यह विस्तृत विमर्श स्वतंत्र भारत के शुरुआती नीतिगत ढाँचे, शिक्षा व्यवस्था की वैचारिक संरचना और पिछले सात दशकों में फलने-फूलने वाली राजनीतिक तुष्टिकरण की परंपरा का एक ऐतिहासिक व समकालीन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। स्वतंत्रता के बाद प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद के समय से लेकर उत्तर-वर्ती सरकारों (विशेषकर कांग्रेस एवं यूपीए काल) द्वारा अपनाई गई नीतियों के कारण किस प्रकार देश के प्रमुख प्रशासनिक एवं संवैधानिक संस्थानों में एकांगी सोच को बढ़ावा मिला, इसका सूक्ष्म मूल्यांकन यहाँ किया गया है। इसके साथ ही, स्वतंत्रता के शुरुआती 70 वर्षों में मुस्लिम तुष्टिकरण और चरमपंथी तत्वों को परोक्ष व प्रत्यक्ष संरक्षण दिए जाने के परिणामस्वरूप देश की आंतरिक सुरक्षा पर जो अभूतपूर्व खतरे मंडराते रहे, उनकी पड़ताल की गई है।
वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार द्वारा आतंकवाद व कट्टरपंथ के विरुद्ध अपनाई गई ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) नीति और ‘सबका साथ, सबका विकास’ के माध्यम से तुष्टिकरण की राजनीति को समाप्त करने के प्रयासों को रेखांकित किया गया है। अंततः, यह विश्लेषण इस कड़वे सच को उजागर करता है कि सरकार आंतरिक राष्ट्रद्रोहियों और वैचारिक दुश्मनों के खिलाफ इस लड़ाई को काफी हद तक अकेले लड़ रही है। इस राष्ट्रीय सुरक्षा के युद्ध में पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए संपूर्ण भारतीय समाज के राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक समर्थन की परम आवश्यकता है।
1. स्वतंत्रता के बाद शिक्षा नीति का गठन और शुरुआती वैचारिक आधार
स्वतंत्र भारत के शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों की नींव जिस धरातल पर रखी गई, उसने आने वाली कई पीढ़ियों के दृष्टिकोण और राष्ट्रीय चेतना को गहराई से प्रभावित किया।
- पारंपरिक धार्मिक शिक्षा बनाम आधुनिक ढांचा: भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की प्राथमिक शिक्षा पारंपरिक और धार्मिक संस्थानों (जैसे मक्का और मिस्र के अल-अजहर मदरसे) में हुई थी। उनके पास किसी औपचारिक स्कूल या आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणाली का अनुभव नहीं था, फिर भी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली को गढ़ने का अति-महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा।
- प्रशासनिक नियुक्तियाँ और एकांगी परिदृश्य: पदभार ग्रहण करने के पश्चात मौलाना आजाद ने ख्वाजा गुलाम सैय्यदीन जैसे अधिकारी को भारत का शिक्षा सचिव नियुक्त किया। आलोचकों और विचारकों का मानना है कि इस दौर में निर्मित पाठ्यक्रमों में भारत के प्राचीन इतिहास, सनातन ज्ञान-परंपरा, वैदिक विज्ञान और महान राष्ट्रीय नायकों को दरकिनार कर दिया गया और इसके स्थान पर एक विशिष्ट वैचारिक व तुष्टिकरण-उन्मुख दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई।
- पुरस्कारों का राजनीतिकरण: कांग्रेस के शासनकाल के दौरान मौलाना आजाद को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया और उनके शिक्षा सचिव ख्वाजा गुलाम सैय्यदीन को ‘पद्म भूषण’ दिया गया। इस दौर में राष्ट्रीय सम्मानों का वितरण योग्यता से अधिक वैचारिक व राजनीतिक निकटता के आधार पर करने के गंभीर आरोप लगे।
2. प्रशासनिक तंत्र में भाई-भतीजावाद और यूपीए (UPA) काल का तुष्टिकरण
स्वतंत्र भारत के प्रशासनिक इतिहास में योग्यता को दरकिनार कर विशिष्ट परिवारों और विचारधाराओं को दिए गए संरक्षण ने देश के संस्थागत संतुलन को भारी क्षति पहुँचाई।
- प्रशासनिक सेवा के बिना शीर्ष पद: ख्वाजा गुलाम सैय्यदीन की पुत्री सैयदा हामिद को किसी भी प्रशासनिक सेवा (IAS) का अनुभव न होने के बावजूद तत्कालीन कांग्रेस सरकारों में शीर्ष भूमिकाएँ दी गईं। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में उन्हें सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में सचिव स्तर की जिम्मेदारी सौंपी गई और बाद में ‘पद्म श्री’ से भी अलंकृत किया गया।
- योजना आयोग और सोनिया गांधी की एनएसी (NAC): पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान, जब सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद’ (National Advisory Council – NAC) एक समानांतर सरकार की तरह काम कर रही थी, तब इसी मानसिकता वाली सैयदा हामिद को योजना आयोग (Planning Commission) का सदस्य बनाया गया और उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया।
- ठगबंधन शासित राज्यों में निरंतरता: आजादी के बाद के पहले 70 वर्षों में जो तुष्टिकरण का मॉडल केंद्र में चलता रहा, वही आज भी कांग्रेस और विपक्षी दलों के ‘ठगबंधन’ (विपक्षी मोर्चे) द्वारा शासित राज्यों में बेधड़क जारी है, जहाँ वोट बैंक की खातिर राष्ट्रीय हितों और बहुसंख्यक समाज की संवेदनाओं से खिलवाड़ किया जाता है।
3. अवैध घुसपैठ, बांग्लादेशी शरणार्थी और आंतरिक राष्ट्रद्रोह की चुनौती
