टूटे आश्वासन, तुष्टिकरण और जागरूक नागरिकता की आवश्यकता
SECTION 1: विभाजन का टूटा हुआ भरोसा
- रावलपिंडी, लाहौर, सियालकोट, मुल्तान, नोआखली और पंजाब में हुई हिंसा कोई अचानक हुआ उपद्रव नहीं थी—यह बिना सुरक्षा दिए गए झूठे आश्वासनों पर टिके भरोसे का पतन था।
- जिन समुदायों ने राजनीतिक वादों पर विश्वास किया, उन्हें निहत्था कर दिया गया, अलग-थलग कर दिया गया और अंततः नष्ट कर दिया गया।
इतिहास ने एक कठोर सबक दिया: सुरक्षा केवल शब्दों पर निर्भर नहीं हो सकती।
SECTION 2: दो-राष्ट्र सिद्धांत और उसके अंतर्विरोध
विभाजन इस तर्क पर किया गया कि हिंदू और मुस्लिम साथ नहीं रह सकते, इसलिए दो राष्ट्र आवश्यक हैं। लेकिन विभाजन के बाद—
- भारत में बड़ी मुस्लिम आबादी को बनाए रखा गया, बिना वास्तव में समान कानून और समान जवाबदेही लागू किए।
- पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं के अधिकार लगातार समाप्त होते गए, जिन पर दुनिया लगभग मौन रही।
भारत ने मानवीय त्रासदी का भार उठाया, जबकि राजनीतिक समझौतों ने आंतरिक संतुलन को प्रभावित किया।
SECTION 3: कांग्रेस, आश्वासन और तुष्टिकरण
स्वतंत्रता के बाद नेतृत्व ने एकता और सुरक्षा के बार-बार आश्वासन दिए, लेकिन हिंदुओं के लिए संस्थागत संरक्षण कमजोर रहा। आलोचकों के अनुसार कांग्रेस ने—
- वास्तविक सुरक्षा के स्थान पर प्रतीकों को तरजीह दी,
- चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता अपनाई,
- मुस्लिम वोट-बैंक के लिए हिंदू संस्थाओं और अधिकारों को सीमित किया।
इससे विश्वासघात की गहरी भावना बनी—वादे तो बहुत थे, पर जवाबदेही नहीं।
SECTION 4: वोट-बैंक राजनीति की दीर्घकालिक कीमत
दशकों की तुष्टिकरण राजनीति के परिणामस्वरूप—
- कट्टरपंथ से निपटने में हिचक,
- असमान कानूनी ढांचे,
- पड़ोसी देशों में हिंदुओं के उत्पीड़न पर चुप्पी देखने को मिली।
नतीजा रहा—सुरक्षा के बिना ध्रुवीकरण।
SECTION 5: 2014—दिशा में बदलाव
2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शासन को समर्थक एक सुधार के रूप में देखते हैं—
- तुष्टिकरण नहीं, पहचान से ऊपर कानून,
- आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख,
- सार्वभौमिक कल्याण और कानूनी सुधार,
- संविधान के दायरे में सांस्कृतिक आत्मविश्वास।
SECTION 6: बाहरी बनाम आंतरिक खतरे
- बाहरी खतरों से निपटना राज्य का काम है—सेना, कूटनीति और अर्थव्यवस्था के माध्यम से।
- आंतरिक खतरे—कट्टर नेटवर्क, दुष्प्रचार और राष्ट्र-विरोधी तंत्र—से निपटने के लिए कानून के दायरे में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।
निष्क्रिय समाज लोकतंत्र को भीतर से कमजोर करता है।
SECTION 7: धर्म, कर्तव्य और कानून
सनातन धर्म अहिंसा सिखाता है, असहायता नहीं। भगवद्गीता कर्तव्य पर बल देती है—अधर्म का प्रतिकार नैतिक और कानूनी तरीकों से:
- संस्थाएँ, भीड़ नहीं
- न्याय, बदला नहीं
- तैयारी, घबराहट नहीं
आज धर्म की रक्षा का अर्थ है संवैधानिक व्यवस्था और समान कानून की रक्षा।
स्मृति ही सुरक्षा है
- विभाजन को याद रखना नफ़रत फैलाने के लिए नहीं, बल्कि दोहराव रोकने के लिए है।
- बिना कार्रवाई के आश्वासन समाजों को नष्ट कर देते हैं।
सरकार बाहरी शत्रुओं से निपट सकती है— आंतरिक क्षय को केवल जागरूक, एकजुट नागरिक ही रोक सकते हैं।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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