सारांश
- दशकों तक भारतीय राजनीति ऐसी रणनीति से संचालित होती रही, जिसमें हिंदू समाज को जाति, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय के आधार पर बाँटा गया, जबकि मुस्लिम वोटों को सशक्तिकरण के बजाय प्रतीकात्मक तुष्टिकरण से साधा गया। हिंदुत्व और सनातन धर्म को बार-बार निशाना बनाकर वोट-बैंक मजबूत किए गए।
- मोदी युग में यह मॉडल धीरे-धीरे असर खो रहा है। लोग जागरूक हो चुके हैं—हिंदू समाज विभाजन की कीमत समझ रहा है और कई मुस्लिम भी यह पहचानने लगे हैं कि तुष्टिकरण ने नेताओं को सत्ता दी, समुदायों को प्रगति नहीं।
- निष्पक्ष न्यायिक संतुलन, भेदभाव-रहित कल्याण, और दृश्य शासन-परिणाम राजनीतिक विकल्पों को पुनर्संयोजित कर रहे हैं। पुराने हथकंडे विफल होने पर विपक्ष संस्थाओं और हिंदुत्व के विरुद्ध झूठे नैरेटिव गढ़ रहा है।
- लेकिन हरियाणा से लेकर बीएमसी जैसे शहरी निकायों तक के नतीजे बताते हैं कि यह रणनीति अब काम नहीं कर रही। भारत विकास, गरिमा और संवैधानिक समानता पर आधारित एक राष्ट्रीय जागरण देख रहा है।
एक सभ्यतागत सुधार—जो जागरूक नागरिकों, निष्पक्ष संस्थाओं और शासन-केंद्रित राजनीति से प्रेरित है
1. पुराना राजनीतिक प्लेबुक: बाँटो, तुष्ट करो, राज करो
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक एक प्रमुख रणनीति हावी रही:
- हिंदू समाज का विभाजन
- जाति बनाम जाति, संप्रदाय बनाम संप्रदाय
- क्षेत्र बनाम क्षेत्र, भाषा बनाम भाषा
- अल्पसंख्यक वोटों का प्रतीकात्मक तुष्टिकरण
- हिंदुत्व और सनातन धर्म को परंपरा नहीं, खतरे के रूप में प्रस्तुत करना
- शासन सुधारे बिना चुनाव जीतना
परिणाम: स्थायी सामाजिक तनाव, खोखली सेक्युलरिज़्म, और वितरण से कटी हुई चुनावी गणित।
2. यह रणनीति दशकों तक क्यों चली
यह राजनीति तीन कारणों से टिकी रही:
A. नैरेटिव पर कब्ज़ा
- हिंदू सभ्यतागत आत्मविश्वास को “बहुसंख्यकवाद” कहा गया
- सनातन धर्म को दर्शन नहीं, अंधविश्वास के रूप में दिखाया गया
- हिंदू सरोकारों को “सांप्रदायिक” बताकर खारिज किया गया
B. चयनात्मक निगरानी
- हिंदू आस्थाओं को निशाना बनाने वाली भाषा पर कम कार्रवाई
- हेट-स्पीच मानकों का असमान प्रयोग
- उकसावे पर सवाल उठाने वालों को अक्सर प्रतिकूलता
C. संस्थागत हिचक
- आस्था-संबंधी राजनीति पर लंबे समय तक सतर्कता
- मानकों में सममिति लागू करने में संकोच
- समान अनुप्रयोग को हतोत्साहित करने वाला राजनीतिक दबाव
इससे हिंदू-विरोधी भाषा कम-जोखिम राजनीति बन गई।
3. न्यायिक व संस्थागत पुनर्संतुलन
हाल के वर्षों में दिशा-सुधार दिखाई देता है:
- किसी धर्म के उन्मूलन की पुकार को हेट-स्पीच के रूप में पहचान
- उकसाने वाले वक्तव्यों पर सवाल को वैध अभिव्यक्ति मान्यता
- कानून के समक्ष समानता पर पुनः ज़ोर—विशेषाधिकार नहीं, समानता
इससे लंबित सभ्यतागत मुद्दों को संवैधानिक दायरे में देखने का मार्ग खुला।
4. मोदी युग: राजनीतिक बदलाव के साथ सामाजिक जागरण
- 2014 के बाद का परिवर्तन एक व्यापक सामाजिक जागरण से जुड़ा है।
हिंदू समाज की समझ
- जाति/संप्रदाय विभाजन से सामूहिक हिन्दू आवाज़ कमजोर हुई—यह अब स्पष्ट है
