सारांश
- दशकों तक भारत की विकास दिशा केवल घरेलू नीतिगत निर्णयों से ही नहीं, बल्कि विदेशी तत्वों द्वारा चलाई जा रही चैरिटीज़, एनजीओ, एडवोकेसी नेटवर्क और फंडिंग चैनलों से भी प्रभावित रही।
- जहां कई संगठनों ने सकारात्मक योगदान दिया, वहीं कुछ संस्थाओं द्वारा किए गए दुरुपयोग ने बुनियादी ढांचे, प्राकृतिक संसाधनों के विकास और औद्योगिकीकरण को नुकसान पहुँचाया—अक्सर पर्यावरण या आदिवासी सरोकारों की आड़ में।
- 2014 के बाद पारदर्शिता, नियमन और राष्ट्रीय हित पर आधारित नीतिगत बदलावों ने इस व्यवस्था को बदला, जिससे जमी हुई शक्तियों में असंतोष पैदा हुआ।
- इस पूरे परिदृश्य को समझना भारत की दीर्घकालिक स्थिरता, विकास और वैश्विक भूमिका के लिए आवश्यक है।
शासन और संप्रभुता का दृष्टिकोण
1) 2014 से पहले का पैटर्न: विकास में देरी और बाहरी दबाव
- खनिजों के नैतिक दोहन, ऊर्जा सुरक्षा, बंदरगाहों, राजमार्गों, बांधों और औद्योगिक कॉरिडोर से जुड़े प्रोजेक्ट्स का लगातार विरोध।
- पर्यावरण या आदिवासी हितों के नाम पर चलाए गए ऐसे अभियान, जिनमें कई मामलों में वर्षों तक परियोजनाएँ रुकी रहीं और कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं दिया गया।
आर्थिक परिणाम:
- रोजगार के अवसरों का नुकसान,
- आयात पर निर्भरता बढ़ना,
- बुनियादी ढांचे का धीमा विकास,
- प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में गिरावट।
राजनीतिक प्रोत्साहन:
- भ्रष्टाचार, रेंट-सीकिंग और किकबैक के अवसर,
- नीतिगत जड़ता, जिससे नागरिकों के बजाय बिचौलियों को लाभ मिला।
प्रभाव: भारत एक उपभोक्ता बाज़ार और कच्चे संसाधनों का आयातक बना रहा, जबकि मूल्यवर्धन और मैन्युफैक्चरिंग पीछे रह गई।
2) बाहरी फंडिंग ने परिणामों को कैसे प्रभावित किया
कुछ विदेशी-फंडेड एनजीओ और एडवोकेसी समूहों ने:
- निवेश को हतोत्साहित करने वाले चयनात्मक नैरेटिव को बढ़ावा दिया,
- ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी रणनीतिक परियोजनाओं को चुनौती दी,
- देश और विदेश में जनमत को प्रभावित किया।
इससे एक दुष्चक्र बना:
- परियोजना में देरी → निर्भरता → विदेशी उत्पादकों द्वारा बाज़ार पर कब्ज़ा।
महत्वपूर्ण अंतर: यह आलोचना दुरुपयोग और अपारदर्शिता पर है, सभी एनजीओ या चैरिटीज़ पर नहीं।
3) 2014 के बाद का बदलाव: पारदर्शिता, नियमन और विकास
राष्ट्रीय हित प्रथम दृष्टिकोण के तहत:
- जवाबदेही के साथ मंज़ूरियाँ,
- समय-सीमा के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा,
- आजीविका और स्वामित्व से जुड़ा आदिवासी कल्याण,
- विकास को गति देने वाला बुनियादी ढांचा।
विदेशी फंडिंग पर नियामक नियंत्रण:
- सख्त खुलासा मानदंड,
- FCRA का प्रभावी प्रवर्तन,
- उल्लंघनों पर कार्रवाई।
परिणाम:
- तेज़ी से परियोजना क्रियान्वयन,
- राजमार्गों, बंदरगाहों, रेल और नवीकरणीय ऊर्जा में उछाल,
- मैन्युफैक्चरिंग और स्टार्टअप्स का विकास,
- प्रमुख क्षेत्रों में आयात-निर्भरता में कमी।
4) प्रतिरोध और नया गठजोड़
नियामक सख्ती बढ़ने पर:
- प्रभावित नेटवर्कों ने राजनीतिक विपक्ष के साथ तालमेल बढ़ाया,
- आर्थिक सुधारों को जनविरोधी या पर्यावरण-विरोधी बताने की कोशिश हुई,
- रणनीतिक क्षेत्रों में विरोध और मुक़दमेबाज़ी बढ़ी।
यह अभिसरण साझा हितों को दर्शाता है:
- प्रभाव बनाए रखना,
- पुराने गेटकीपिंग ढाँचों को पुनर्जीवित करना,
- वैश्विक वैल्यू चेन में भारत के उदय को धीमा करना।
5) आज इसका महत्व: भारत की वैश्विक स्थिति
- भारत की तेज़ वृद्धि स्थापित आर्थिक शक्तियों को चुनौती देती है।
बुनियादी ढांचा और औद्योगिक क्षमता से मिलती है:
- रणनीतिक स्वायत्तता,
- रोजगार सृजन,
- तकनीकी क्षमता,
- भू-राजनीतिक प्रभाव।
जो देश भारत को केवल बाज़ार मानते थे, अब उसे प्रतिस्पर्धी और साझेदार के रूप में देख रहे हैं।
6) नागरिकों की भूमिका: सूचित समर्थन
राष्ट्रीय विकास का समर्थन मतलब:
- सरकार, एनजीओ और कॉरपोरेट—सबसे पारदर्शिता की मांग,
- नियम-आधारित नियमन का समर्थन, न कि अंधाधुंध प्रतिबंध,
- वास्तविक कल्याण और अवरोधवाद में अंतर करना।
लोकतंत्र मजबूत होता है जब नागरिक:
- रचनात्मक प्रश्न पूछते हैं,
- दुष्प्रचार को खारिज करते हैं,
- दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देते हैं।
निर्भरता से नेतृत्व की ओर
- निर्भरता से आत्मनिर्भरता की भारत की यात्रा के लिए नीतिगत साहस, संस्थागत सुधार और नागरिकों का विश्वास आवश्यक था। विदेशी प्रभावों का नियमन अलगाववाद नहीं—यह संप्रभुता है।
- सुरक्षाओं के साथ विकास शोषण नहीं—यह अवसर के माध्यम से सम्मान है।
भारत को वैश्विक नेता (विश्वगुरु) बनने के लिए—जो शांति, सौहार्द और साझा समृद्धि का पक्षधर हो—आने वाले दशकों में सुसंगत, ईमानदार शासन और सूचित जनसमर्थन अनिवार्य है। विकल्प विकास और मूल्यों के बीच नहीं, बल्कि जड़ता और जिम्मेदार प्रगति के बीच है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
Read our previous blogs 👉 Click here
Join us on Arattai 👉 Click here
👉Join Our Channels 👈
