क्या हम वास्तव में जाग रहे हैं… या यह केवल एक भ्रम है?
क्या भव्य मंदिरों का निर्माण और धार्मिक उत्सवों में उमड़ती लाखों की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि सनातन समाज सुरक्षित है?
एक वरिष्ठ वैज्ञानिक और तीन दशकों तक वैश्विक कॉर्पोरेट जगत के शीर्ष पदों पर रहे शोधकर्ता की पैनी दृष्टि से लिखा गया एक ऐसा कड़वा दस्तावेज़, जो हमारे गौरवशाली अतीत की आड़ में छिपे वर्तमान के नागरिक, आर्थिक और सामाजिक खोखलेपन पर सीधा प्रहार करता है।
यह पुस्तक कोई सांत्वना पुरस्कार नहीं है। यह आपके सम्मुख रखा गया एक ऐसा ‘वैचारिक दर्पण’ है जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा:
हमारे उच्च आध्यात्मिक दर्शन और हमारे निम्न नागरिक आचरण के बीच की ऐतिहासिक दूरी क्यों बढ़ती जा रही है?
क्यों भव्य देवालयों के ठीक बाहर की वीथियाँ (सड़कें) सार्वजनिक उदासीनता और नैतिक शून्यता की गवाह हैं?
शारीरिक श्रम से दूरी और ‘परजीवी आर्थिक मानसिकता’ ने हमें किस प्रकार पंगु बना दिया है?
किस प्रकार हमारे अहंकार ने ग्रामीण और वनवासी भाई-बहनों को उपेक्षित छोड़ा, जिससे विदेशी मिशनरी तंत्रों को जनसांख्यिकीय इंजीनियरिंग का रास्ता मिला?
जब भारत चारों ओर से एक अदृश्य हाइब्रिड युद्ध से घिरा है, तब हमारे धनी मठ और आध्यात्मिक गुरु मौन क्यों हैं?
“यदि राष्ट्र की भौतिक भूमि ही सुरक्षित नहीं है, तो आपकी अकूत पूँजी, गगनचुंबी मंदिर और व्यक्तिगत मोक्ष की सारी साधनाएँ आक्रांताओं के बूटों तले धूल में मिला दी जाएँगी।”
यह पुस्तक सनातन समाज को एक ‘असंगठित भीड़’ के भ्रम से बाहर निकालकर ‘रणनीतिक नागरिकता’ और ‘राष्ट्र धर्म’ के अंतिम संधान की ओर ले जाने का एक अचूक, व्यावहारिक और सामरिक ब्लूप्रिंट (Civilizational Blueprint) है।
⚡ इस वैचारिक शंखनाद का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो जाइए!
“हिन्दू समाज का दर्पण” — क्योंकि अब रक्षात्मक होने का नहीं, बल्कि सामरिक रूप से जाग्रत होने का समय है।
॥ जयतु सनातनम् । जयतु भारतम्
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