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Appeasement vs. development in state administration and governance

तुष्टिकरण बनाम विकास: राज्यों की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और वैचारिक संघर्ष

सारांश
  • यह व्यापक विश्लेषणात्मक आलेख भारत की राजनीति में ‘तुष्टिकरण बनाम विकास’ के मौलिक संघर्ष का गहन परीक्षण करता है। इसमें विस्तार से यह रेखांकित किया गया है कि कैसे कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों (“ठगबंधन”) द्वारा शासित राज्य अपनी सत्ता बचाने के लिए खुले तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण, मुफ्त की रेवड़ी संस्कृति और चयनात्मक लाभ वितरण में व्यस्त हैं।
  • ये दल अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए दिवालिया हो रहे राज्यों के खजानों को खाली कर रहे हैं और बुनियादी ढांचे के विकास की पूरी तरह उपेक्षा कर रहे हैं। उनके पास राष्ट्र निर्माण की कोई दृष्टि नहीं है; उनका एकमात्र उद्देश्य हिंदुओं और सनातन धर्म को हाशिए पर धकेलना तथा समाज को विभाजित कर वोटों का ध्रुवीकरण करना है—वैसा ही जैसा उन्होंने पिछले सत्तर वर्षों से देश भर में किया है।
  • इसके विपरीत, भाजपा और एनडीए शासित राज्य बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए कानूनों के समान कार्यान्वयन (uniform application of laws), पारदर्शी सुशासन और चहुंमुखी विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। अंततः, यह लेख राष्ट्रभक्त सरकारों और न्यायपालिका के बीच समन्वय, संवैधानिक नियमों के सख्त प्रवर्तन और समाज की सभ्यतागत एकता की अनिवार्यता पर जोर देता है।

राजनीतिक विचारधाराओं का शासन व्यवस्था पर प्रभाव

I. विपक्षी शासित राज्यों में मुस्लिम तुष्टिकरण और खजाने की बर्बादी

हाल के वर्षों में कांग्रेस और उसके गठबंधन (“ठगबंधन”) द्वारा शासित राज्यों में जिस प्रकार की प्रशासनिक प्राथमिकताएं देखने को मिली हैं, वे सुशासन और वित्तीय अनुशासन के बुनियादी सिद्धांतों को गंभीर आघात पहुंचाती हैं।

  • सत्ता बचाने के लिए एकतरफा तुष्टिकरण: विपक्षी दल केवल अपने पारंपरिक वोट-बैंक को सुरक्षित रखने और खुश करने के लिए चुनिंदा वर्गों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियां बना रहे हैं। यह वही 70 वर्षों पुरानी विभाजनकारी राजनीति है जिसके तहत समाज को बांटकर और एक वर्ग विशेष को प्राथमिकता देकर सत्ता हासिल की जाती रही है।
  • रियायतें और मुफ्त की रेवड़ियां (Freebees): राज्य के दीर्घकालिक विकास कार्यों, रोजगार सृजन या बुनियादी ढांचे पर ध्यान देने के बजाय, पूरा प्रशासनिक तंत्र मुफ्त की योजनाओं और चयनात्मक कर छूटों (जैसे कर माफी और विशेष आर्थिक सहायता) के माध्यम से राज्य के खजाने को रिक्त करने में लगा हुआ है।
  • दिवालिया होती राज्य अर्थव्यवस्थाएं: मुफ्त की रेवड़ियों और तुष्टिकरण आधारित बजटीय आवंटनों के कारण कई विपक्ष-शासित राज्य वित्तीय संकट और दिवालियापन के कगार पर पहुंच रहे हैं, जिससे आम जनता पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
  • बुनियादी ढांचे और विकास की उपेक्षा: जब राज्यों के वित्तीय संसाधन केवल राजनीतिक तुष्टिकरण और विशेष आयोजनों या वर्गों को खुश करने में झोंक दिए जाते हैं, तब सड़कें, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं, उच्च शिक्षा और औद्योगिक विकास जैसे बुनियादी क्षेत्र पूरी तरह उपेक्षित रह जाते हैं।

II. सनातन संस्कृति की उपेक्षा और सामाजिक विभाजन की रणनीति

तुष्टिकरण की यह राजनीति केवल आर्थिक संसाधनों के दुरुपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा वैचारिक षड्यंत्र काम करता है जिसका उद्देश्य बहुसंख्यक समाज और सनातन संस्कृति को कमजोर करना है।

