सारांश
- यह आलेख भारतीय राजनीति के पिछले एक दशक में आए ऐतिहासिक और युग-परिवर्तनकारी बदलावों का एक तटस्थ व तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
- हाल ही में कांग्रेस के एक जमीनी कार्यकर्ता द्वारा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने भरी सभा में कही गई यह बात कि “मोदी को हटाने के चक्कर में देश के तमाम दिग्गजों की राजनीति चली गई,” इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि अब विपक्ष के कार्यकर्ताओं तक को यह समझ आ चुका है कि नरेंद्र मोदी का विरोध दरअसल भारत के उदय और उसकी प्रगति का विरोध बन चुका है।
- प्रधानमंत्री मोदी को हटाने की अंधी जिद में क्षेत्रीय क्षत्रपों, परिवारवादी राजनीति के ध्वजवाहकों और भारत विरोधी वैश्विक ताकतों (पाकिस्तान, चीन, अमेरिका) की पूरी राजनीति धाराशायी हो चुकी है।
- यह आलेख उजागर करता है कि कैसे तुष्टिकरण, वंशवाद और विदेशी टूलकिट के भरोसे चलने वाला इकोसिस्टम 100 करोड़ जागरूक देशभक्त नागरिकों और राष्ट्रवादियों की अटूट ताकत के सामने पूरी तरह विफल साबित हुआ है।
राष्ट्रहित की शाश्वत विजय
1. विपक्ष के भीतर से उठती स्वीकारोक्ति: कांग्रेस कार्यकर्ता का कड़वा सच
यह कोई भारतीय जनता पार्टी (BJP), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) या किसी ‘मोदी समर्थक’ का दावा नहीं है, बल्कि यह वह कड़वा सच है जो खुद कांग्रेस पार्टी के एक कार्यकर्ता ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने भरी सभा में स्वीकार किया है:
- राजनीतिक आत्मचिंतन का क्षण: विपक्ष के जमीनी कार्यकर्ताओं को अब स्पष्ट दिखने लगा है कि केवल एक व्यक्ति—नरेंद्र मोदी—के विरोध के नाम पर गढ़ी गई राजनीति ने उनकी अपनी पार्टियों का जनाधार पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
- अंधी जिद का हश्र: ‘मोदी को हटाने’ का जो नैरेटिव पिछले 12 वर्षों से चलाया जा रहा था, उसने किसी और का नहीं, बल्कि खुद विरोधी दलों के राजनीतिक अस्तित्व का सर्वनाश किया है।
- जनता की नब्ज से कटे नेता: यह बयान इस बात का जीवंत प्रमाण है कि विपक्षी नेतृत्व अपनी जनता के मानस को समझने में पूरी तरह विफल रहा और उसने देशहित को ताक पर रखकर केवल व्यक्तिगत द्वेष और नफरत पर आधारित राजनीति की।
2. धाराशायी होता परिवारवाद और क्षेत्रीय क्षत्रपों का पतन
मोदी विरोध के इस दौर में भारतीय राजनीति के उन तमाम छत्रपों और वंशवादी घरानों का राजनीतिक वजूद ताश के पत्तों की तरह बिखर गया, जिन्होंने दशकों तक तुष्टीकरण, जातिगत समीकरणों और भ्रष्टाचार के बल पर सत्ता का सुख भोगा:
- लालू और मुलायम की जातीय राजनीति का अंत: बिहार और उत्तर प्रदेश में दशकों तक ‘M-Y’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण और जातिगत विभाजन के सहारे राज करने वाले लालू प्रसाद यादव और स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की पारंपरिक राजनीति का दौर मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ और राष्ट्रवाद के आगे पूरी तरह समाप्त हो गया।
- शाही घराने का पतन: देश पर दशकों तक एकछत्र राज करने वाले नेहरू-गांधी परिवार (कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व) का राजनीतिक प्रभाव अब अपने सबसे निचले पायदान पर पहुँच चुका है।
- ठाकरे, पवार और अब्दुल्ला की विरासत ध्वस्त:
