सारांश
- यह विमर्श 2014 के पूर्व और पश्चात के भारत की आर्थिक, सामाजिक तथा रणनीतिक परिस्थितियों का एक व्यापक, डेटा-आधारित और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
- इसके अंतर्गत स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार 2014 से पूर्व संस्थागत भ्रष्टाचार, नीतिगत पंगुता और तुष्टिकरण ने भारत को ‘फ्रेजाइल फाइव’ (विश्व की पांच सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाएं) के गर्त में धकेल दिया था।
- वर्तमान सरकार द्वारा टैक्स राजस्व का पारदर्शी संग्रहण और बिचौलियों की लूट पर पूर्णविराम ही वह मुख्य कारण है जिसने भारत को विश्व की 5वीं सबसे बड़ी और तीव्रगामी अर्थव्यवस्था बनाया है।
- यह विमर्श उन आर्थिक और रणनीतिक सुधारों को रेखांकित करता है जिन्होंने देश को दिवालियापन से बचाकर आत्मनिर्भरता के मार्ग पर अग्रसर किया।
फ्रेजाइल फाइव’ से ‘टॉप फाइव’ तक का ऐतिहासिक रूपांतरण
1. 2014 पूर्व का अंधकार: वंशवादी लूट, नीतिगत पंगुता और पड़ोसी देशों जैसा संकट
यदि वर्ष 2014 में देश की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों में निर्णायक बदलाव न हुआ होता, तो भारत आज आर्थिक दिवालियापन और आंतरिक अराजकता के उस दौर में होता जिससे कई पड़ोसी देश वर्तमान में गुजर रहे हैं। 2014 से पूर्व का परिदृश्य इन गंभीर प्रवृत्तियों से ग्रस्त था:
- संस्थागत लूट और घोटालों का युग: तत्कालीन व्यवस्था में बहुमूल्य राष्ट्रीय संसाधनों के आवंटन में गंभीर अनियमितताएं देखी गईं। 2G स्पेक्ट्रम, कोयला ब्लॉक आवंटन और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे बड़े घोटालों ने देश के राजकोष को भारी क्षति पहुँचाई थी।
- ‘फ्रेजाइल फाइव‘ का कलंक: वित्तीय कुप्रबंधन और नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) के कारण वैश्विक वित्तीय संस्थाओं ने भारत को दुनिया की पांच सबसे कमज़ोर अर्थव्यवस्थाओं में सूचीबद्ध किया था। मुद्रास्फीति दोहरे अंकों में थी और राजकोषीय घाटा पूरी तरह नियंत्रण से बाहर था।
- सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता का संकट: देश के प्रमुख महानगरों में सिलसिलेवार आतंकी हमलों और आंतरिक अशांति के कारण सुरक्षा का माहौल पूरी तरह ध्वस्त हो चुका था। तुष्टिकरण की राजनीति के चलते कड़े कदम उठाने के बजाय सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली को सीमित कर दिया जाता था।
2. आर्थिक कायाकल्प: लूट पर पूर्णविराम और वित्तीय चक्र का पुनरुत्थान
2014 के पश्चात स्थापित सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए सबसे पहले व्यवस्थागत लीकेज (Systemic Leakages) को बंद करने और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन को लागू करने का अभूतपूर्व निर्णय लिया:
- बिचौलियों की समानांतर अर्थव्यवस्था का अंत: डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), डिजिटल पहचान और जनधन खातों की ‘त्रिमूर्ति’ (JAM Trinity) के माध्यम से सरकारी योजनाओं की शत-प्रतिशत राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचने लगी। इसने बिचौलियों के दशकों पुराने नेटवर्क को जड़ से उखाड़ दिया।
- ‘फ्रेजाइल फाइव‘ से ‘टॉप फाइव‘ की ऐतिहासिक छलांग: घोटालों और वित्तीय लीकेज के बंद होने से जो विशाल राजस्व बचा, उसे कॉरपोरेट घरानों के बजाय देश के पूंजीगत विकास (Capital Expenditure) में लगाया गया। परिणामतः, भारत ब्रिटेन को पछाड़कर विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना।
3. कराधान (Taxation) और जनकल्याण: पारदर्शी सामाजिक सुरक्षा चक्र
पेट्रोल, डीजल और अन्य माध्यमों से वसूला जाने वाला टैक्स कोई अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि समाज के सबसे वंचित, गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के जीवन स्तर को उठाने के लिए एक सुदृढ़ ‘सामाजिक सुरक्षा तंत्र’ (Social Security Net) का निर्माण करता है:
- खाद्य सुरक्षा और एमएसपी (MSP) का संतुलन: सरकार मंडियों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेंहूँ और चावल की व्यावसायिक दरों पर खरीदकर, राशन की दुकानों (TPDS) के माध्यम से गरीबों को अत्यधिक रियायती दरों पर उपलब्ध कराती है। इस विशाल सब्सिडी के वित्तीय अंतर को टैक्स राजस्व द्वारा ही संतुलित किया जाता है।
- स्वास्थ्य और शिक्षा का सुलभ लोकतंत्रीकरण: ‘आयुष्मान भारत’ (प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना) के अंतर्गत देश के करोड़ों निर्धनों को ₹5 लाख तक का प्रतिवर्ष मुफ्त और कैशलेस इलाज मुहैया कराना तथा दुनिया का सबसे बड़ा मुफ्त कोविड-19 टीकाकरण अभियान इसी राजस्व के पैसे से संचालित हुआ।
- ग्रामीण सशक्तिकरण: ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) के माध्यम से करोड़ों छोटे किसानों को सीधी वित्तीय मदद, ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत पक्के मकान और ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत बुनियादी ढांचागत सुधार पूंजीगत व्यय के सबसे बड़े उदाहरण हैं।
4. आधुनिक अवसंरचना (Infrastructure) और अभेद्य सामरिक संप्रभुता
एक आत्मनिर्भर और शक्तिशाली राष्ट्र के निर्माण के लिए भविष्योन्मुखी बुनियादी ढांचे और विश्वस्तरीय सैन्य शक्ति की आवश्यकता होती है, जिसके लिए भारी बजटीय आवंटन अनिवार्य है:
- विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण: देश में बिछाए जा रहे आधुनिक एक्सप्रेसवे, नेशनल हाईवे, नए एयरपोर्ट्स, मेट्रो रेल नेटवर्क और ‘वंदे भारत’ जैसी अत्याधुनिक ट्रेनों का परिचालन देश की लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने के लिए अनिवार्य है।
- सामरिक और सैन्य संप्रभुता का सुदृढ़ीकरण: वायुसेना के लिए अत्याधुनिक लड़ाकू विमान, थल सेना के लिए विध्वंसक टैंक, अभेद्य मिसाइल प्रणालियां (जैसे S-400) और नौसेना के लिए स्वदेशी विमानवाहक पोतों (INS Vikrant) का निर्माण इसी टैक्स के पैसे से हो रहा है। इसके साथ ही, ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) को लागू कर पूर्व सैनिकों को वित्तीय सुरक्षा दी गई है।
5. विडंबना और राजनीतिक पाखंड: सुधारों पर कृत्रिम भ्रमजाल
इस संपूर्ण आर्थिक विमर्श की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन्होंने दशकों तक देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बनाकर रखा, आज वे ही इस पारदर्शी व्यवस्था पर ‘टैक्स के बोझ’ का झूठा आरोप लगा रहे हैं:
- औद्योगिक निवेश को बाधित करने का प्रयास: देश के भीतर लाखों रोज़गार पैदा करने वाले और बुनियादी ढांचे का निर्माण करने वाले भारतीय उद्योगपतियों को निरंतर बदनाम करना विपक्ष की एक सोची-समझी रणनीति है, ताकि देश में औद्योगिक निवेश का माहौल खराब किया जा सके।
- सप्रभु आर्थिक नीतियां: वर्तमान नीतियां किसी व्यक्तिगत या पारिवारिक तिजोरी को भरने के लिए नहीं, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के उज्ज्वल भविष्य और राष्ट्र की संप्रभुता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए निर्धारित की जाती हैं।
- पड़ोसी देशों के वर्तमान आर्थिक हश्र, कंगाली और भुखमरी से सीखकर प्रत्येक नागरिक को यह समझना होगा कि टैक्स का भुगतान करना केवल एक कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का एकमात्र जरिया है।
- यदि सरकार नियमों के तहत पारदर्शी तरीके से टैक्स एकत्र नहीं करेगी, तो देश पुनः भ्रष्टाचार और कंगाली के उसी अंधकार युग में चला जाएगा जहाँ से इसे निकाला गया है।
- सजग समाज को अपने अधिकारों के साथ-साथ राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति भी उतनी ही ईमानदारी से जागरूक होना होगा।
🇮🇳 Jai Bharat, Vandematram 🇮🇳
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