  • हिन्दुओं और सनातन धर्म का हाशिए पर जाना: विपक्षी शासित राज्यों में ऐसे प्रशासनिक निर्णय लिए जाते हैं जो बहुसंख्यक समाज के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करते हैं, जबकि दूसरी ओर अल्पसंख्यक संस्थानों और धार्मिक परिसरों को पूर्ण छूट, रियायतें और भारी वित्तीय पोषण दिया जाता है।
  • फूट डालो और राज करो की निरंतरता: देश भर में दशकों तक कांग्रेस द्वारा अपनाई गई ‘फूट डालो और राज करो’ की रणनीति आज भी क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर जारी है, जहाँ हिंदुओं को जातियों या क्षेत्रीय आधार पर विभाजित कर दिया जाता है और अल्पसंख्यक वोटों का पूर्ण समेकन (consolidation) करके सत्ता हथियाई जाती है।
  • विकास के एजेंडे का पूर्ण अभाव: इन दलों के पास न तो राष्ट्र निर्माण की कोई दूरदर्शी सोच (vision) है और न ही मजबूत अर्थव्यवस्था के निर्माण की योजना; इनका एकमात्र राजनीतिक ईंधन तुष्टिकरण और समाज में वैमनस्य फैलाना है।

III. भाजपा और एनडीए शासित राज्यों का विकास और सुशासन मॉडल

इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) द्वारा शासित राज्य विकास, सुशासन और पारदर्शिता का एक नया और अनुकरणीय मानक स्थापित कर रहे हैं।

  • कानून का समान अनुप्रयोग (Uniform Application of Laws): एनडीए शासित राज्यों में नीतियां धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान के दायरे में रहकर सभी नागरिकों के लिए समान रूप से लागू की जाती हैं।
  • रेवड़ी संस्कृति के स्थान पर बुनियादी विकास: तुष्टिकरण और मुफ्त की राजनीति के बजाय, ये सरकारें एक्सप्रेसवे, मेट्रो नेटवर्क, औद्योगिक गलियारों, आधुनिक शिक्षण संस्थानों, डिजिटल बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्माण पर भारी निवेश कर रही हैं।
  • राष्ट्रवादी नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति: उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ, असम में हेमंत बिस्वा सरमा, उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी और पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता यह साबित कर रहे हैं कि प्रशासनिक दृढ़ता, जीरो-टॉलरेंस नीति और सांस्कृतिक स्वाभिमान के साथ भी राज्य को प्रगति के पथ पर सर्वोच्च स्थान पर पहुंचाया जा सकता है।
  • सबका साथ, सबका विकास: बिना किसी तुष्टिकरण के सभी जरूरतमंदों तक पारदर्शी तरीके से कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना ही एनडीए प्रशासन की मुख्य पहचान है।

IV. संवैधानिक कड़ाई और न्यायपालिका की भूमिका

देश के संघीय ढांचे को बचाने और विपक्ष-शासित राज्यों में चल रही तुष्टिकरण की राजनीति पर लगाम लगाने के लिए अब एक निर्णायक और कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है।

  • कानूनों का सख्त प्रवर्तन: यह समय की मांग है कि एक राष्ट्रभक्त सरकार और देश की न्यायपालिका मिलकर संविधान के प्रावधानों (विशेषकर समानता के अधिकारों) को सख्ती से लागू करें, ताकि कोई भी राज्य सरकार राजनीतिक लाभ और वोट-बैंक के लिए कानूनों का दुरुपयोग न कर सके।
  • राज्यों की वित्तीय जवाबदेही: जनता के करों से वसूले गए धन का उपयोग यदि केवल एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण और राजनीतिक विज्ञापनों में किया जा रहा है, तो संवैधानिक संस्थाओं और न्यायालयों को इस पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए।
  • संस्थागत दुरुपयोग पर रोक: औपनिवेशिक काल के कानूनों और संवैधानिक छिद्रों का फायदा उठाकर बहुसंख्यक समाज के अधिकारों का हनन करने वाली राज्यीय नीतियों की न्यायिक समीक्षा की जानी चाहिए।

V. सभ्यतागत एकता और भविष्य की दिशा

भारत की दीर्घकालिक सुरक्षा, संप्रभुता और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि नागरिक इस अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।

  • वटवृक्ष रूपी समाज: बौद्ध, जैन, सिख और सनातन परंपरा की सभी धाराएं एक ही मूल सभ्यता की शाखाएं हैं। इन्हें आपस में लड़ाने और कमजोर करने वाले षड्यंत्रों को पहचानना होगा।
  • सही नेतृत्व का चयन: तात्कालिक प्रलोभनों या दुष्प्रचार में आए बिना, देश को मजबूत, सुरक्षित और विकसित बनाने वाले राष्ट्रवादी नेतृत्व का समर्थन करना ही एकमात्र मार्ग है।
  • सांस्कृतिक स्वाभिमान का जागरण: यदि समाज को अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भारत छोड़ना है, तो उसे अपनी ऐतिहासिक भूलों से सीख लेकर अपनी सभ्यतागत जड़ों को मजबूत करना होगा और तुष्टिकरण की राजनीति को हमेशा के लिए नकारना होगा।

🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮

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