ऑपरेशन ऑक्टोपस भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की शक्ति और रणनीतिक परिपक्वता का एक निर्णायक उदाहरण है। यह केवल किसी एक संगठन के विरुद्ध की गई कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में आए एक मौलिक और दूरगामी बदलाव का प्रतीक थी। इस अभियान ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब केवल प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण पर निर्भर नहीं है, बल्कि खुफिया सूचनाओं पर आधारित पूर्व-निवारक रणनीति को प्राथमिकता दे रहा है। विचारधारा, वित्तीय ढांचे और संगठित नेटवर्क को एक साथ निशाना बनाकर यह सिद्ध किया गया कि आंतरिक सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता और लोकतांत्रिक स्थिरता का मूल आधार है।
ऑपरेशन ऑक्टोपस
खंड 1: प्रस्तावना — एक कार्रवाई नहीं, एक सिद्धांत
- ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ केवल पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के विरुद्ध की गई एक जांच या गिरफ्तारी अभियान नहीं था।
- यह भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में आए मौलिक रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है।
- यह पहली बार था जब किसी कट्टरपंथी संगठन को उसके वैचारिक, वित्तीय, संगठनात्मक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सहित एक साथ निशाना बनाया गया।
यह अभियान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब:
- प्रतिक्रियात्मक नहीं, पूर्व–निवारक (Preventive) नीति पर काम कर रहा है
- केवल हिंसा नहीं, बल्कि विचारधारा और नेटवर्क को भी सुरक्षा खतरा मान रहा है
- राजनीतिक संकोच से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है
खंड 2: PFI का असली स्वरूप — सामाजिक मुखौटा, कट्टर एजेंडा
जांच एजेंसियों के अनुसार PFI का ढांचा अत्यंत सुनियोजित और बहु-स्तरीय था।
बाहरी चेहरा:
- सामाजिक न्याय की भाषा
- अल्पसंख्यक अधिकारों की आड़
- चैरिटी और शिक्षा गतिविधियाँ
- कानूनी सहायता और NGO नेटवर्क
आंतरिक वास्तविकता:
- कट्टर वैचारिक प्रशिक्षण
- युवाओं का योजनाबद्ध ब्रेनवॉश
- “हम बनाम वे” की मानसिकता
- लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास
- समानांतर जमीनी नेटवर्क का निर्माण
यह दोहरा ढांचा PFI को खतरनाक बनाता था, क्योंकि वह लोकतंत्र के भीतर रहकर लोकतंत्र को कमजोर कर रहा था।
खंड 3: राजनीतिक इच्छाशक्ति — निर्णायक तत्व
‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति।
- गृह मंत्रालय के स्तर पर:
- कोई अस्पष्टता नहीं
- कोई दोहरा संदेश नहीं
- कोई तुष्टीकरण नहीं
गृह मंत्री अमित शाह की ओर से स्पष्ट निर्देश था:
- राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है
- कानून के भीतर रहकर कठोर कार्रवाई होगी
- एजेंसियों को पूर्ण राजनीतिक समर्थन मिलेगा
इससे पहले के दौर में:
- कई मामलों में कार्रवाई राजनीतिक गणनाओं में उलझ जाती थी
- एजेंसियाँ निर्णय लेने में हिचकती थीं
इस अभियान ने संकोच और भ्रम के युग का अंत किया।
खंड 4: अभूतपूर्व बहु–एजेंसी समन्वय
- ‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ की सबसे बड़ी विशेषता रहा अभूतपूर्व अंतर–एजेंसी समन्वय।
इसमें शामिल रहीं:
इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB)
- रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW)
- राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA)
- प्रवर्तन निदेशालय (ED)
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
