औपनिवेशिक दासता से विकसित भारत के पुनरुत्थान तक
1947 के बाद के दशकों में, भारत की भौगोलिक स्वतंत्रता ब्रिटिश औपनिवेशिक मलबे के नीचे दबी रही। वामपंथी इतिहास लेखन के नियंत्रण में, संस्थागत आख्यान (नैरेटिव) ने सनातनी बुद्धि, वैज्ञानिक विजयों और सैन्य प्रतिरोध को कमजोर कर दिया—वैश्विक समुद्री साम्राज्यों और वैदिक सफलताओं को फुटनोट तक सीमित कर दिया और युवाओं में मानसिक हीनता की भावना भरी।
संप्रभु भारत कोई निष्क्रिय विलाप नहीं है; यह एक समझौताहीन कानूनी, रणनीतिक और बौद्धिक शल्य चिकित्सा (सर्जरी) है। 7 भागों और 36 अध्यायों में फैली यह कृति उजागर करती है कि कैसे विरासत में मिले कानूनों, प्रशासनिक पक्षाघात और छद्म सेकुलरिज्म ने राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह 2014 के बाद कानूनी विऔपनिवेशीकरण, तकनीकी संप्रभुता और डिजिटल कल्याण की ओर ऐतिहासिक बदलाव का विस्तार से विवरण देती है।
‘विकसित भारत @2047’ और ‘सिलिकॉन संप्रभुता’ के स्तंभों से लेकर ‘कर्ता भाव’ (राष्ट्र-प्रथम की भावना) के जागरण तक, यह पुस्तक एक अचूक ब्लूप्रिंट प्रदान करती है। यह अगली पीढ़ी को औपनिवेशिक शॉर्टकट को खारिज करने, वैज्ञानिक नवाचार में महारत हासिल करने और भारत को एक आत्मनिर्भर वैश्विक महाशक्ति तथा विश्वगुरु के रूप में पुनर्जीवित करने के लिए सशक्त बनाती है।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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