सारांश:
- यह विस्तृत विश्लेषण मोहनदास करमचंद गांधी और जवाहरलाल नेहरू के तथाकथित ‘महात्मा’ और ‘आदर्शवादी’ मुखौटों को पूरी तरह से उतारकर उनके हिंदू-विरोधी फैसलों, व्यक्तिगत अनैतिकताओं और औपनिवेशिक ताकतों के साथ उनकी साठगांठ की गहन विवेचना करता है।
- आलेख में गांधी की पुस्तक ‘माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ‘ और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के हवाले से उनके व्यक्तिगत जीवन के स्याह पहलुओं, ‘लिबिडो’ को बढ़ाने के लिए बकरी के दूध के गुप्त उपयोगों और ब्रह्मचर्य के नाम पर कमसिन लड़कियों के मनोवैज्ञानिक व शारीरिक शोषण को रेखांकित किया गया है।
- साथ ही, यह नैरेटिव इस बात को सप्रमाण उजागर करता है कि कैसे गांधी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल जैसे महान राष्ट्रनायकों का दमन कर एक अयोग्य नेहरू को देश पर थोपा।
- अंततः, विभाजन की विभीषिका में लाखों हिंदुओं के नरसंहार और महिलाओं के बलात्कार के लिए गांधीवादी नीतियों को उत्तरदायी ठहराते हुए, राष्ट्रभक्त नाथूराम गोडसे द्वारा किए गए वध को इतिहास के एक अनिवार्य ईश्वरीय न्याय के रूप में स्थापित किया गया है।
बगुला भगत का मुखौटा
I. ब्रह्मचर्य का ढोंग और व्यक्तिगत विलासिता: गांधी के ‘सत्य के प्रयोगों’ का वीभत्स सच
भारत के आधुनिक इतिहास में जिस व्यक्ति को जबरन ‘राष्ट्रपिता’ और ‘महात्मा’ की उपाधियों से अलंकृत कर देश की चेतना पर थोपा गया, उसका व्यक्तिगत जीवन नैतिक पतन और गहरे अंतर्विरोधों से भरा हुआ था। गांधी की अहिंसा और सादगी का ढोंग असल में बहुसंख्यक हिंदू समाज को वैचारिक रूप से पंगु बनाने और अपनी व्यक्तिगत विकृतियों को छिपाने का एक सोचा-समझा तंत्र था।
- कमसिन लड़कियों का मनोवैज्ञानिक और शारीरिक शोषण: गांधी बुढ़ापे में अपने ब्रह्मचर्य की परीक्षा लेने के नाम पर अपनी सगी पोती की उम्र की नाबालिग और युवा लड़कियों (जैसे मनु, आभा और सुशीला नायर) के साथ नग्न सोते थे। यह कोई बाहरी आरोप नहीं है, बल्कि स्वयं गांधी ने अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ‘ और उनके निजी सचिव रहे प्यारेलाल ने अपने संस्मरणों में पूरी बेशर्मी से स्वीकार किया है। एक वृद्ध और शक्तिशाली राजनेता द्वारा आध्यात्मिक प्रयोगों के नाम पर युवा लड़कियों की मानसिक और शारीरिक निजता का इस तरह इस्तेमाल करना सरासर नैतिक और मनोवैज्ञानिक शोषण था।
- बकरी के दूध का कामोत्तेजक रहस्य: गांधी की सादगी के नाम पर हमेशा उनकी बकरी का महिमामंडन किया गया। यहाँ तक कि जब वे अंग्रेजों की जेलों में बंद होते थे, तब भी औपनिवेशिक सरकार उनके लिए विशेष रूप से बकरी के दूध का प्रबंध करती थी। आधुनिक पोषण विज्ञान, आयुर्वेद और जीव विज्ञान के अनुसार, बकरी के दूध में गाय या भैंस की तुलना में मध्यम-श्रृंखला फैटी एसिड (MCFAs) और विशिष्ट खनिज अत्यधिक मात्रा में होते हैं, जो सीधे तौर पर पुरुषों में ‘टेस्टोस्टेरोन’ (Testosterone) के स्तर को बढ़ाते हैं और ‘लिबिडो’ (कामेच्छा) को तीव्र करते हैं। ब्रह्मचर्य की कसमें खाने वाले और वासना से ऊपर उठने का दावा करने वाले व्यक्ति द्वारा इस विशेष दूध का सेवन असल में अपने ‘ब्रह्मचर्य प्रयोगों’ के लिए शारीरिक क्षमता और कामेच्छा को बनाए रखने का एक गुप्त शगल था।
- जोसेफ लेलीवेल्ड का अंतरराष्ट्रीय प्रामाणिक खुलासा: न्यूयॉर्क टाइम्स के पुलित्जर पुरस्कार विजेता विख्यात पत्रकार जोसेफ लेलीवेल्ड ने अपनी पुस्तक ‘ग्रेट सोल: महात्मा गांधी एंड हिज स्ट्रगल विद इंडिया‘ में गांधी के चरित्र की धज्जियां उड़ा दी हैं। लेखक ने सप्रमाण सिद्ध किया है कि गांधी का अपने दक्षिण अफ्रीकी मित्र और बॉडीबिल्डर हरमन कालेनबाक के साथ समलैंगिक और अत्यधिक संदेहास्पद संबंध था। लेलीवेल्ड का स्पष्ट कहना है कि उन्होंने अपने मन से कुछ नहीं लिखा, बल्कि सारे अकाट्य सबूत और गांधी के प्रेम-पत्र स्वयं भारत के अभिलेखागारों में मौजूद और प्रकाशित हैं। यह अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज़ीकरण साबित करता है कि जिसे ‘संत’ प्रचारित किया गया, वह वास्तव में गहरे चारित्रिक दोषों से ग्रसित था।
II. सत्ता लोलुपता और राष्ट्रनायकों का दमन: नेहरू को थोपने की व्यूह रचना
