सारांश
- भारत वर्तमान में 21वीं सदी के वैश्विक पटल पर एक आत्मनिर्भर, समृद्ध और सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित होने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है।
- ‘विकसित भारत’ के संकल्प की सिद्धि के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों, रणनीतिक सुरंगों, जल-विद्युत व सिंचाई परियोजनाओं, अत्याधुनिक बंदरगाहों, समर्पित माल ढुलाई गलियारों (Dedicated Freight Corridors) और प्रशासनिक परिसरों का निर्माण केवल निर्माण कार्य नहीं हैं, बल्कि ये भारत की आर्थिक संप्रभुता और सामरिक सुरक्षा के मूल स्तंभ हैं।
- हालांकि, भारत के आधुनिक इतिहास का निष्पक्ष अवलोकन यह स्पष्ट करता है कि स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक देश की कई महत्वपूर्ण मेगा परियोजनाएं प्रशासनिक उदासीनता, संकुचित राजनीतिक प्राथमिकताओं, वैचारिक गतिरोधों और विदेशी वित्त-पोषित गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के सुनियोजित हस्तक्षेप के कारण लटकी रहीं।
- 2014 के बाद से इन वर्षों से लंबित राष्ट्रीय परियोजनाओं को अभूतपूर्व गति देकर पूरा करने का एक नया युग प्रारंभ हुआ है, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरण और सामाजिक सक्रियता की आड़ में विकास की गति को धीमा करने के विदेशी और आंतरिक प्रयासों का विषय भी राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आया है।
- यह विस्तृत आलेख भारत की प्रमुख विकास परियोजनाओं, विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के कठोर प्रवर्तन, और राष्ट्रीय हितों बनाम बाहरी दबावों का एक सूक्ष्म और तथ्य-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
भारत का विकास और संस्थागत पारदर्शिता
1. स्वतंत्रता के बाद का ऐतिहासिक परिदृश्य: लंबित परियोजनाएं और राजनीतिक गतिरोध
आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण की गति देश की वास्तविक आवश्यकताओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं से मेल नहीं खा सकी। कई ऐसी दूरगामी परियोजनाएं थीं जो भारत की आर्थिक और सामाजिक दिशा को बदल सकती थीं, लेकिन वे विभिन्न कारणों से दशकों तक अटकी रहीं:
- राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं का टकराव:
- स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक दीर्घकालिक और रणनीतिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के स्थान पर अल्पकालिक राजनीतिक प्राथमिकताओं को वरीयता दी गई। इसके कारण देश का मुख्य कनेक्टिविटी नेटवर्क, ऊर्जा क्षेत्र, औद्योगिक गलियारे और रणनीतिक सीमावर्ती क्षेत्रों का बुनियादी ढांचा पिछड़ता गया।
- दशकों तक अटकी महत्वपूर्ण मेगा परियोजनाएं:
- सरदार सरोवर (नर्मदा) बांध: गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान के सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए सिंचाई और पेयजल की इस जीवनदायिनी योजना को विभिन्न आंदोलनों, कानूनी मुकदमों और प्रशासनिक शिथिलता के माध्यम से दशकों तक रोके रखा गया। इसके कारण परियोजना की लागत में कई गुना अप्रत्याशित वृद्धि हुई और करोड़ों नागरिक दशकों तक जल सुरक्षा से वंचित रहे।
- अटल टनल (रोहतांग) और चिनाब रेलवे ब्रिज: रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद इन परियोजनाओं की गति अत्यंत धीमी रही और इन्हें लंबे समय तक ठंडे बस्ते में रखा गया। इससे सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास और सेना की बारहमासी आवाजाही प्रभावित रही।
- सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर और सिंधु नदी जल परियोजनाएं: अंतर-राज्यीय विवादों, राजनीतिक लाभ-हानि के समीकरणों और अदालती कार्यवाहियों के कारण ये जल-संसाधन परियोजनाएं वर्षों तक पूरी क्षमता से क्रियान्वित नहीं हो सकीं।
2. 2014 के बाद बुनियादी ढांचा क्रांति और प्रमुख राष्ट्रीय उपलब्धियां
2014 के पश्चात भारत के प्रशासनिक और विधायी दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव आया। नीतिगत निर्णयों की स्पष्टता, समयबद्ध क्रियान्वयन और ‘गवर्नेंस’ के नए मॉडल ने दशकों से लंबित पड़ी परियोजनाओं में नई जान फूंक दी:
- रणनीतिक एवं राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट्स का सफल समापन:
- अटल टनल और चिनाब ब्रिज: लद्दाख और कश्मीर घाटी को ऑल-वेदर और सुरक्षित कनेक्टिविटी प्रदान कर राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमावर्ती रसद आपूर्ति को अभूतपूर्व मजबूती दी गई।
- अटल सेतु (MTHL) और सेंट्रल विस्ता पुनर्विकास: मुंबई के आर्थिक नेटवर्क को आधुनिक गति प्रदान करने और देश के प्रशासनिक केंद्र को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप एक एकीकृत, आधुनिक और सुरक्षित ढांचा प्रदान करने वाली ऐतिहासिक इंजीनियरिंग उपलब्धियां।
