमजोर प्रवर्तन
- संवैधानिक सर्वोच्चता की पुनर्स्थापना के प्रयास
देरी और सहनशीलता से खतरा बढ़ता जाता है।
इज़राइल (सुरक्षा-प्रथम मॉडल)
- निरंतर वैचारिक व भौतिक ख़तरे
- समानांतर अधिकार पर स्पष्ट “रेड-लाइन”
- मज़बूत सीमाएँ, खुफ़िया तंत्र और प्रवर्तन
- एकीकरण प्रोत्साहित—पर दबाव का त्वरित प्रतिरोध
स्पष्टता और दृढ़ता दीर्घकालिक स्थिरता देती है।
7) राजनीतिक शिष्टता (PC) संकट को क्यों बढ़ाती है
अक्सर दुनिया ने:
- पॉलिटिकल करेक्टनेस के नाम पर बहस टाली
- मानवाधिकार भाषा का चयनात्मक उपयोग किया
- आर्थिक/राजनयिक हितों को प्राथमिकता दी
- मध्यम स्वरों को दबाया, उग्रवाद को ताक़त दी
नतीजा:
- उग्रवाद बढ़ा
- सार्वजनिक भरोसा टूटा
- प्रतिक्रिया और टकराव तीखे हुए
चुप्पी तटस्थता नहीं—रणनीतिक समर्पण है।
8) जिम्मेदार समाधान कैसे दिखते हैं
A) संवैधानिक सर्वोच्चता
- सबके लिए एक क़ानून
- समानांतर क़ानूनों को मान्यता नहीं
- डर/दबाव पर शून्य सहनशीलता
B) एकीकरण—अनिवार्य शर्त
- भाषा और नागरिक शिक्षा अनिवार्य
- सामाजिक भागीदारी की स्पष्ट अपेक्षाएँ
- एन्क्लेव बनने से रोकने हेतु संतुलित बसावट
- एकीकरण से इंकार पर सख़्त कार्रवाई
C) वित्तीय और वैचारिक जवाबदेही
- विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता
- अवैध धन-प्रवाह पर कार्रवाई
- उग्रवाद बढ़ाने वाली संस्थाओं का नियमन
- कानूनी सुरक्षा के साथ डिजिटल निगरानी
D) समुदायों के भीतर अधिकारों की रक्षा
- महिलाओं, बच्चों और असहमत स्वरों की सुरक्षा
- धार्मिक दबाव से मुक्ति का अधिकार
- सुधारवादी/मध्यम स्वरों को सशक्त करना
9) वैश्विक सहयोग अनिवार्य
यह राष्ट्रीय नहीं—सभ्यतागत चुनौती है। ज़रूरत है:
- उग्रवादी नेटवर्क पर खुफ़िया सहयोग
- प्रवासन-एकीकरण के साझा मानक
- अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में ईमानदार सुधार
- दिखावे से ऊपर शांति को रखने का साहस
सामूहिक कार्रवाई के बिना हर समाज असुरक्षित है।
10) हमारे युग का निर्णायक सत्य
जो उग्रवाद सह–अस्तित्व को नकारता है, वह एकीकृत नहीं होता—अवरोध न हो तो प्रभुत्व चाहता है।
- इसे अनदेखा करना यूरोप को अस्थिर कर चुका है और भारत–इज़राइल पर दशकों से बोझ है।
विकल्प स्पष्ट हैं:
- क़ानून या अराजकता
- एकीकरण या विघटन
- साहस या पतन
11) अंतिम आह्वान
वैश्विक शांति और सद्भाव के लिए:
- उग्रवादी विचारधाराओं का निडरता से सामना करें
- समुदायों की रक्षा करें, अपराध को ढाल न दें
- करुणा और संवैधानिक दृढ़ता में संतुलन रखें
- देर न करें—समानांतर प्रणालियाँ जमने से पहले कदम उठाएँ
शांति इनकार से नहीं, सत्य, क़ानून और जिम्मेदार कार्रवाई से सुरक्षित रहती है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
पुराने लेख: https://saveindia108.in/our-blog/
