सारांश
- यह आलेख समकालीन भारतीय राजनीति और बौद्धिक विमर्श में हाशिए पर जा चुके वामपंथी विचारकों, अर्बन नक्सल मानसिकता के पोषकों और राजनैतिक फिक्सरों द्वारा चलाए जा रहे “लोकतंत्र खतरे में है” के नैरेटिव का एक गहरा और तीखा शल्य-चिकित्सात्मक विश्लेषण (Surgical Analysis) करता है।
- आलेख रेखांकित करता है कि कैसे साल 2014 के बाद देश में ‘बिचौलिए राज’ और ‘लुटियंस फिक्सर ईको-सिस्टम’ का पूरी तरह से अंत हुआ है, जिससे इस विशिष्ट वर्ग में अपनी खोई हुई मलाईदार व्यवस्था और विशेषाधिकारों को लेकर गहरी छटपटाहट है।
- इस विमर्श के सबसे घिनौने और विरोधाभासी पहलू को उजागर करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि दूसरों के निर्दोष बच्चों को सड़कों पर कानून हाथ में लेने, हिंसक आंदोलन करने और पुलिस की लाठियां-गोलियां खाने के लिए उकसाने वाले इन स्वघोषित विचारकों के अपने बच्चे विदेशों और महानगरों में अत्यंत सुरक्षित, आलीशान और विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं।
- अंततः, यह आलेख स्पष्ट करता है कि आधुनिक भारत का जागरूक और सोशल मीडिया युग का युवा अब इन व्यक्तिगत अहंकारों और एजेंडा-आधारित टूलकिट्स से आगे बढ़कर राष्ट्रवाद, सुशासन, आंतरिक सुरक्षा और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पथ पर दृढ़ता से अग्रसर है।
वामपंथी दोगलापन का संपूर्ण यथार्थ
1. परिप्रेक्ष्य: ‘सड़क पर उतरो’ का राग और आधुनिक भारत का विरोधाभास
समकालीन भारतीय राजनीति, बौद्धिक गलियारों और मुख्यधारा के विमर्श तंत्र में वर्तमान समय में एक बेहद विचित्र, अमानवीय और विरोधाभासी तमाशा देखने को मिल रहा है। यह एक ऐसा विरोधाभास है जहाँ सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई पूरी तरह से उजागर हो चुकी है।
- हाशिए पर आ चुके तत्वों की छटपटाहट: सत्तर की उम्र पार कर चुके पराजित वामपंथी विचारक, अर्बन नक्सली मानसिकता के स्वघोषित पैरोकार, और जनता द्वारा लोकतांत्रिक चुनावों में पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिए गए राजनैतिक फिक्सर रोज़ाना वातानुकूलित (AC) टीवी स्टूडियो, विदेशी मीडिया के मंचों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और प्रायोजित प्रेस कॉन्फेंसों में एक ही घिसा-पिटा और बदबूदार राग अलाप रहे हैं।
- सुनियोजित और एजेंडा-आधारित नैरेटिव: उनका यह नैरेटिव बेहद सुनियोजित और टूलकिट-आधारित है कि देश में लोकतंत्र पूरी तरह समाप्त हो चुका है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मरणशैया पर है और अब देश की संवैधानिक संस्थाएं इसे बचाने में सक्षम नहीं हैं। उनके नैरेटिव के अनुसार, देश का सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, केंद्रीय जांच एजेंसियां और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पंगु हो चुकी है।
- आम युवाओं को ढाल बनाने की साजिश: इस कथित संकट का समाधान वे यह बताते हैं कि अब देश की जनता को और विशेषकर देश के आम, गरीब और मध्यमवर्गीय युवा वर्ग को अपने घरों, कॉलेजों और रोजगार को छोड़कर बाहर निकलना होगा, सड़कों को बंधक बनाना होगा, कानून व्यवस्था को चुनौती देनी होगी, पुलिस की लाठियों का सामना करना होगा और अगर जरूरत पड़े तो ‘इंकलाब’ के नाम पर अपने सीने पर गोलियां भी खानी होंगी।