- पूर्वांचल, बुंदेलखंड और समृद्धि एक्सप्रेसवे: देश के विशाल ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों को राष्ट्रीय आर्थिक गलियारों से जोड़कर व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा किए गए।
- पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (PM GatiShakti):
- विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच तालमेल की कमी को दूर करने के लिए एक बहु-मॉडल इंफ्रास्ट्रक्चर प्लेटफॉर्म शुरू किया गया। इसने भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृतियों और वन विभाग की अनुमतियों में होने वाली अनावश्यक प्रशासनिक देरी को समाप्त कर दिया।
3. पर्यावरण और जनजातीय सक्रियता की आड़ में विदेशी फंडिंग (FCRA) का विषय
2014 के बाद जहां एक ओर सरकारी स्तर पर परियोजनाओं में अभूतपूर्व तेजी आई, वहीं दूसरी ओर इन विकास कार्यों को रोकने या लटकाने के लिए नए-नए वैचारिक और कानूनी मोर्चों का सहारा लिया गया:
- विदेशी गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) का वित्तीय प्रवाह और भूमिका:
- विभिन्न खुफिया रिपोर्टों और सुरक्षा विश्लेषकों के अध्ययनों से यह बात सामने आई कि भारत को बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने से रोकने और उसकी आर्थिक संवृद्धि दर को सुस्त करने के लिए कुछ विदेशी संस्थाओं द्वारा स्थानीय NGOs को भारी मात्रा में धन मुहैया कराया गया।
- पर्यावरण और सामाजिक आंदोलनों का रणनीतिक इस्तेमाल:
- कई मामलों में यह देखा गया कि पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण या स्थानीय जनजातीय अधिकारों के नाम पर ऐसे विरोध प्रदर्शन और जनहित याचिकाएं (PILs) शुरू की गईं जिनका मुख्य उद्देश्य औद्योगिक, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (जैसे कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र, खनन परियोजनाएं, हाइवे और तटीय सड़क परियोजनाएं) को अदालती प्रक्रियाओं में उलझाना था।
- एफसीआरए (FCRA) के कड़े नियम और विनियामक कार्रवाई:
- विदेशी धन के इस अनियंत्रित और संदिग्ध उपयोग को रोकने के लिए भारत सरकार ने Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) में दूरगामी संशोधन किए।
- इसके तहत बैंक खातों का केंद्रीकरण (SBI मुख्य शाखा), पुनः हस्तांतरण (Re-granting) पर रोक और प्रशासनिक व्यय की सीमा 20% निर्धारित की गई। ऑडिट में गड़बड़ी और देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त पाए जाने वाले हजारों संदेहास्पद NGOs के FCRA लाइसेंस रद्द या निलंबित किए गए।
4. पर्यावरण संरक्षण बनाम त्वरित इंफ्रास्ट्रक्चर विकास: संतुलन की चुनौती
एक लोकतांत्रिक और विधि-शासित समाज में विकास की गति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- अदालती प्रक्रियाएं और विकास की लागत:
- यद्यपि सतत विकास (Sustainable Development) और वनों की रक्षा आवश्यक है, लेकिन जब बिना किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के या प्रेरित होकर जनहित याचिकाएं दायर की जाती हैं, तो राष्ट्रीय परियोजनाओं की लागत में भारी वृद्धि होती है।
- न्यायपालिका का संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण:
- भारत का उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) अब राष्ट्रीय सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की अनिवार्यताओं को समझते हुए निर्णय दे रहे हैं, ताकि देश की प्रगति को किसी बेबुनियाद याचिका के कारण बंधक न बनाया जा सके।
5. निष्कर्ष: ‘विकसित भारत’ के लिए संस्थागत मजबूती और राष्ट्रीय हित
भारत की विकास यात्रा में आर्थिक आत्मनिर्भरता, विनियामक पारदर्शिता और राष्ट्रीय संप्रभुता का आपस में गहरा संबंध है।
- पूर्ण वित्तीय पारदर्शिता: देश के भीतर काम कर रहे सभी संगठनों के लिए विदेशी धन के अंतिम उपयोग (End-use) का पारदर्शी हिसाब देना अनिवार्य है, ताकि विदेशी फंडिंग का प्रयोग केवल वैध कल्याणकारी कार्यों में ही हो।
- राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की सर्वोच्चता: देश के बुनियादी ढांचे का विकास किसी राजनीतिक विचारधारा या बाहरी एजेंडे का मोहताज नहीं हो सकता। इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को तय सीमा के भीतर पूरा करना ही राष्ट्रीय हित में है।
- तथ्य-आधारित राष्ट्रीय चेतना: नागरिकों को यह समझना होगा कि कौन से कदम देश के विकास और सुरक्षा को आगे बढ़ा रहे हैं और कौन से प्रयास विकास की राह में अनर्गल बाधाएं खड़ी करने के लिए किए जा रहे हैं।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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