गांधी को भली-भांति ज्ञात था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैश्विक परिस्थितियों और कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना ही होगा। इसलिए, उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा स्वतंत्रता संग्राम से अधिक इस बात पर केंद्रित की कि अंग्रेजों के जाने के बाद देश की सत्ता का रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथ में रहे। इसके लिए उन्होंने हर उस राष्ट्रभक्त नेता को राजनीति से उखाड़ फेंका जो उनके सामने झुकने को तैयार नहीं था।
- त्रिपुरी संकट (1939) और नेताजी के साथ विश्वासघात: 1939 के कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने गांधी के आधिकारिक उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को लोकतांत्रिक तरीके से परास्त कर दिया था। इस लोकतांत्रिक परिणाम को पचाने में असमर्थ गांधी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार घोषित कर दिया। उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति के भीतर अपने चमचों के ज़रिए ऐसा गतिरोध और आंतरिक विद्रोह पैदा किया कि नेताजी को अंततः क्षुब्ध होकर अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। गांधी कभी नहीं चाहते थे कि कोई ऐसा स्वाभिमानी और सशक्त सैन्य रणनीतिकार भारत का नेतृत्व करे, जो उनके ‘अहिंसा के कायरतापूर्ण ढोंग’ को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दे।
- सरदार वल्लभभाई पटेल का लोकतांत्रिक अधिकार छीनना: 1946 में जब आजाद भारत के भावी प्रधानमंत्री (कांग्रेस अध्यक्ष) के चुनाव की बारी आई, तो इतिहास का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक फ्रॉड किया गया। कांग्रेस की 15 प्रांतीय समितियों में से 12 समितियों ने सर्वसम्मति से लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम का प्रस्ताव रखा था। जवाहरलाल नेहरू को एक भी समिति का समर्थन प्राप्त नहीं था। इसके बावजूद, अपनी मुस्लिम-परस्त और अंग्रेजों के एजेंट जैसी मानसिकता के कारण गांधी ने पटेल पर अनुचित दबाव बनाया और उनका नाम जबरन वापस करवाकर एक ‘बिलो एवरेज’ और अयोग्य नेहरू को देश की कमान सौंप दी। यह भारत के बहुसंख्यक समाज की पीठ में घोंपा गया सबसे बड़ा खंजर था।
III. नेहरू-गांधी गठजोड़ और ‘माउंटबेटन’ ट्राइएंगल का स्याह सच
जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने के पीछे गांधी का एक विशेष उद्देश्य था। दोनों की पाश्चात्य मानसिकता, मुस्लिम-परस्ती और व्यक्तिगत जीवन की कमजोरियां पूरी तरह एक जैसी थीं। गांधी को एक ऐसा ‘स्टैम्प प्रधानमंत्री’ चाहिए था जिसका रिमोट कंट्रोल वे अपने हाथ में रख सकें।
- अंग्रेजों के मानसिक और सांस्कृतिक गुलाम: नेहरू का लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा पूरी तरह से हैरो और ट्रिनिटी कॉलेज के ब्रिटिश माहौल में हुई थी। वे भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए व्यक्ति थे, जो केवल चमड़ी से भारतीय थे लेकिन अपनी आत्मा और सोच से पूरी तरह ब्रिटिश थे। अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाते समय एक ऐसे ही शासक की आवश्यकता थी, जो उनके जाने के बाद भी भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखे और उनकी विभाजनकारी नीतियों को जारी रखे। नेहरू इस मापदंड पर पूरी तरह खरे उतरते थे।
- माउंटबेटन दंपति के साथ अनैतिक संबंधों का राज: जैसा कि आधुनिक इतिहासकारों और स्वयं माउंटबेटन की बेटी पामेला माउंटबेटन की डायरियों से पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है, नेहरू के संबंध लॉर्ड माउंटबेटन और लेडी एडविना माउंटबेटन दोनों के साथ अत्यधिक घनिष्ठ और संदेहास्पद थे। अंग्रेजों के मुहावरे में कहें तो नेहरू को ‘ब्रॉड गेज’ और ‘मीटर गेज’ दोनों रेल पटरियां पसंद थीं—अर्थात वे पुरुष और महिला दोनों के प्रति समान रूप से आकर्षित होते थे। लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन ने नेहरू की इसी कामुक कमजोरी का पूरा फायदा उठाया और भारत के विभाजन की रूपरेखा को अपने हिसाब से तय करवाया। नेहरू देशहित को ताक पर रखकर लेडी माउंटबेटन के प्रेम में अंधे थे, और गांधी इस पूरे राष्ट्रीय तमाशे को मूक सहमति दे रहे थे क्योंकि वे खुद भी इसी ढर्रे और मर्ज के शिकार थे।