- आत्ममुग्धता और भयानक दोगलापन: लेकिन जब इस तथाकथित ‘इंकलाब’, ‘प्रतिरोध’, ‘सत्याग्रह’ और ‘खूनी क्रांति’ के नारों की परतों को एक-एक कर उलटकर देखा जाता है, तो इसके पीछे छिपी वैचारिक खोखलापन, व्यक्तिगत अहंकार, जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटना और भयानक दोगलापन (Hypocrisy) पूरी तरह बेनकाब हो जाता है। यह विमर्श किसी देशहित, मानवाधिकार या लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए नहीं है, बल्कि एक हारे हुए, अप्रासंगिक और सत्ता-च्युत हो चुके वर्ग की कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन है।
2. विशेषाधिकार प्राप्त ‘इको-सिस्टम’ का पतन और लुटियन दिल्ली की कराह
पिछले एक दशक में भारत के राजनैतिक, प्रशासनिक, न्यायिक और सामाजिक ढांचे में जो सबसे बड़ा क्रांतिकारी और व्यवस्थागत बदलाव आया है, वह है उस अदृश्य ‘फिक्सर राज’ और ‘चमचा-युग’ का अंत, जिसने दशकों तक देश की नीतियों, राष्ट्रीय संसाधनों, बौद्धिक विमर्श और मीडिया नैरेटिव को बंधक बना रखा था।
क) ‘अंदरखाने’ के खेल का पूरी तरह अंत होना
- साल 2014 से पहले का भारत एक ऐसे अदृश्य सिंडिकेट द्वारा चलाया जाता था, जिसकी पैठ मीडिया घरानों, न्यायपालिका के गलियारों, वरिष्ठ नौकरशाही, नीति-निर्धारक संस्थाओं और पूरे अकादमिक तंत्र (Ecosystem) में इतनी गहरी थी कि देश में सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उनका “अंदरखाने” का खेल कभी बंद नहीं होता था।
- देश की नीति, बजट के प्रावधान और राजनैतिक दिशा संसद या मंत्रालयों में तय होने के बजाय लुटियंस दिल्ली के बंद कमरों, फाइव-स्टार क्लबों, लक्जरी रिसॉर्ट्स और चुनिंदा लुटियंसी पत्रकारों के ड्राइंग रूम्स में तय की जाती थीं। यह एक ऐसा समानांतर ईको-सिस्टम था, जो खुद को देश के कानून और लोकतांत्रिक जवाबदेही से भी ऊपर समझता था।
ख) एक फोन कॉल की सत्ता और बिचौलिया राज का साम्राज्य
- वह एक ऐसा दौर था जब इस खास लॉबी के एक फोन कॉल पर बड़े-बड़े राष्ट्रीय मीडिया चैनल्स की मुख्य सुर्खियां बदल दी जाती थीं, एजेंडा तय किया जाता था और शीर्ष स्तर के अफसर व ‘लाट साहब’ इन विचारकों के सामने लाइन लगाकर खड़े हो जाते थे।
- इसी बिचौलिया युग की छत्रछाया में बड़े-बड़े वित्तीय अपराधियों और क्रोनी कैपिटलिस्टों को देश के राष्ट्रीयकृत बैंकों से बिना किसी ठोस गारंटी के, केवल एक राजनैतिक सिफारिश और फोन कॉल के आधार पर लाखों-करोड़ों रुपये के लोन (Phone Banking) आसानी से मिल जाया करते थे। पूरी शासन व्यवस्था देश के आम नागरिक के प्रति जवाबदेह होने के बजाय, इस खास बौद्धिक और राजनैतिक सिंडिकेट के हितों की रक्षा करने में व्यस्त रहती थी।
ग) चुनिंदा संवेदनशीलता और संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग
