सारांश
- यह आलेख भारतीय न्यायपालिका के भीतर व्याप्त अपारदर्शिता, जवाबदेही के अभाव और आंतरिक विसंगतियों का तथ्यात्मक विश्लेषण करता है।
- लोकतांत्रिक ‘चेक्स एंड बैलेंसेज’ की आड़ में शीर्ष अदालत ने स्वयं को आरटीआई (RTI), बाहरी जांच और न्यायिक समीक्षा से ऊपर स्थापित कर लिया है।
- एनसीईआरटी (NCERT) की पुस्तकों से न्यायिक आलोचना हटाने से लेकर मदरास हाई कोर्ट के सिटिंग जजों की हालिया ऐतिहासिक टिप्पणियों (मई 2026) तक, यह आलेख प्रमाणित करता है कि न्यायपालिका में सुधार अब भारतीय लोकतंत्र को बचाने के लिए अनिवार्य हो चुका है।
- जजों की नियुक्ति में ‘क्लब कल्चर’ और रजिस्ट्री का प्रक्रियात्मक भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था को संदेहास्पद बनाते हैं।
क्या कॉलेजियम ही है भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की मूल जड़?
1. परिप्रेक्ष्य: सच को दबाने का दोहरा मापदंड
भारतीय न्यायिक व्यवस्था में एक चिंताजनक विरोधाभास है। एक तरफ शीर्ष न्यायाधीश व्यवस्था की शुचिता का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ संस्थागत कमियों पर उंगली उठाने वाली आवाज़ों को दबा दिया जाता है:
- NCERT पुस्तक का दमन: राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के भीतर भ्रष्टाचार, मुकदमों के लंबित होने और प्रशासनिक विसंगतियों का उल्लेख होने पर शीर्ष अदालत (जस्टिस सूर्यकांत) ने तीव्र आपत्ति जताई।
- पुस्तकों की जब्ती: इस रुख के कारण उस अध्याय को हटाने का निर्देश दिया गया और बाजार से करीब 2.50 लाख पुस्तकें वापस करा ली गईं। तब अदालत ने कहा था: “हमें बताओ कि कौन भ्रष्ट है, हम कार्रवाई करेंगे।” यह रुख भ्रष्टाचार मिटाने से ज्यादा सड़ांध को सार्वजनिक विमर्श और आने वाली पीढ़ियों की नजरों से छिपाने का प्रयास प्रतीत होता है।
2. कॉलेजियम प्रणाली: ओपेक चैंबर और भाई-भतीजावाद
दुनिया के किसी भी परिपक्व लोकतंत्र (अमेरिका, यूके, फ्रांस) में जज स्वयं जजों की नियुक्ति नहीं करते। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ यह स्वनिर्मित ‘कॉलेजियम प्रणाली’ लागू है:
- RTI और न्यायिक समीक्षा से मुक्ति: सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस एम.आर. शाह और जस्टिस सी.टी. रविकुमार की पीठ) ने स्पष्ट किया है कि जजों के चयन की प्रक्रिया और कॉलेजियम के फैसले सूचना के अधिकार (RTI) और न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं।
- अंकल जज सिंड्रोम (Uncle Judges Syndrome): लाखों वरिष्ठ वकीलों में से अचानक चुनिंदा लोगों को जज चुन लिया जाता है। इस चयन का वास्तविक पैमाना कोई नहीं जानता। इस अपारदर्शिता का परिणाम ‘भाई-भतीजावाद’ के रूप में सामने आता है, जहाँ शीर्ष कुर्सियों पर कुछ खास परिवारों और पूर्व जजों के करीबियों का वर्चस्व बना रहता है।
- AIJS से दूरी क्यों?: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के माध्यम से एक पारदर्शी ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ (AIJS) परीक्षा क्यों नहीं आयोजित की जा सकती? ऐसा न करने की मुख्य वजह यही है कि परीक्षा आधारित चयन से रसूखदारों का वीटो पावर समाप्त हो जाएगा।
3. प्रशासनिक भ्रष्टाचार: रजिस्ट्री का खेल और तारीखों का बाज़ार
न्यायपालिका में प्रशासनिक शिथिलता, चयनात्मक संवेदनशीलता और प्रक्रियाओं का दुरुपयोग सबसे घातक भ्रष्टाचार है, जो रोजाना अदालत की चौखट पर होता है:
- रजिस्ट्री का रहस्यमयी तंत्र: रसूखदार वकीलों और बड़े कॉर्पोरेट घरानों के मामलों की सुनवाई रातों-रात विशेष पीठ गठित करके हो जाती है। इसके विपरीत, आम आदमी की अपील दशकों तक “तकनीकी त्रुटियों” (Defects) के नाम पर दबी रहती है।
- फाइलों का गायब होना: महत्वपूर्ण केस फाइलों का गायब होना या स्पष्ट निर्णय के बाद भी विपक्षी पक्ष को जानबूझकर नोटिस जारी न करना सीधे तौर पर संस्थागत भ्रष्टाचार है।
- संपत्ति पर चुप्पी: देश भर के नेताओं और नौकरशाहों को संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश देने वाले न्यायाधीश स्वयं अपनी चल-अचल संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने से कतराते हैं।
4. सुरक्षा कवच: कानून से ऊपर ‘मीलॉर्ड’
न्यायपालिका ने अपने ही फैसलों के माध्यम से स्वयं को बाहरी विधिक आंच से बचाने के लिए एक अभेद्य किला तैयार कर लिया है, जो संविधान के ‘समानता के अधिकार’ (Article 14) को चुनौती देता है:
