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विभाजन की राजनीति

विभाजन की राजनीति, डिजिटल प्रचार और राष्ट्रीय एकता की कीमत

सारांश

• भारत में डिजिटल प्रचार और पहचान-आधारित ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
• कुछ राजनीतिक दल और उनके संबद्ध तंत्र धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय विभाजनों का उपयोग चुनावी लाभ के लिए कर रहे हैं।
• फर्जी आईडी, समन्वित डिजिटल नेटवर्क और भावनात्मक नैरेटिव के माध्यम से समाज में भ्रम और अविश्वास फैलाया जा रहा है।
• आंतरिक ध्रुवीकरण से राष्ट्र की एकता कमजोर होती है और इसका लाभ राष्ट्र-विरोधी तत्वों, उग्रवादियों और विदेशी स्वार्थी शक्तियों को मिलता है।
• नागरिकों को समझना होगा कि राष्ट्रीय हित, किसी भी दलगत निष्ठा से बड़ा है।
• डिजिटल जिम्मेदारी आज राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

जब चुनावी लाभ, राष्ट्रीय हित से ऊपर हो जाता है

1️⃣ नीति-आधारित राजनीति से विभाजन-आधारित राजनीति तक

  • लोकतंत्र बहस, असहमति और जवाबदेही से मजबूत होता है।

लेकिन जब राजनीति मुद्दों से हटकर पहचान-आधारित लामबंदी पर आ जाती है, तो परिणाम खतरनाक होते हैं।

यह देखा जा रहा है कि कुछ राजनीतिक तत्व:

• धार्मिक असुरक्षा को उभारते हैं
• जातीय विभाजन को मजबूत करते हैं
• क्षेत्रीय शिकायतों को भड़काते हैं
• भावनात्मक मुद्दों को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं
• भय-आधारित संदेशों से समाज को ध्रुवीकृत करते हैं

विकास के एजेंडे के बजाय विभाजन की रणनीति अपनाई जाती है। अल्पकालिक चुनावी लाभ, दीर्घकालिक सामाजिक सौहार्द पर भारी पड़ता है।

2️⃣ ध्रुवीकरण को बढ़ाने वाला डिजिटल तंत्र

आधुनिक राजनीतिक अभियान अब केवल जमीनी स्तर तक सीमित नहीं हैं। वे एक संगठित डिजिटल ढांचे के माध्यम से संचालित होते हैं:

• भुगतान किए गए कंटेंट क्रिएटर
• बॉट-आधारित ट्रेंड हेरफेर
• फर्जी और गुमनाम अकाउंट
• संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किए गए वीडियो
• भावनात्मक और भड़काऊ संदेश
• विदेशी या प्रवासी नेटवर्क से डिजिटल समर्थन

उद्देश्य केवल आलोचना नहीं, बल्कि भावनात्मक उकसावा होता है। जब प्रतिदिन आक्रोश ट्रेंड करता है, तो तर्कसंगत संवाद समाप्त हो जाता है।

3️⃣ निर्मित आक्रोश: राजनीतिक मुद्रा

इस माहौल में:

• हर भाषण विवाद में बदला जाता है
• हर सामाजिक मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग दिया जाता है
• हर नीति को पहचान-आधारित संघर्ष में बदला जाता है

  • एल्गोरिद्म संतुलन नहीं, बल्कि आक्रोश को बढ़ावा देता है।
    राजनीतिक तंत्र इसका लाभ उठाते हैं।

निर्मित आक्रोश से:

• वोटों का ध्रुवीकरण
• मीडिया में ध्यान
• वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाना

लेकिन साथ ही:

• सामाजिक अविश्वास
• संस्थाओं में संदेह
• भावनात्मक अस्थिरता

भी बढ़ती है।

4️⃣ सामाजिक विखंडन से किसे लाभ?

