सारांश
- यह विश्लेषण भारत की समुद्री और भू-राजनीतिक संप्रभुता के इतिहास तथा वर्तमान चुनौतियों की पड़ताल करता है। लेख में साक्ष्यों के साथ यह रेखांकित किया गया है कि कैसे स्वतंत्रता के बाद से ही नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व वाली सरकारों ने अपनी आदर्शवादी विदेश नीति, गुटनिरपेक्षता के भ्रम और कूटनीतिक ढुलमुलपन के कारण भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों को खो दिया।
- अंडमान के समीप स्थित कोको द्वीप समूह (Coco Islands) पर दावा न ठोकना और 1974 में कच्चातीवू द्वीप (Katchatheevu) को श्रीलंका को सौंप देना, ऐसी ही ऐतिहासिक भूलें थीं जिनका खामियाजा आज भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और तटीय नागरिक भुगत रहे हैं।
- वर्तमान समय में जब भारत सरकार ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के माध्यम से मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर एक अभूतपूर्व सामरिक और वाणिज्यिक कवच (इंडो-पैसिफिक गेम चेंजर) तैयार कर रही है, तब कांग्रेस और राहुल गांधी का वैचारिक इकोसिस्टम पर्यावरण और मानवाधिकारों की आड़ लेकर इस परियोजना को रोकने का प्रयास कर रहा है।
भूमिका: चुनावी राष्ट्रवाद बनाम रणनीतिक यथार्थ
- भारत की घरेलू राजनीति में “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “अखंडता” जैसे शब्दों का प्रयोग अक्सर केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित कर दिया जाता है। लेकिन यदि इतिहास के पन्नों को निष्पक्षता से पलटा जाए, तो कई ऐसे निर्णायक मोड़ दिखाई देते हैं जहां देश के शीर्ष नेतृत्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, रणनीतिक अदूरदर्शिता और वैचारिक भ्रम ने भारत की सामरिक स्थिति को दशकों पीछे धकेल दिया।
- आज का वैश्विक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। हिंद महासागर (IOR) और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र इस समय दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्तियों के शक्ति-संघर्ष का मुख्य केंद्र बन चुके हैं। इन परिस्थितियों में एक बड़ा प्रश्न देश के सामने खड़ा है: क्या भारत के तत्कालीन नेतृत्व ने अपने सामरिक हितों की रक्षा के लिए कभी पर्याप्त रणनीतिक दृढ़ता दिखाई? या फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर केवल अपनी आदर्शवादी छवि बनाने की चाहत में देश की सुरक्षा प्राथमिकताओं से बार-बार समझौता किया गया?
1. कोको द्वीप समूह: नेहरू युग की रणनीतिक उदासीनता
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सुदूर उत्तरी छोर से महज कुछ ही समुद्री मील की दूरी पर स्थित कोको द्वीप समूह आज भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए एक अत्यंत गंभीर और रणनीतिक सिरदर्द बन चुका है। वर्तमान समय में चीनी जनमुक्ति सेना (PLA) ने म्यांमार के साथ मिलकर इन द्वीपों पर अत्याधुनिक रडार सिस्टम, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक खुफिया निगरानी ढांचे और एक बड़े सैन्य हवाई पट्टी का निर्माण कर लिया है। यहाँ से बैठकर चीन सीधे तौर पर हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की प्रत्येक गतिविधि और हमारे मिसाइल परीक्षणों पर चौबीसों घंटे सीधी नज़र रख सकता है।
इस रणनीतिक क्षति के पीछे के ऐतिहासिक कारण निम्नलिखित हैं:
- औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था: ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक सुविधा के लिए कोको द्वीप समूह का प्रशासनिक नियंत्रण कोलकाता से हटाकर रंगून (बर्मा/म्यांमार) के प्रशासन को सौंप दिया गया था।
- दावे का परित्याग: जब बर्मा 1948 में स्वतंत्र हुआ, तब भारत के पास एक ऐतिहासिक अवसर था कि वह इस अत्यंत महत्वपूर्ण भूभाग पर अपना रणनीतिक दावा प्रस्तुत करता। परंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया।
- आदर्शवाद का भ्रम: उस दौर का भारतीय नेतृत्व देश की “आक्रामक समुद्री और सैन्य शक्ति” को विकसित करने के बजाय वैश्विक मंचों पर “गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)” के मसीहा और शांतिदूत की अपनी आदर्शवादी छवि चमकाने में अधिक व्यस्त था। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि भारत के ठीक बगल में स्थित एक अत्यंत संवेदनशील चौकी हमेशा के लिए चीन के परोक्ष प्रभाव क्षेत्र में चली गई।
2. कच्चातीवू द्वीप: इंदिरा गांधी सरकार का ‘कूटनीतिक आत्मसमर्पण’
कोको द्वीप समूह को भाग्य के भरोसे छोड़ देने के बाद, भारत की समुद्री संप्रभुता के साथ दूसरा सबसे बड़ा और आत्मघाती समझौता 1974 में देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते के अंतर्गत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कच्चातीवू द्वीप पर श्रीलंका के पूर्ण संप्रभुता के दावे को बिना किसी ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य या भारतीय संसद में व्यापक बहस के स्वीकार कर लिया।
इस समझौते के दूरगामी और विनाशकारी प्रभाव आज भी देखे जा सकते हैं:
- मछुआरे और नागरिकों पर आघात: 1974 में इस निर्णय को पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध बनाने के रूप में प्रचारित किया गया था। लेकिन इसका वास्तविक खामियाजा पिछले पांच दशकों से तमिलनाडु के गरीब और निर्दोष मछुआरे भुगत रहे हैं, जिन्हें श्रीलंकाई नौसेना द्वारा क्रूरतापूर्वक गिरफ्तार और प्रताड़ित किया जाता है।
