सारांश:
- यह विस्तृत विश्लेषण फ्लाईदुबई विमान FZ1073 के साहसी भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर (Smit Machchhar) के शौर्य पर कांग्रेस, विपक्षी गठजोड़ (तथाकथित ठगबंधन) और ‘एंटी-नेशनल इकोसिस्टम’ के मौन की जड़ों का ऐतिहासिक मूल्यांकन करता है।
- यह आख्यान उजागर करता है कि यह विरोधी तंत्र केवल हाल की घटना नहीं है, बल्कि आजादी के बाद से दशकों तक इसे तत्कालीन सरकारों द्वारा खाद-पानी दिया गया। २०१४ से पहले देश में जारी लूट, घोटालों और तुष्टिकरण को सुचारू रूप से चलाने के लिए इस इकोसिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था।
- हालांकि, पिछले १२ वर्षों के मोदी शासन में इस तंत्र की ‘दुकानें’ बंद होने और कठोर प्रहार से बौखलाकर अब पूरा इकोसिस्टम और विपक्ष एकजुट हो चुका है। इनका एकमात्र एजेंडा किसी भी तरह राष्ट्रवादी सरकार को सत्ता से हटाकर पुनः लूट और भ्रष्टाचार के युग को स्थापित करना है।
2014 के बाद संस्थागत बदलाव और एंटी-नेशनल इकोसिस्टम का विमर्श
१. कैप्टन स्मित मच्छर का शौर्य और विपक्षी गठजोड़ का संगठित मौन
दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाइट FZ1073 में कॉकपिट हमले के दौरान भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर ने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद जो साहस दिखाया, उसने १७० से अधिक निर्दोष जिंदगियों को सुरक्षित बचाया:
- वैश्विक पटल पर भारत के शौर्य का डंका: भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमेरिकी जनप्रतिनिधियों और इजरायल के शीर्ष नेतृत्व (बेंजामिन नेतन्याहू) ने कैप्टन स्मित की बहादुरी और त्वरित निर्णय क्षमता की खुलकर सराहना की।
- विपक्षी गठजोड़ की खामोशी: लेकिन सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा सहित पूरे विपक्षी गठजोड़ की ओर से इस गौरवमयी पल पर एक ट्वीट, पोस्ट या आधिकारिक बयान तक जारी नहीं हुआ।
- चयनात्मक संवेदनशीलता: यह चुप्पी कोई इत्तेफाक नहीं है; यह उस सोच का हिस्सा है जो भारतीय सुरक्षा बलों, पायलटों और राष्ट्र-नायकों का सम्मान करने में राजनीतिक जोखिम देखती है।
२. आजादी के बाद से संरक्षण: लूट और भ्रष्टाचार का ऐतिहासिक गठजोड़
यह ‘एंटी-नेशनल इकोसिस्टम’ रातों-रात पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इसका एक लंबा ऐतिहासिक और आपराधिक इतिहास रहा है:
- २०१४ से पहले का संस्थागत संरक्षण: आजादी के बाद से २०१४ तक सत्ता में रही सरकारों ने इस इकोसिस्टम (लुटियंस मीडिया, वामपंथी बुद्धिजीवियों, तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले गिरोहों और एनजीओ) को सरकारी संसाधनों, पुरस्कारों और पदों से नवाजा।
- लूट और घोटालों का ढाल बनना: बदले में यह इकोसिस्टम तत्कालीन सरकारों के बड़े-बड़े घोटालों, भ्रष्टाचार और देश-विरोधी गतिविधियों पर पर्दा डालने का काम करता था। जनता का ध्यान भटकाने के लिए यह तंत्र जाली नैरेटिव गढ़ता था।
- सनातनी पहचान और राष्ट्रवाद का दमन: दशकों तक इस इकोसिस्टम का इस्तेमाल भारत की सनातनी जड़ों, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रवादी विचारों को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने और दबाने के लिए किया गया।
३. २०१४ के बाद महाप्रहार: बंद हुई १२ सालों की ‘दुकानें’
२०१४ में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवादी सरकार के आने के बाद इस इकोसिस्टम के अस्तित्व पर सीधा प्रहार हुआ है:
- फर्जीवाड़े और बिचौलियों का अंत: डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT), सख्त कानूनों, बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई और विदेशी फंडिंग (FCRA) के कड़े नियमों ने इस इकोसिस्टम की विदेशी व सरकारी फंडिंग की जड़ों को काट दिया।
- १२ सालों की तालाबंदी: पिछले १२ वर्षों के पारदर्शी शासनकाल में फर्जी एनजीओ, बिकाऊ मीडिया पत्रकारों, फर्जी वामपंथी थिंक-टैंकों और बिचौलियों की ‘दुकानें’ पूरी तरह से बंद हो चुकी हैं।
- राष्ट्रहित सर्वोपरि: जब सरकार ने आतंकवाद, घुसपैठ और राष्ट्रविरोधी तत्वों पर ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई, तो यह इकोसिस्टम अपनी जमीन खोने लगा।
४. अस्तित्व की लड़ाई: सत्ता वापसी के लिए ‘ठगबंधन’ और इकोसिस्टम का छद्म-गठजोड़
अपनी ‘दुकानें’ बंद होने और भ्रष्टाचार के रास्ते पूरी तरह ठप हो जाने के कारण यह पूरा तंत्र अब बौखलाहट में है:
- विपक्ष और इकोसिस्टम का हाथ मिलाना: अपनी आर्थिक व वैचारिक जमीन बचाने के लिए इस ‘एंटी-नेशनल इकोसिस्टम’ ने विपक्षी दलों (ठगबंधन) के साथ हाथ मिला लिया है।
- सोशल मीडिया पर फेक नैरेटिव का तूफान: जहाँ कैप्टन स्मित मच्छर या राम मंदिर जैसे राष्ट्रहित के मुद्दों पर यह तंत्र खामोश रहता है, वहीं देश में दंगे भड़काने, जातिगत वैमनस्य फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को बदनाम करने वाली हर घटना पर यही इकोसिस्टम सोशल मीडिया पर आधी रात को भी ट्रेंड्स चलाने लगता है।
- पुराना लूट-तंत्र बहाल करने का षड्यंत्र: इनका एकमात्र उद्देश्य राष्ट्रवादी सरकार को किसी भी तरह सत्ता से उखाड़ फेंकना है, ताकि देश में फिर से वही पुरानी कठपुतली सरकार आ सके जो इनके भ्रष्टाचार, घोटालों और तुष्टिकरण के एजेंडे को फिर से फलने-फूलने का मौका दे।
- कैप्टन स्मित मच्छर प्रकरण पर पसरा यह मौन कोई साधारण राजनीतिक घटना नहीं है; यह उस ऐतिहासिक तंत्र की असलियत है जो सदियों से भारत की संप्रभुता और सनातनी मूल्यों की कीमत पर अपनी दुकानें चलाता आया है।
- जनता अब बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है कि कौन सी ताकतें भारत को एक आत्मनिर्भर और शक्तिशाली ‘ग्लोबल सुपरपावर’ बनाना चाहती हैं, और कौन सा इकोसिस्टम फिर से देश को लूट, घोटालों और तुष्टिकरण के दलदल में धकेलने की साजिश रच रहा है।
- राष्ट्रहित की इस लड़ाई में देश का प्रबुद्ध नागरिक हर षड्यंत्र को नाकाम करने के लिए पूरी तरह सतर्क है।
🇮🇳जय भारत, वन्देमातरम🇮🇳
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