IV. विभाजन का महापाप और हिंदुओं का नरसंहार: गांधीवादी कायरता का दर्शन
1947 का विभाजन आधुनिक इतिहास का सबसे रक्तरंजित और वीभत्स अध्याय है। ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल’ का झूठा नारा देने वाले गांधी असल में उस नरसंहार, बलात्कार और विस्थापन के सबसे बड़े सूत्रधार और खलनायक थे।
- हिंदू नरसंहार पर गांधी की क्रूर और वीभत्स चुप्पी: जब नोआखली, पंजाब और पूरे बंगाल में लाखों हिंदुओं को गाजर-मूली की तरह काटा जा रहा था, जब हिंदू महिलाओं का सरेआम शीलभंग हो रहा था और उनके स्तनों को काटा जा रहा था, तब गांधी हिंदुओं को उपदेश दे रहे थे कि “यदि मुसलमान तुम्हें मारना चाहते हैं, तो तुम्हें शांति से मर जाना चाहिए।” गांधी के इस आत्मघाती और कायरतापूर्ण दर्शन ने हिंदुओं को आत्मरक्षा के अधिकार से भी वंचित कर दिया, जिसके कारण लाखों सनातनी बिना किसी प्रतिरोध के मारे गए।
- पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने की अनैतिक ज़िद: विभाजन के तुरंत बाद जब पाकिस्तान ने कबाइलियों के भेष में कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और भारतीय सैनिकों की हत्या कर रहा था, तब भी गांधी भारत सरकार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए। उनकी ज़िद थी कि भारत सरकार पाकिस्तान को तुरंत 55 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दे। जो व्यक्ति अपने देश के सैनिकों के खून की कीमत पर दुश्मन देश को वित्तीय ऑक्सीजन दिलवाने के लिए अपनी सरकार को ब्लैकमेल करे, उसे ‘राष्ट्रपिता’ कहना इस राष्ट्र और सेना का सबसे बड़ा अपमान है।
- लाखों शरणार्थियों की त्रासदी के मुख्य जिम्मेदार: गांधी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतियों का ही परिणाम था कि करोड़ों हिंदुओं को अपनी सदियों पुरानी जमीन, धन-दौलत और सम्मान छोड़कर रातों-रात शरणार्थी शिविरों में रहने पर मजबूर होना पड़ा। गांधी ने देश की अखंडता की बलि केवल अपने झूठे ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अंतरराष्ट्रीय नायक’ की छवि को बनाए रखने के लिए दे दी।
V. ईश्वरीय न्याय की पुनर्स्थापना: नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी का वध
इतिहास गवाह है कि जब-जब कोई व्यक्ति अपने अहंकार और कुकर्मों से किसी महान राष्ट्र और संस्कृति के विनाश का कारण बनता है, तब-तब प्रकृति और नियति अपना न्याय अवश्य करती है। विभाजन के उस भीषण पाप और हिंदुओं के रक्त से सने इतिहास का अंत ईश्वरीय न्याय के रूप में होना तय था।
- एक राष्ट्रभक्त का अंतिम और कठिन विकल्प: वीर नाथूराम गोडसे कोई पेशेवर अपराधी, लुटेरे या उन्मादी नहीं थे। वे एक प्रखर देशभक्त, प्रबुद्ध संपादक, विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता थे जो भारत माता की अखंडता के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। जब उन्होंने देखा कि गांधी की मुस्लिम-परस्त और तुष्टिकरण की नीतियां बचे-कुचे भारत के भी और टुकड़े करवा देंगी और सनातन संस्कृति का समूल नाश कर देंगी, तो उन्होंने अपने जीवन, परिवार और भविष्य की आहुति देने का निर्णय लिया।
- वध, हत्या नहीं: इतिहास का अनिवार्य प्रतिकार: ३० जनवरी १९४८ को चली वे तीन गोलियां किसी व्यक्ति की हत्या नहीं थीं, बल्कि भारत की अखंडता, संप्रभुता और सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया एक अनिवार्य और ऐतिहासिक वैचारिक प्रतिकार था। नाथूराम गोडसे ने ईश्वरीय प्रेरणा से अभिभूत होकर इस पापी और खलनायक का वध किया और देश को और अधिक खंडित होने से बचा लिया। गोडसे ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया, लेकिन भारत माता के चरणों में अपनी निष्ठा को कलंकित नहीं होने दिया। इतिहास भले ही नेहरूवादी इतिहासकारों के दबाव में झूठ लिखता रहा हो, लेकिन आज का जागृत भारत इस सच को अच्छी तरह पहचानता है।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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