- “सेक्युलरिज़्म = हिंदू मौन” की धारणा खारिज हो रही है
- विभाजन से अधिक एकता को महत्व
सांस्कृतिक आत्मविश्वास के साथ शासन
- सनातन धर्म सार्वजनिक जीवन में सम्मान के साथ
- विरासत, उत्सव और मंदिर—सभ्यतागत संपत्ति के रूप में
- विकास और गरिमा—साथ-साथ
5. तुष्टिकरण की राजनीति से मुसलमानों की दूरी
एक महत्वपूर्ण, कम-रिपोर्टेड बदलाव:
- यह समझ कि तुष्टिकरण = सशक्तिकरण नहीं
- प्रतीकात्मकता से शिक्षा, रोज़गार और गरिमा नहीं मिली
- दशकों के वोट-बैंक के बावजूद गरीबी बनी रही
व्यवहार में भेदभाव-रहित कल्याणलाभ धर्म-आधारित फ़िल्टर के बिना
- शिक्षा, कौशल, आवास, स्वास्थ्य, वित्त पर फोकस
- राजनीतिक बिचौलियों पर निर्भरता में कमी
नतीजा: बेहतर जीवन-परिस्थितियाँ और विभाजनकारी राजनीति से दूरी।
6. तुष्टिकरण कार्ड का पतन
जैसे-जैसे जागरूकता बढ़ी:
- हिंदू-विभाजन नैरेटिव कमजोर पड़े
- तुष्टिकरण जनसमर्थन नहीं जुटा पाया
- प्रदर्शन और डिलीवरी अहम बने
पुराने हथकंडे कुंद होने पर:
- सरकार व संस्थाओं के खिलाफ झूठे नैरेटिव
- हिंदुत्व पर तीखे हमले
- निर्मित आक्रोश
लेकिन असर घटता दिखा।
7. चुनावी यथार्थ बनाम नैरेटिव युद्ध
हालिया नतीजे—हरियाणा से बीएमसी जैसे शहरी निकायों तक—दिखाते हैं:
- पहचान-राजनीति से मतदाताओं की थकान
- स्थिरता और डिलीवरी की प्राथमिकता
- स्थायी उग्रता का अस्वीकार
ज़मीनी सच्चाई प्रचार से भारी पड़ती है, जब लोग देखते हैं:
- बेहतर सड़कें, आवास, बिजली, डिजिटल सेवाएँ
- तेज़ कल्याण-डिलीवरी
- राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सुरक्षा
8. प्रतिशोध नहीं, पुनर्स्थापन
यह दौर बहुसंख्यक वर्चस्व नहीं, पुनर्स्थापनात्मक न्याय है:
- सनातन धर्म की गरिमा की बहाली
- कानून के तहत समान मानकों की वापसी
- दूसरों को दबाए बिना सांस्कृतिक आत्मविश्वास
सनातन धर्म मान्यता और सम्मान चाहता है, प्रभुत्व नहीं।
9. साझा जिम्मेदारी: समाज और राजनीति
समाज से
- जाति, क्षेत्र, संप्रदाय विभाजन का त्याग
- अराजकता के बजाय संवैधानिक प्रक्रियाओं का समर्थन
- डर नहीं, तथ्यों की मांग
राजनीति से
- डिलीवरी और विकास को प्राथमिकता
- संवैधानिक अनुशासन के साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास
- वोट-बैंक प्रलोभनों से दूरी
परिपक्व होता राष्ट्र
- भारत विभाजन और तुष्टिकरण से आगे बढ़कर गरिमा, विकास और समानता की ओर बढ़ रहा है। जागरूक मतदाता, निष्पक्ष संस्थाएँ और शासन-केंद्रित राजनीति ने एक सभ्यतागत सुधार का अवसर खोला है।
भविष्य सुरक्षित करने के लिए:
- सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा
- संवैधानिक समानता का पालन
- राष्ट्रवादी, विकासोन्मुख शासन का समर्थन
- भारत को वैश्विक महाशक्ति और विश्वगुरु बनाना
यह किसी एक दल या चुनाव की बात नहीं।
- यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक आत्मविश्वासी, एकजुट और समृद्ध भारत की दिशा है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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