- देश की पुरानी व्यवस्था में जहाँ देश के आम, गरीब और मध्यमवर्गीय नागरिकों के छोटे-छोटे मुकदमे अदालतों में दशकों तक लटके रहते थे और वे न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाते थे, वहीं इस खास लॉबी के लिए नियम-कायदे पूरी तरह अलग थे। देशद्रोह के आरोपियों, खूंखार आतंकवादियों, एजेंडावादियों और विदेशी फंडिंग पर चलने वाले एनजीओ के आकाओं के लिए देश की सर्वोच्च अदालत के दरवाजे आधी रात को भी खोल दिए जाते थे।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लगातार, मजबूत, स्थिर और बहुसंख्यक जनादेश वाले शासनकाल ने इस पूरे बिचौलिए, फिक्सर और चमचा-युग की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी है। आज इस वर्ग को या तो कानून के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया है या फिर उन्हें देश की नीति-निर्धारक व्यवस्था से पूरी तरह बाहर खदेड़ दिया गया है।
- राष्ट्रीय मीडिया अब एकतरफा एजेंडा चलाने और टूलकिट के हिसाब से नाचने के बजाय इनसे तीखे और असहज करने वाले सवाल पूछने लगा है। न्यायपालिका में निहित राजनैतिक स्वार्थों और व्यक्तिगत संबंधों के तहत की जाने वाली ‘केस फिक्सिंग’ अब पूरी तरह मुमकिन नहीं रही है, यही कारण है कि पुराने कानूनी फिक्सरों की अनियंत्रित घुसपैठ अब बंद हो चुकी है।
3. दोहरा मापदंड: खुद के लिए परम विलासिता, दूसरों के बच्चों के लिए लाठी-गोली
इस पूरे वामपंथी, उदारवादी और अराजकतावादी विमर्श का सबसे घिनौना, क्रूर और अमानवीय पहलू इनका व्यक्तिगत दोहरा मापदंड है। दूसरों के निर्दोष बच्चों को ‘क्रांति’ और ‘लोकतंत्र’ के नाम पर कानून हाथ में लेने, राज्य सत्ता के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन करने और पुलिस की लाठियों व गोलियों के सामने अपनी छाती अड़ाने का उपदेश देने वाले ये स्वघोषित ‘क्रांतिकारी’ स्वयं जीवन की सर्वोच्च आलीशान सुख-सुविधाओं में लिपटे हुए हैं।
क) एसी चेंबरों की सुरक्षा बनाम सड़कों पर बहने वाला खून
- जो बौद्धिक और कानूनी एक्टिविस्ट सरेआम देश के युवाओं को भड़काकर जेल जाने, मुकदमों का सामना करने, राष्ट्रीय संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और सड़कों पर व्यापक अराजकता फैलाने का आह्वान करते हैं, वे स्वयं दिल्ली, नोएडा और लुटियंस जोन की करोड़ों-अरबों की आलीशान कोठियों में पूरी तरह सुरक्षित और वातानुकूलित (AC) जीवन व्यतीत करते हैं।
- इस पूरे एलीट वर्ग का इतिहास देखें तो इन्होंने पीढ़ियों से देश की सत्ता, संसाधनों और वीआईपी व्यवस्था की मलाई खाई है। जिस व्यवस्था, संसद और न्यायपालिका को ये आज पंगु और समाप्त बताते हैं, उसी व्यवस्था का सबसे अधिक लाभ उठाकर इन्होंने अपनी अकूत संपत्तियां, वैश्विक संपर्क और राजनैतिक रसूख खड़ा किया है।
ख) अपने बच्चों का अत्यंत सुरक्षित, उज्ज्वल और अंतरराष्ट्रीय भविष्य
- इस अराजकतावादी लॉबी के अपने बच्चे देश और विदेश की मुख्यधारा की पूंजीवादी (Capitalist) व्यवस्था का पूरा लाभ उठाते हुए अत्यंत आलीशान, सुरक्षित और विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं। वे कभी भी देश के किसी भी हिंसक आंदोलन, शाहीन बाग जैसे चक्का जाम, या उग्र प्रदर्शनों की अग्रिम पंक्ति में पुलिस की लाठियां खाते या आंसू गैस के जहरीले गोले झेलते हुए कभी नहीं दिखाई देंगे।