- सुरक्षा कवच की क्षति: कच्चातीवू केवल एक छोटा सा निर्जन द्वीप नहीं था। यह भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की सुरक्षा करने और पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को बनाए रखने का एक प्राकृतिक और मजबूत रक्षा कवच था। नेहरू-गांधी परिवार की इसी “उपहार देने और रियायत बरतने” की राजनीति के कारण आज कच्चातीवू का मुद्दा संप्रभुता के साथ किए गए कूटनीतिक समझौते का सबसे बड़ा प्रतीक है।
3. ग्रेट निकोबार परियोजना: विकास और सुरक्षा के मार्ग में ‘ईकोसिस्टम’ का अवरोध
- अतीत की इन भयंकर भूलों से सबक लेते हुए जब आज का भारत हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री संप्रभुता को अभेद्य बनाने के लिए ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना (Great Nicobar Project) जैसे महा-इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम कर रहा है, तब नेहरू-गांधी परिवार का पूरा राजनीतिक दल और उनका वैचारिक इकोसिस्टम एक बार फिर इस राष्ट्रीय सुरक्षा की परियोजना के विरोध में लामबंद हो गया है।
- लगभग ₹92,000 करोड़ की लागत से बनने वाली यह मेगा परियोजना चीन की खतरनाक “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” (भारत को घेरने की रणनीति) को काटने और दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक व ऊर्जा मार्ग—मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca)—के ठीक मुहाने पर भारत का सबसे अभेद्य सैन्य, नौसैनिक और व्यावसायिक किला बनने जा रही है।
इस परियोजना का रणनीतिक महत्व:
- इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट: मलक्का जलडमरूमध्य के ठीक पास स्थित होने के कारण यह विशाल बंदरगाह वैश्विक समुद्री व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा सिंगापुर और कोलंबो से खींचकर भारत की ओर ले आएगा।
- सामरिक सैन्य बेस (INS बाज़ का विस्तार): यहाँ अत्याधुनिक सैन्य हवाई पट्टी और नौसैनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण होने से भारतीय सेना हिंद महासागर में चीनी नौसेना की बढ़ती आक्रामकता, उनके जासूसी जहाजों और उनकी परमाणु पनडुब्बियों की गतिविधियों पर सीधे नकेल कसने में सक्षम हो जाएगी।
- रणनीतिक भौगोलिक विस्तार: इस परियोजना के पूर्ण होते ही समुद्र के भीतर भारत की सक्रिय सैन्य और निगरानी उपस्थिति वर्तमान सीमा से लगभग 400 किलोमीटर और आगे दक्षिण की ओर गहरी हो जाएगी।
4. विरोध का पुराना और परिचित पैटर्न
- इस अत्यंत संवेदनशील परियोजना के खिलाफ लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी और उनके समर्थक बुद्धिजीवियों के पूरे अंतरराष्ट्रीय इकोसिस्टम द्वारा पर्यावरण संरक्षण, जनजातीय अधिकारों की रक्षा और पारिस्थितिकी (Ecology) के नाम पर एक अत्यंत नकारात्मक और भ्रामक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। अदालतों में लगातार जनहित याचिकाएं (PIL) डाली जा रही हैं और इसे एक “विनाशकारी परियोजना” साबित करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है।
- सामरिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम पर एक गंभीर प्रश्न उठाते हैं: क्या यह विरोध केवल एक सामान्य पर्यावरणीय चिंता है या इसके पीछे कोई गहरा पैटर्न है? भारत के इतिहास में जब भी देश ने अपनी सैन्य और रणनीतिक क्षमता को बढ़ाने का प्रयास किया है—चाहें वह डिफेंस कॉरिडोर हो, स्वदेशी परमाणु संयंत्र हों या यह समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर—हर बार मानवाधिकारों और पर्यावरण के मुखौटे के पीछे छिपा एक विशेष वैचारिक नेटवर्क देश की गति को धीमा करने के लिए अचानक सक्रिय क्यों हो जाता है?
अखंड राष्ट्रवाद बनाम रणनीतिक शून्यता का संघर्ष
- 21वीं सदी के इस नए और जटिल दौर में यदि भारत को एक निर्णायक वैश्विक महाशक्ति के रूप में खुद को स्थापित करना है, तो उसे यह अच्छी तरह समझना होगा कि भारत की असली ताकत और उसका भविष्य समुद्र की लहरों पर उसके नियंत्रण से तय होगा।
- एक तरफ जहां चीन हमारे चारों ओर “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)” का जाल बिछाकर भारत की घेराबंदी कर रहा है, वहीं हमारे ही देश के भीतर की एक राजनीतिक सोच आज भी देश के सामरिक ढांचे के निर्माण को “पर्यावरण बनाम विकास” के झूठे विवादों में उलझाकर रखना चाहती है।
- अतीत में नेहरू युग की उदासीनता के कारण कोको द्वीप समूह पर चीन का परोक्ष नियंत्रण होने दिया गया और इंदिरा युग में कच्चातीवू द्वीप को उपहार स्वरूप श्रीलंका को सौंप दिया गया।
- लेकिन आज का उभरता हुआ भारत यह भली-भांति समझता है कि ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाएं देश की आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा, संप्रभुता और अस्मिता की अचूक गारंटी हैं। अब समय आ गया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को पारिवारिक और दलगत राजनीति से ऊपर रखा जाए।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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