सारांश
- स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में शासन प्रणालियों, वैचारिक दृष्टिकोणों और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर तीखी बहसें होती रही हैं।
- एक तरफ जहाँ वर्तमान राष्ट्रवादी शासन प्रणाली और इसके समर्थकों का यह दृढ़ मत है कि 2014 के बाद से देश में ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति, शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance) और पारदर्शी विकास को प्राथमिकता मिली है, वहीं दूसरी तरफ आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि शुरुआती दशकों की तुष्टिकरण की राजनीति और वोट-बैंक आधारित फैसलों ने देश की आंतरिक स्थिरता, सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक प्रगति को गहरी क्षति पहुँचाई है।
- इस आलेख में भारत की राजनीतिक प्रवृत्तियों, विपक्ष की कार्यशैली, ऐतिहासिक निर्णयों और राष्ट्र सुरक्षा के मुद्दों का व्यापक विवरण प्रस्तुत किया गया है
तुष्टिकरण की राजनीति और राष्ट्र प्रथम की सोच
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और तुष्टिकरण की राजनीति के विवाद
स्वतंत्रता के बाद के कई दशकों में विभिन्न सरकारों द्वारा लिए गए निर्णयों पर यह गंभीर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने राष्ट्रीय हितों के ऊपर विशेष समुदायों को प्रसन्न करने (appeasement) की राजनीति को प्राथमिकता दी:
- कानूनी असंतुलन और प्रशासनिक नीतियाँ: 1995 का वक्फ अधिनियम, 1991 का पूजा स्थल अधिनियम, और शाह बानो मामले में अदालत के फैसले को पलटने जैसे कानूनों ने समाज में एकतरफा कानूनी व्यवस्था को बढ़ावा दिया।
- धार्मिक संस्थानों पर दोहरे मानदंड: देश के कई हिस्सों में प्रमुख हिंदू मंदिरों का सीधा नियंत्रण और वित्तीय प्रबंधन सरकारों के हाथ में रहा, जबकि अन्य धार्मिक समुदायों के पूजा स्थलों को पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता दी गई।
- सुरक्षा मामलों में राजनीतिक नरमी: 1989 से 1991 के बीच आतंकवादियों के अपहरण मामलों (जैसे रुबिया सैयद, नाहिदा सोज और तासादुक के प्रकरण) में आतंकवादियों की रिहाई जैसी घटनाओं ने यह संदेश दिया कि राजनीतिक समझौते राष्ट्रीय सुरक्षा पर भारी पड़ सकते हैं।
2. 2014 के बाद शासन व्यवस्था में बदलाव: ‘राष्ट्र प्रथम’ और सुरक्षा
वर्ष 2014 के बाद से भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक दिशा में एक बुनियादी और स्वागत योग्य परिवर्तन आया है:
- आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस: सीमा पार से होने वाले आतंकवाद और देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती देने वाली ताकतों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक जैसी निर्णायक सैन्य कार्रवाइयाँ की गईं।
- सांस्कृतिक स्वाभिमान और राष्ट्रीय गौरव: भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और आध्यात्मिक प्रतीकों के पुनरुद्धार को बढ़ावा दिया गया है, जिससे देश की वैचारिक पहचान मजबूत हुई है।
- पारदर्शी शासन और आर्थिक सुधार: पुराने दौर के बड़े वित्तीय घोटालों के विपरीत, वर्तमान व्यवस्था में डिजिटल इंडिया, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और बुनियादी ढांचे के तीव्र विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
3. विपक्ष की भूमिका, अंतरराष्ट्रीय मंच और जनता की चिंताएँ
लोकतंत्र में विपक्ष की उपस्थिति अनिवार्य है, परंतु जब विपक्षी दलों की कार्यशैली राष्ट्रहित के विपरीत दिखाई देती है, तो जनता के बीच गहरी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं:
- अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि को धूमिल करना: विपक्षी नेताओं द्वारा विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय लोकतंत्र, संस्थाओं या चुनावी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाने को देशवासी राष्ट्रविरोधी और गैर-जिम्मेदाराना मानते हैं।
- अराजकता और अस्थिरता का अंदेशा: आलोचकों का तर्क है कि यदि विपक्ष तुष्टिकरण और विरोध की राजनीति को ही अपना मुख्य हथियार बनाए रखेगा, तो इससे देश की आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक प्रगति की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
- राष्ट्र सर्वोपरि की अनिवार्यता: देश की संप्रभुता और अखंडता से जुड़े मुद्दों पर पक्ष और विपक्ष दोनों को वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्र के साथ खड़ा होना चाहिए।
4. समावेशी विकास बनाम वोट-बैंक की राजनीति
देश के विकास और सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि नीतियों का आधार तुष्टिकरण न होकर सबका साथ और सबका विकास हो:
- कल्याणकारी योजनाओं का समान लाभ: बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक तक आवास, बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाएँ और राशन पहुँचाकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सशक्त बनाया गया है।
- सुरक्षा और स्थिरता की गारंटी: देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने से निवेशकों का विश्वास बढ़ा है और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है।
- दीर्घकालिक राष्ट्रीय दृष्टिकोण: तात्कालिक चुनावी लाभ के लिए देश की सुरक्षा और अखंडता से खिलवाड़ करने की पुरानी प्रवृत्तियों को छोड़कर अब दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा जा रहा है।
निष्कर्ष
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में यह अत्यंत आवश्यक है कि शासन की बागडोर ऐसे हाथों में हो जो बिना किसी तुष्टिकरण या बाहरी दबाव के केवल ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प के साथ आगे बढ़े। नागरिकों की जागरूकता और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति ही देश को एक सुरक्षित, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित कर सकती है।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮
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