- इस विशिष्ट वर्ग की अगली पीढ़ी अमेरिका, लंदन और यूरोप के महंगे और शीर्ष अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों (जैसे ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, एलएसई) से उच्च शिक्षा प्राप्त करती है। वे कॉर्पोरेट सेक्टर, वैश्विक थिंक-टैंक्स, अंतरराष्ट्रीय कला दीर्घाओं, फिल्म निर्माण, या महंगे कंसल्टेंसी व्यवसायों से जुड़े हुए हैं।
- उनका जीवन अमेरिका और लंदन के महंगे रेस्तरां में छुट्टियां मनाने, वैश्विक मंचों पर भारत विरोधी नैरेटिव बेचने के कूटनीतिक सौदों में व्यस्त रहने और अपनी कला या बौद्धिकता को वैश्विक स्तर पर बेचने के लिए सुरक्षित रखा गया है। वे भारत की संकरी और धूल भरी गलियों में पुलिस से भिड़ने या जेलों की काल कोठरियों में सड़ने के लिए नहीं बने हैं।
ग) देश के आम और गरीब युवाओं को चारे की तरह इस्तेमाल करना
- इस दोगली लॉबी के निशाने पर हमेशा केवल और केवल देश का वह सीधा-साधा, मध्यमवर्गीय या गरीब आम युवा होता है, जो अपनी भावनाओं, वैचारिक अपरिपक्वता और झूठे देशप्रेम के वश में आकर इनके झांसे में आ जाता है। ये विचारक उन निर्दोष युवाओं को वैचारिक रूप से इस कदर दिग्भ्रमित और कट्टरपंथी बना देते हैं कि वे कानून हाथ में ले लेते हैं और जिंदगी भर के लिए अदालतों, मुकदमों और पुलिस थानों के चक्कर काटने के दुष्चक्र में फंस जाते हैं।
- एक बार जब किसी आम युवा पर दंगे, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या अराजकता का आपराधिक मुकदमा दर्ज हो जाता है, तो उसका पूरा भविष्य, उसकी सरकारी नौकरी की संभावनाएं, उसका पासपोर्ट और उसका करियर हमेशा के लिए तबाह हो जाता है। इस विनाश के मलबे पर खड़े होकर ये वामपंथी बुद्धिजीवी विदेशी मीडिया से फंडिंग पाते हैं, ‘ह्यूमन राइट्स’ का रोना रोते हैं और अपने राजनैतिक आकाओं के लिए सत्ता की रोटियां सेंकने का घिनौना अवसर तलाशते हैं।
एक यथार्थवादी और प्रखर आह्वान:
- यदि देश को बचाने और लोकतंत्र को बहाल करने के नाम पर किसी हिंसक आंदोलन या खूनी ‘क्रांति’ की शुरुआत करनी ही है, तो इन विचारकों को सबसे पहले इसकी शुरुआत अपने स्वयं के वातानुकूलित (AC) ड्राइंग रूम से करनी चाहिए।
- उन्हें सबसे पहले अपने बच्चों को विदेशों से बुलाकर सड़कों पर उतारना चाहिए, उनके हाथों में पत्थर थमाने चाहिए और उनसे पुलिस की गोलियां खिलवानी चाहिए। दूसरों के निर्दोष, गरीब और सीधे-साधे बेटों को ‘कुत्ते की मौत’ मरने और जेलों में सड़ने के लिए उकसाना कोई बौद्धिकता या समाजवाद नहीं है, बल्कि यह शुद्ध रूप से एक ‘मानसिक कसाई’ का चरित्र है।
4. नए भारत की जागृत चेतना, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक विजय
ये तथाकथित बुद्धिजीवी, वामपंथी एजेंडावादी और अर्बन नक्सली इस बात को पचा नहीं पा रहे हैं कि समय का चक्र अब पूरी तरह से घूम चुका है। भारत की 140 करोड़ की आबादी और यहाँ का युवा वर्ग अब वैचारिक रूप से पूरी तरह जागृत हो चुका है, और उनका वह पुराना ‘विशेषाधिकार काल’ अब हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में गहरे दफन हो चुका है।
