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Global instability, India's sovereignty, and the impact of hybrid toolkits on national security

वैश्विक अस्थिरता का मॉडल, भारत की संप्रभुता और ‘हाइब्रिड टूलकिट’ का सच

सारांश

यह आलेख वैश्विक स्तर पर सक्रिय ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ (Hybrid Warfare) के पैटर्न और भारत के खिलाफ रचे जा रहे सुनियोजित षड्यंत्रों का एक विस्तृत, तथ्य-आधारित और रणनीतिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

आलेख में मुख्य रूप से निम्नलिखित चार बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा की गई है:

  1. वैश्विक अस्थिरता का मॉडल: फ्रांस, बेल्जियम, चिली और स्पेन जैसे देशों में स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने के बाद स्थानीय और शैक्षिक मुद्दों (जैसे स्कूल सुधार, हॉस्टल/किराया) के नाम पर अचानक भड़की प्रायोजित अराजकता का बहुराष्ट्रीय विश्लेषण।
  2. भारत की रणनीतिक संप्रभुता (Strategic Autonomy): पश्चिमी देशों और महाशक्तियों के भारी दबाव के बावजूद, भारत द्वारा रूस से रियायती दरों पर ऊर्जा आयात जारी रखने, अपनी शर्तों पर ट्रेड डील करने और विदेशी शुल्कों (Tariffs) को पूरी तरह बेअसर करने का दृढ़ रुख।
  3. भारत के भीतर अस्थिरता के विफल प्रयास (टूलकिट्स): जब वैश्विक दबाव काम नहीं आया, तो देश के भीतर पहले NEET परीक्षा विवाद, फिर प्रायोजित ‘स्कूल सुधार आंदोलन’, और अब लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के लिए ‘वोट चोरी’ के मनगढ़ंत नैरेटिव गढ़कर असंतोष फैलाने के असफल प्रयासों का पर्दाफाश।
  4. षड्यंत्र का मूल उद्देश्य: भारत की तेज गति से बढ़ती आर्थिक प्रगति, रक्षात्मक आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व को रोकना और देश को अपनी शर्तों पर झुकने के लिए मजबूर करना।
  • दुनिया की समकालीन भू-राजनीति (Geopolitics) का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए, तो एक अकाट्य सत्य सामने आता है—अंतर्राष्ट्रीय पटल पर कोई भी बड़ा सामाजिक विरोध, अचानक भड़का छात्र आंदोलन या अराजकता महज इत्तेफाक नहीं होती।
  • जब शक्तिशाली देश और वैश्विक लॉबी किसी स्वाभिमानी राष्ट्र को सीधे कूटनीतिक या आर्थिक मोर्चे पर अपने आगे झुकाने में विफल हो जाते हैं, तो उस राष्ट्र के भीतर नागरिक असंतोष (Civil Unrest) पैदा करने का ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ (Hybrid Warfare) मॉडल सक्रिय कर दिया जाता है।
  • पिछले कुछ समय के वैश्विक घटनाक्रम और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में घटित हो रही घटनाओं का निष्पक्ष विश्लेषण इस छिपे हुए पैटर्न की पोल खोलता है।

हाइब्रिड टूलकिट और भारत की संप्रभुता पर वैश्विक चुनौतियाँ

1. चार देशों का उदाहरण: स्थानीय मुद्दों के आवरण में वैश्विक अस्थिरता का एजेंडा

वैश्विक पटल पर जब भी कोई देश अंतर्राष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में अमेरिका या पश्चिमी शक्तियों के आदेशों के विपरीत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने का प्रयास करता है, तो उसके घरेलू मोर्चे पर अचानक तीव्र असंतोष भड़क उठता है। इसके सबसे ताज़ा उदाहरण दुनिया के चार प्रमुख देशों में देखे जा सकते हैं:

  • फ्रांस (France): जब फ्रांस ने ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक मुद्दों और पश्चिम एशिया के संघर्षों में अमेरिका की एकतरफा नीतियों का खुला विरोध किया और उसका साथ देने से मना किया, तो उसके तुरंत बाद वहां ‘स्कूलों की स्थिति और शिक्षा व्यवस्था’ के सुधार के नाम पर अचानक एक उग्र आंदोलन शुरू हुआ। देखते ही देखते इस स्थानीय मुद्दे ने पूरे फ्रांस को हिंसक विरोध प्रदर्शनों और आगजनी की चपेट में ले लिया।
  • बेल्जियम (Belgium): यूरोपीय कूटनीति और बजटीय प्राथमिकताओं के बीच जब बेल्जियम ने अमेरिकी-पश्चिमी रणनीतिक दबावों से इतर अपनी स्वतंत्र राय रखी, तो वहां भी शिक्षा व्यवस्था, शिक्षण संस्थानों के बुनियादी ढांचे और बजट कटौती के नाम पर सुनियोजित तरीके से बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भड़काए गए, जिससे प्रशासनिक मशीनरी पंगु हो गई।
  • चिली (Chile): दक्षिण अमेरिकी राजनीति में वेनेजुएला में तख्तापलट और क्षेत्रीय कूटनीति के मुद्दों पर जब चिली ने अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती दी और उसका साथ देने से इनकार किया, तो वहां भी सरकारी शिक्षा सुधारों और छात्रवृत्तियों में कटौती के नाम पर हिंसक छात्र आंदोलन शुरू हुए, जिन्होंने पूरे देश में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया।
  • स्पेन (Spain): स्पेन द्वारा ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियानों में शामिल होने से स्पष्ट इंकार करने के बाद, वहां अचानक युवाओं के बीच ‘मकान और हॉस्टल के आसमान छूते किराए’ (Affordable Housing Crisis) के खिलाफ एक तीव्र राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया गया, जो कुछ ही दिनों में पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती देने लगा।

इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि जब देश बाहरी भू-राजनीतिक दबावों के आगे नहीं झुकते, तो उनके आंतरिक सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को हथियार बनाकर उन्हें अंदर से कमजोर करने का एक स्थापित पैटर्न काम कर रहा है।

2. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और पश्चिम का दबाव

ऐसी ही वैश्विक परिस्थितियों के बीच, भारत ने पिछले एक दशक में जिस अभूतपूर्व रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का परिचय दिया है, उसने पारंपरिक पश्चिमी पावर-डेस्क्स को सबसे अधिक असहज किया है:

  • रूस से ऊर्जा आयात (Crude Oil): पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर ऐतिहासिक प्रतिबंध लगाने और भारत पर रूस से कच्चा तेल न खरीदने का भारी कूटनीतिक दबाव बनाने के बावजूद, भारत ने अपने 140 करोड़ नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने और महंगाई पर नियंत्रण रखने के लिए रूस से रियायती दरों पर तेल आयात पूरी दृढ़ता के साथ जारी रखा।
  • ट्रेड डील्स में राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: वैश्विक व्यापार वार्ताओं में भारत ने अपने घरेलू उद्योगों, कृषि क्षेत्र, डेयरी सेक्टर और डिजिटल संप्रभुता से समझौता करने वाली एकतरफा अमेरिकी या पश्चिमी शर्तों को मानने से साफ इनकार कर दिया।
  • टेरिफ और आर्थिक दबाव बेअसर: भारत पर विदेशी शुल्कों (Tariffs) और आर्थिक पाबंदियों के जरिए दबाव बनाने के तमाम प्रयास भारत की मजबूत होती डिजिटल अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार और विशाल घरेलू बाजार के सामने पूरी तरह विफल साबित हुए।

3. भारत के भीतर अस्थिरता फैलाने के विफल प्रयास: ‘हाइब्रिड टूलकिट्स’ का सच

जब वैश्विक ताकतों और उनके घरेलू एजेंटों को यह स्पष्ट हो गया कि भारत सरकार को बाहरी दबावों के जरिए झुकाना असंभव है, तब भारत के भीतर आंतरिक मोर्चे पर भ्रम, अविश्वास और अराजकता फैलाने के लिए एक के बाद एक ‘टूलकिट्स’ का प्रयोग किया गया:

  • NEET परीक्षा विवाद: मेडिकल प्रवेश परीक्षा में आई तकनीकी और प्रशासनिक कमियों को अति-रंजित करके देश के मासूम युवाओं को सड़कों पर उतारने और सरकार के खिलाफ एक बड़ा देशव्यापी असंतोष खड़ा करने का प्रयास किया गया। परंतु सरकार द्वारा जांच एजेंसियों की त्वरित कार्रवाई, पारदर्शी व्यवस्था और न्यायिक हस्तक्षेप से इस षड्यंत्र की हवा निकल गई।
  • ‘स्कूल ठीक करो‘ आंदोलन: यूरोपीय देशों (फ्रांस और बेल्जियम) के तर्ज पर भारत में भी स्कूली शिक्षा, भवनों और बुनियादी ढांचे के नाम पर कृत्रिम असंतोष पैदा करने की कोशिश की गई, जिसे देश के आम नागरिकों और अभिभावकों ने पूरी तरह से भांपते हुए खारिज कर दिया।
  • ‘वोट चोरी‘ का मनगढ़ंत नैरेटिव: जब नीतियां, परीक्षाएं और सामाजिक मुद्दे सरकार को हिलाने में असफल रहे, तो सीधे तौर पर देश की संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग और मतदान प्रक्रिया) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करने का नया एजेंडा शुरू किया गया। चुनाव परिणामों को पूर्व-प्रभाव से संदिग्ध बताने के लिए ‘वोट चोरी’ जैसे निराधार नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं।

निष्कर्ष

  • इन तमाम वैश्विक और घरेलू घटनाक्रमों का केंद्रीय सूत्र और उद्देश्य केवल एक है—भारत की अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति, रक्षात्मक आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व के उभार को किसी भी तरह बाधित करना।
  • विदेशी दबावों के विफल होने पर आंतरिक टूलकिट्स के माध्यम से देश को अस्थिर करने के इन षड्यंत्रों को भारत का जागरूक समाज, मजबूत प्रशासनिक नेतृत्व और अडिग संवैधानिक ढांचा लगातार विफल करता आया है।

🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम 🇮

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