- FIR दर्ज करने पर प्रतिबंध: के. वीरास्वामी मामले के तहत निर्धारित है कि किसी भी सेवारत न्यायाधीश (Sitting Judge) के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में भी FIR दर्ज करने के लिए देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की लिखित पूर्व अनुमति आवश्यक है।
- जवाबदेही से मुक्ति: इसका परिणाम यह है कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी (CBI, ED या पुलिस) के लिए तुरंत और निष्पक्ष जांच करना असंभव बना दिया गया है। जब तक अनुमति मिलती है, तब तक साक्ष्य नष्ट कर दिए जाते हैं।
5. जब ‘अंदरूनी लोग’ ही गवाही दें: हाई कोर्ट्स का आत्ममंथन
न्यायपालिका में सड़ांध के आरोप केवल बाहरी लोग नहीं लगा रहे; अदालतों के भीतर बैठे ईमानदार न्यायाधीश अब इस घुटन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं:
- मदरास हाई कोर्ट की कड़वी गवाही: 21 मई, 2026 को मदरास हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस लक्ष्मणन की खंडपीठ ने ऐतिहासिक टिप्पणी की:
“None can deny there is corruption in judiciary, there were and are corrupt judges.” (इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है; कल भी भ्रष्ट जज थे और आज भी हैं।)
- इस टिप्पणी के बाद भी शीर्ष नेतृत्व का चुप्पी साधे रखना संस्था की साख को और मटियामेट करता है।
6. लोकतंत्र के साथ मज़ाक: चुनावी याचिकाओं में ‘दशकों की देरी’
- जस्टिस जी. जयचंद्रन का प्रहार: मदरास हाई कोर्ट के जस्टिस जी. जयचंद्रन ने चुनाव याचिकाओं (Election Petitions) के निपटारे में होने वाले जानबूझकर किए गए विलांब पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि चुनावी मुकदमों में सालों की देरी Autocracy (निरंकुशता) को जन्म देती है।
- सुप्रीम कोर्ट की खिंचाई: उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निंदा करते हुए कहा कि साल 2016 के विधानसभा चुनाव से जुड़े मामले 2019 से आज (2026) तक लंबित हैं। उन्होंने इसे “Decade-long delay a ‘grave mockery of justice’ and threat to democracy” करार दिया।
- कानून का उल्लंघन: ‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1951’ के सेक्शन 86 के अनुसार चुनाव याचिका पर अधिकतम 6 महीने में निर्णय आ जाना चाहिए, लेकिन अदालतें खुद इस कानून को ठेंगे पर रखती हैं ताकि अवैध रूप से चुने गए प्रतिनिधि अपना पूरा कार्यकाल सत्ता के मजे लेते हुए पूरा कर लें।
7. चयनात्मक संवेदनशीलता: रसूखदारों को राहत, आम जनता को तारीख
- विशिष्ट मामलों में विशेष कृपा: प्रभावशाली राजनेताओं और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपियों को अंतरिम जमानत देने के लिए असाधारण विधिक व्याख्याएं की जाती हैं और गिरफ्तारी की वैधता जांचने के लिए 5 जजों की बड़ी बेंचों को मामला सौंप दिया जाता है।
- बेंचों के गठन में झोल: मामला बड़ी बेंच को तो सौंप दिया जाता है, लेकिन दो-दो साल तक उस बेंच का गठन ही नहीं होता और आरोपी बाहर घूमता रहता है।
- विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा: दूसरी तरफ, जेलों में बंद लाखों विचाराधीन कैदी (Undertrials) बिना किसी दोष के सिर्फ इसलिए सड़ रहे हैं क्योंकि उनके पास बड़े वकीलों की फीस नहीं है और अदालतें उनकी फाइलें खोलने को तैयार नहीं हैं।
अपने आचरण पर भी ध्यान दीजिए मीलॉर्ड!
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में NEET और अन्य सरकारी परीक्षाओं में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कार्यपालिका को कड़े निर्देश दिए थे। परंतु मीलॉर्ड, जो कड़ा पैमाना आप दूसरों की परीक्षाओं और संस्थाओं को नापने के लिए इस्तेमाल करते हैं, वही पैमाना अपनी खुद की नियुक्ति प्रक्रिया (कॉलेजियम), रजिस्ट्री और प्रशासनिक तंत्र पर भी लागू कीजिए।
जब तक न्यायपालिका स्वयं को आरटीआई, पारदर्शिता और स्वतंत्र समीक्षा के दायरे से ऊपर रखकर “सुप्रीम” होने का भ्रम पाले रखेगी, तब तक उसके दावों पर देश की 140 करोड़ जनता के मन में शंका हमेशा बनी रहेगी। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी कानून के सामने समानता के लिए बंधी है, अपनों को बचाने और सच को छिपाने के लिए नहीं।
🇮🇳 जय भारत, वन्देमातरम 🇮🇳
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