कुछ राजनीतिक दलों को अस्थायी लाभ मिल सकता है। लेकिन दीर्घकाल में लाभ उठाते हैं:

• राष्ट्र-विरोधी तत्व
• उग्रवादी संगठन
• विदेशी शत्रुतापूर्ण शक्तियाँ
• भारत की प्रगति से चिंतित वैश्विक प्रतिस्पर्धी

विभाजित समाज रणनीतिक रूप से कमजोर हो जाता है। जब राष्ट्र अपनी ऊर्जा आंतरिक संघर्ष में खर्च करता है, तो विकास धीमा पड़ता है।

5️⃣ सूचना युद्ध: नई चुनौती

आधुनिक हाइब्रिड युद्ध में शामिल हैं:

• मनोवैज्ञानिक अभियान
• नैरेटिव हेरफेर
• धार्मिक ध्रुवीकरण
• डिजिटल दुष्प्रचार
• एल्गोरिद्म आधारित भावनात्मक नियंत्रण

आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ा जाता है।

  • राष्ट्रीय एकता केवल भावनात्मक विषय नहीं — यह रणनीतिक आवश्यकता है।

6️⃣ वोट-बैंक की राजनीति की कीमत

जब राजनीति में प्राथमिकता होती है:

• चुनावी गणित
• पहचान-आधारित समूह
• भावनात्मक लामबंदी

तो परिणाम होते हैं:

• कानून-व्यवस्था पर दबाव
• निवेश में कमी
• युवाओं का कट्टरपंथ की ओर झुकाव
• संस्थागत विश्वास में गिरावट

लगातार ध्रुवीकृत समाज स्थिर प्रगति नहीं कर सकता।

7️⃣ उग्रवाद का सामान्यीकरण

लगातार विभाजन से:

• मध्यमार्गी आवाजें पीछे हटती हैं
• चरमपंथी विचार हावी होते हैं
• षड्यंत्र सिद्धांत फैलते हैं
• राज्य-विरोधी भाषा सामान्य हो जाती है

विदेशी शक्तियाँ ऐसे माहौल को डिजिटल माध्यम से और बढ़ाती हैं।

8️⃣ राष्ट्रीय हित, दलगत हित से ऊपर

  • राजनीतिक दल अस्थायी हैं। राष्ट्र स्थायी है।

कोई भी चुनावी जीत उचित नहीं ठहराती:

• सामाजिक दरार
• सामुदायिक अविश्वास
• डिजिटल दुष्प्रचार
• विदेशी हस्तक्षेप

लोकतंत्र में विपक्ष आवश्यक है, लेकिन विघटन नहीं।

9️⃣ संस्थागत जिम्मेदारी

राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए:

• डिजिटल फंडिंग पारदर्शी हो
• फर्जी नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई हो
• कानून का समान रूप से पालन हो
• विदेशी हस्तक्षेप की निगरानी हो

चयनात्मक कार्रवाई विश्वास तोड़ती है। समान कार्रवाई विश्वास मजबूत करती है।

🔟 नागरिक: निर्णायक शक्ति

  • डिजिटल विभाजन तभी टिकता है जब नागरिक उसे बढ़ावा देते हैं।

हर नागरिक को पूछना चाहिए:

  • क्या मैं सत्यापित जानकारी साझा कर रहा हूँ?
  • या भावनात्मक उकसावे को आगे बढ़ा रहा हूँ?

जिम्मेदार नागरिकता में शामिल है:

• साझा करने से पहले सत्यापन
• भड़काऊ सामग्री से दूरी
• सभी राजनीतिक दलों को समान रूप से जवाबदेह ठहराना
• राष्ट्रीय स्थिरता को दलगत निष्ठा से ऊपर रखना

एकता विकल्प नहीं, आवश्यकता है

  • भारत की शक्ति विविधता में एकता है।

यदि सामाजिक दरारों का लगातार राजनीतिक उपयोग किया गया, तो:

• राष्ट्र-विरोधी तत्व मजबूत होंगे
• उग्रवादी समूह सक्रिय होंगे
• विदेशी शक्तियाँ हस्तक्षेप करेंगी
• राष्ट्रीय ऊर्जा बिखर जाएगी

विभाजन से वोट मिल सकते हैं, लेकिन स्थिर राष्ट्र नहीं बनता।

  • राष्ट्रीय एकता अपरिहार्य है।

नागरिकों को मांग करनी चाहिए:

• जिम्मेदार राजनीति
• पारदर्शी डिजिटल संचालन
• समान कानूनी मानक
• राष्ट्रहित सर्वोपरि

क्योंकि जब राष्ट्र भीतर से कमजोर होता है, तो बाहरी शत्रुओं को आक्रमण की आवश्यकता नहीं पड़ती — वे केवल प्रतीक्षा करते हैं।

🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳

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