समन्वय के प्रमुख तत्व:
- साझा खुफिया सूचनाएँ
- संयुक्त विश्लेषण
- एकसाथ कई राज्यों में कार्रवाई
- समयबद्ध और चरणबद्ध ऑपरेशन
इस मॉडल ने सिद्ध किया कि भारत अब एकल-एजेंसी कार्यशैली से आगे निकल चुका है।
खंड 5: अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और विदेशी फंडिंग का पर्दाफ़ाश
- जांच में सामने आया कि PFI का नेटवर्क केवल भारत तक सीमित नहीं था।
अंतरराष्ट्रीय कड़ियाँ:
- पश्चिम एशिया
- खाड़ी देश
- तुर्की
विशेष रूप से:
- तुर्की से जुड़े कुछ वैचारिक ढांचे
- मुस्लिम ब्रदरहुड से प्रभावित नेटवर्क
इन माध्यमों से:
- फंडिंग
- वैचारिक सामग्री
- प्रशिक्षण मॉड्यूल भारत में पहुँचाए जा रहे थे।
इन कड़ियों को कानूनी रूप से काटना इस अभियान की ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है।
खंड 6: वित्तीय ढांचे पर सर्जिकल प्रहार
- PFI की सबसे बड़ी ताकत उसका वित्तीय नेटवर्क था।
फंडिंग के तरीके:
- छोटे-छोटे नकद संग्रह
- NGO और चैरिटी की आड़
- हवाला नेटवर्क
- डिजिटल लेन-देन
ED और NIA ने:
- स्रोत
- मध्यस्थ
- और अंतिम उपयोग की पूरी श्रृंखला को जोड़ा।
परिणाम:
- बैंक खाते फ्रीज़
- संपत्तियाँ ज़ब्त
- नकदी जब्त
- फंडिंग चैनल लगभग पूरी तरह निष्क्रिय
यह स्पष्ट हो गया कि बिना धन, कोई भी कट्टर संगठन टिक नहीं सकता।
खंड 7: वैचारिक मोर्चा — असली लड़ाई
जांच एजेंसियों का निष्कर्ष स्पष्ट था:
- कट्टरपंथ की जड़ विचारधारा में होती है।
PFI पर आरोप था कि वह:
- युवाओं को वैचारिक रूप से अलग-थलग करता था
- पीड़ित मानसिकता को बढ़ावा देता था
- संवैधानिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास फैलाता था
- इसीलिए केवल IPC नहीं
- बल्कि UAPA जैसे कानूनों का प्रयोग किया गया
यह संदेश स्पष्ट था कि वैचारिक उग्रवाद भी राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा है।
खंड 8: ऑपरेशनल उत्कृष्टता — शांत लेकिन निर्णायक कार्रवाई
इस अभियान की एक और बड़ी विशेषता रही शांत, सटीक और समन्वित कार्रवाई।
- मैन-टू-मैन मार्किंग
- कवर शैडो तकनीक
- एक साथ कई राज्यों में छापे
- गिरफ्तारी से पहले नेटवर्क को फ्रीज़
इससे:
- कोई बड़ी हिंसक प्रतिक्रिया नहीं हुई
- कानून-व्यवस्था पर दबाव नहीं पड़ा
यह भारतीय एजेंसियों की पेशेवर क्षमता और अनुभव को दर्शाता है।
खंड 9: आलोचनाएँ और सरकार का स्पष्ट पक्ष
कुछ वर्गों ने:
- नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर सवाल उठाए।
सरकार और एजेंसियों का रुख स्पष्ट रहा:
- कार्रवाई किसी समुदाय के खिलाफ नहीं
- बल्कि कानून तोड़ने वाले संगठनों और व्यक्तियों के खिलाफ है
- हर कदम विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत उठाया गया
- किसी निर्दोष को निशाना नहीं बनाया गया
लोकतंत्र का अर्थ अराजकता की अनुमति नहीं होता।
खंड 10: भारत की सुरक्षा नीति का बेंचमार्क
आज:
- PFI का संगठनात्मक ढांचा लगभग ध्वस्त है
- शीर्ष नेतृत्व हिरासत में है
‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ को भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति का बेंचमार्क ऑपरेशन माना जा रहा है।
यह अभियान बताता है कि:
- लोकतंत्र और सुरक्षा विरोधी नहीं हैं
- इच्छाशक्ति और कानून का सही उपयोग निर्णायक होता है
- भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, निर्णायक कार्रवाई करता है
‘ऑपरेशन ऑक्टोपस’ भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और रणनीतिक परिपक्वता का प्रतीक बन चुका है।
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