क) जनाधार, नैतिकता और विश्वसनीयता का पूरी तरह लोप हो जाना
- आज भारत के एक सामान्य आम आदमी के मन में भी इन छद्म-बुद्धिजीवियों के प्रति रत्ती भर का सम्मान या श्रद्धा शेष नहीं बची है। सार्वजनिक विमर्श और सोशल मीडिया पर जैसे ही इन तथाकथित विचारकों का नाम आता है, आम जनता के मुंह से स्वतः ही “टूलकिट गैंग”, “अर्बन नक्सल” और “एजेंडावादी” जैसे उपेक्षा के शब्द निकलते हैं।
- इनके पास न तो अब कोई जमीनी और विश्वसनीय संगठन बचा है, न कोई वास्तविक जनाधार है और न ही कोई नैतिक धरातल बचा है जिस पर ये खड़े हो सकें। अब इनके पास सिर्फ एक ही आखिरी हथियार बचा है—वही पुराना, घिसा-पिटा और एक्सपोज हो चुका “लोकतंत्र खतरे में है” वाला नैरेटिव और टूलकिट स्क्रिप्ट, जिसे सुन-सुनकर देश की जनता अब पूरी तरह से उब चुकी है।
ख) अब जनता स्वयं तय करती है देश का वास्तविक एजेंडा
- वह पुराना दौर अब हमेशा के लिए चला गया जब लुटियंस दिल्ली के कुछ नामचीन पत्रकार, राजनैतिक फिक्सर और वामपंथी प्रोफेसर मिलकर पूरे देश का विमर्श और एजेंडा तय कर दिया करते थे। आज का आधुनिक और सूचना तकनीक के युग का जागरूक युवा भली-भांति समझ चुका है कि देश की वास्तविक प्रगति, उसकी आंतरिक सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा, ढांचागत (Infrastructure) विकास और वैश्विक स्तर पर एक आर्थिक व सामरिक महाशक्ति बनने का मार्ग दंगों, अराजकता और सड़कों पर पत्थरबाजी करने से नहीं निकलता।
- देश का विकास केवल और केवल राजनैतिक स्थिरता, सुशासन (Good Governance), नीतिगत स्पष्टता, आर्थिक सुधारों और एक प्रखर, अडिग राष्ट्रवाद से होकर ही गुजरता है। युवा अब स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी, रिसर्च और राष्ट्र-निर्माण में अपनी ऊर्जा लगा रहा है, न कि इन बूढ़े वामपंथियों के बकाए टूलकिट का हिस्सा बनने में।
ग) सांस्कृतिक पुनरुत्थान और अटूट सभ्यतागत संकल्प
- भारत अब इन स्वार्थी, पराजित और कुंठित तत्वों के व्यक्तिगत अहंकार, उनकी चुनावी पराजय की हताशा और सत्ता से दूर रहने की तड़प के रोने से बहुत आगे निकल चुका है। आज का भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर वापस लौट रहा है, वह अपने सभ्यतागत गौरव को पहचान रहा है।
- अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण, काशी-विश्वनाथ धाम का पुनरुत्थान, केदारनाथ-बद्रीनाथ का कायाकल्प और वैश्विक मंचों पर भारत के बढ़ते कूटनीतिक व आर्थिक प्रभाव ने देश के भीतर एक नई ‘सांस्कृतिक चेतना’ और आत्मविश्वास को जन्म दिया है।
- इस नए, जागृत और आत्मनिर्भर भारत में ऐसे राष्ट्रविरोधी तत्वों, उनके द्वारा प्रायोजित टूलकिट्स और उनके विदेशी आकाओं द्वारा चलाए जा रहे वैचारिक व जनसांख्यिकीय युद्ध के लिए अब कोई स्थान शेष नहीं है। देश की जनता अब पूरी तरह से सतर्क है और वह भारत को फिर से अराजकता, दंगों और अस्थिरता की आग में झोंकने की इन वामपंथी साजिशों को किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने देगी।
जय भारत, वन्देमातरम
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