भारत की जनसांख्यिकी (Demographics) में अनियंत्रित परिवर्तन और सीमाओं की सुरक्षा पर मंडराते खतरों के बीच कतिपय प्रभावशाली हस्तियों के बयानों ने देश की संप्रभुता पर सीधे सवाल खड़े किए हैं।
- संविधान और सीमाओं पर आघात: योजना आयोग की पूर्व सदस्य सैयदा हामिद का यह विवादित और गैर-जिम्मेदाराना तर्क कि “यह धरती अल्लाह की है, इसलिए बांग्लादेशी मुसलमानों को भी भारत में रहने का पूरा हक है और आप उन्हें देश से बाहर नहीं निकाल सकते”, सीधे तौर पर भारत के संविधान, नागरिकता कानूनों और राष्ट्रीय संप्रभुता पर खुला हमला है।
- अवैध प्रवासियों को राजनीतिक संरक्षण: देश के संसाधनों, नौकरियों और सामाजिक ताने-बाने पर अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों और रोहिंग्याओं का जबरन कब्ज़ा करवाना एक बड़े रणनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा रहा है। वोट बैंक की लालच में विपक्षी दल और उनके समर्थित विचारक इन अवैध तत्वों को कानूनी व सामाजिक ढाल प्रदान करते रहे हैं।
- आंतरिक गद्दारों का खतरा: ये आंतरिक राष्ट्रद्रोही और छद्म-धर्मनिरपेक्ष तत्व देश के भीतर रहकर बाहरी दुश्मनों का रास्ता आसान करते हैं, जिससे सीमावर्ती राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व संकट खड़ा हो जाता है।
4. भाजपा की ‘ज़ीरो टॉलरेंस‘ नीति और ‘सबका साथ, सबका विकास‘
वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद भारत के सुरक्षा और प्रशासनिक दृष्टिकोण में एक युगांतरकारी और कठोर बदलाव आया है।
- कट्टरपंथ पर कड़ा प्रहार: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने आतंकवाद, नक्सलवाद और धार्मिक चरमपंथ के खिलाफ ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाई। तुष्टिकरण के उस 70 साल पुराने ढर्रे को ध्वस्त करते हुए सुरक्षा एजेंसियों को राष्ट्रविरोधी तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की पूरी छूट दी गई।
- सबका साथ, सबका विकास का सामरिक प्रभाव: सरकार की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की समावेशी नीति ने विकास योजनाओं का लाभ बिना किसी धर्म या जाति के भेदभाव के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाया है। इस पारदर्शी नीति ने उस तुष्टिकरण के खेल का आधार ही खत्म कर दिया है, जिसके बल पर चरमपंथी संगठन और राजनीतिक दल दशकों से अपनी रोटियाँ सेकते थे।
- संस्थागत सुधार: भारत की सुरक्षा सीमाओं को मजबूत करने के साथ-साथ नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और घुसपैठ पर कड़ाई जैसे कदमों के माध्यम से देश के जनसांख्यिकीय संतुलन को बचाने के ऐतिहासिक प्रयास किए गए हैं।
5. अकेली सरकार, आंतरिक राष्ट्रद्रोहियों का युद्ध और समाज का परम कर्तव्य
राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता की यह लड़ाई केवल सीमाओं पर बंदूक चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर बैठे वैचारिक दुश्मनों के खिलाफ लड़ा जाने वाला एक जटिल युद्ध है।
- सरकार का अकेला संघर्ष: वर्तमान समय में सरकार चरमपंथ, अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क और इकोसिस्टम के खिलाफ यह महासमर काफी हद तक अकेले लड़ रही है। न्यायपालिका का एक वर्ग, मानवाधिकार का ढोंग करने वाले एनजीओ (NGOs), और विपक्षी मीडिया का तंत्र हर कड़े कदम पर सरकार की राह में रोड़े अटकाने का प्रयास करता है।
- सामाजिक और राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता: आंतरिक गद्दारों और 70 वर्षों से जड़े जमा चुके तुष्टिकरण के इस तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए केवल सरकारी आदेश और कानून पर्याप्त नहीं हैं। जब तक संपूर्ण भारतीय समाज राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से पूरी ताकत के साथ सरकार के पीछे नहीं खड़ा होगा, तब तक इस युद्ध को निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुँचाया जा सकता।
- नागरिकों की जाग्रत चेतना: देश के प्रबुद्ध नागरिकों को यह पहचानना होगा कि कौन से दल और विचार नेटवर्क राष्ट्रहित के साथ हैं और कौन वोट बैंक के लिए देश को आंतरिक गृहयुद्ध की ओर धकेलना चाहते हैं।
6. निष्कर्ष: राष्ट्रीय पुनर्जागरण और विश्वगुरु बनने का मार्ग
इतिहास की भूलों को सुधारने और स्वतंत्रता के बाद से चले आ रहे तुष्टिकरण के विष-चक्र को सदा के लिए समाप्त करने का समय आ गया है।
- इतिहास से सीख और निर्णय: जिन तुष्टिकरणकारी नीतियों ने देश को दशकों तक पंगु बनाए रखा, उन्हें पुनर्जीवित करने का प्रयास करने वाले राजनीतिक घटकों को खारिज करना हर देशभक्त का कर्तव्य है।
- सुरक्षित और अखंड भारत का संकल्प: भारत तभी एक शक्तिशाली, सुरक्षित, स्वाभिमानी और समृद्ध राष्ट्र बन सकता है जब हम अपनी सीमाओं और आंतरिक व्यवस्था को हर प्रकार के कट्टरपंथ से मुक्त रखें। ‘राष्ट्र प्रथम’ (Nation First) की भावना से एकजुट होकर ही भारत आने वाले समय में एक वैश्विक महाशक्ति और विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेगा।