- महाराष्ट्र में अपनी वैचारिक विरासत का सौदा करने वाले ठाकरे घराने और अवसरवादी राजनीति के प्रतीक शरद पवार का जनाधार बिखर चुका है।
- जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के सहारे अपनी समानांतर सत्ता और अलगाववाद को खाद-पानी देने वाले अब्दुल्ला घराने की राजनीतिक धमक हमेशा के लिए ठंडी पड़ चुकी है।
3. भारत का बढ़ता वैश्विक कद: पाकिस्तान, चीन और अमेरिका की हेकड़ी का अंत
मोदी विरोध केवल देश की सीमाओं तक सीमित नहीं था; इसमें कई विदेशी ताकतें और भारत विरोधी वैश्विक इकोसिस्टम भी शामिल था, लेकिन हर मोर्चे पर भारत की जीत हुई:
- पाकिस्तान की परमाणु धमकी की हवा निकली: सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयरस्ट्राइक और कड़े कूटनीतिक रुख ने पाकिस्तान के प्रायोजित आतंकवाद और उसकी खोखली परमाणु धमकियों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
- चीन के सबसे बड़े बाजार और विस्तारवाद पर करारी चोट: डोकलाम से लेकर गलवान तक भारत की अडिग रक्षा नीति ने चीन के विस्तारवाद को पीछे हटने पर मजबूर किया। साथ ही, डिजिटल स्ट्राइक और आत्मनिर्भर भारत ने चीनी व्यापारिक प्रभुत्व को बड़ा झटका दिया।
- अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों की ऐंठ खत्म: वैश्विक भू-राजनीति में भारत ने पश्चिमी दबाव और विदेशी निर्देशों को खारिज करते हुए अपनी स्वतंत्र और मजबूत विदेश नीति (‘India First’) का लोहा पूरी दुनिया से मनवाया है।
4. गद्दार, विदेशी टूलकिट और 100 करोड़ देशवासियों की अभेद्य दीवार
जब लोकतांत्रिक और चुनावी तरीकों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परास्त नहीं किया जा सका, तो राष्ट्रविरोधी इकोसिस्टम ने विदेशी ताकतों और ‘टूलकिट’ का सहारा लिया:
- विदेशी फंडिंग और अराजकता का खेल: देश में अशांति फैलाने, जंतर-मंतर पर हंगामे कराने और ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की साजिश रचने के लिए विदेशी निहित स्वार्थों द्वारा भारी-भरकम फंडिंग का इस्तेमाल किया गया।
- राष्ट्रभक्तों की नई जागृति: यह एक ऐतिहासिक बदलाव है कि अब देश के जागरूक राष्ट्रभक्त इन सुनियोजित और प्रायोजित प्रदर्शनों का डटकर मुकाबला कर रहे हैं और उन्हें विफल कर रहे हैं।
- पूर्ण बहिष्कार की मांग: राष्ट्रद्रोहियों और देश के हितों को चोट पहुँचाने वाले इन ‘कॉकरोच और पेस्ट्स’ का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से पूर्ण बहिष्कार समय की सबसे बड़ी मांग बन चुका है।
निष्कर्ष: “मोदी थे, हैं और रहेंगे!”
- विरोधियों ने साम, दाम, दंड, भेद—हर हथकंडा अपना लिया, लेकिन वे यह भूल गए कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत 100 करोड़ देशवासियों का अटूट विश्वास होती है।
- चाहे देश के गद्दार हों या विदेशी टूलकिट के भूखे भेड़िए, वे भारत के इस सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी पुनरुत्थान को अब कभी नहीं रोक सकते।
- देश की जनता पूरी तरह जाग चुकी है और इन देशद्रोहियों को दोबारा देश को लूटने का कोई मौका नहीं देगी।
गूदे भर का जोर लगा लो… मोदी कहीं नहीं जाएगा!
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
Read our previous blogs 👉 Click here
Join us on Arattai 👉 Click here
👉Join Our Channels👈
